भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 656 में से

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पृष्ठ 321

क्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१९ लोगोंसे परिव्याप्त तथा सभी प्राणियोंसे भरी हुई वह काशीनगरी उफान मारती हुई नदियोंके कारण समुद्रोंद्वारा डुबायी जाती हुई-सी लग रही थी॥ २७॥ ब्रह्माजी बोले—उस प्रलयको दैत्योंद्वारा उत्पन्न माया जानकर करुणासागर उन विनायकने अपनी योगमायाके बलसे तत्क्षण ही एक बहुत ऊँचे वटवृक्षको उत्पन्न किया। जो अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे सुशोभित था। वह सौ योजन विस्तारवाला था और जटाओं तथा शाखाओंसे समन्वित था॥ २८-२९॥ तदनन्तर वे विनायक एक बहुत बड़े पक्षीके रूपमें वहाँ स्थित हो गये। उस पक्षीने अपने गगनचुम्बी पंखोंको भूमिमें लगा लिया और सिरसे आकाशको छू लिया। और काशीनगरीको प्रकाशयुक्त बना दिया। उस विशाल जलराशिको अपनी चोंचसे पक्षीरूपी विनायकने उसी प्रकार पी डाला, जैसे कि कोई जंगली हाथी छोटे-से गड्ढेके जलको अपनी सूँड़से पी डालता है॥ ३०-३१॥ उस समय लोग प्रसन्न होकर कहने लगे—'विघ्न दूर हो गया है और जल भी समाप्त हो गया है।' अन्धकारके दूर हो जानेपर उन्होंने उस गहन वटवृक्षको देखा। साथ ही उन्होंने एक अद्भुत स्वरूपवाले पक्षीको भी देखा, जैसा कि न तो देखा गया था और न सुना ही गया था। सभी लोग उसकी शरण लेनेकी दृष्टिसे उस वटवृक्षके समीपमें गये॥ ३२-३३॥ अश्वों, हाथियों, रथों, ऊँटों, पालकियों, स्त्रियों तथा दासोंसहित काशिराज भी उस वटवृक्षके नीचे चले आये। दूसरे पशु, कुत्ते, बिल्लियाँ तथा वन्य पशु भी वहाँ आ गये। बालक विनायकके प्रभावसे न तो वृष्टि ही हो रही थी और न वहाँ अन्धकार ही था॥ ३४-३५॥ सभी वर्णोंके लोग पूर्ववत् अपने-अपने कर्मोंको यथाविधि करने लगे। नगरनिवासी पूर्वकी भाँति अपने- अपने व्यवसायोंमें लग गये॥ ३६॥ [वे लोग सोचने लगे कि] क्या जगदीश्वर गणेशने ही सभीकी रक्षा करनेके लिये पक्षीका रूप धारण किया है? इस विषयमें हम लोग कुछ भी नहीं जान पा रहे हैं। [अवश्य ही] उन्होंने दैत्यद्वारा उत्पन्न वृष्टिको अपने पंखोंको फैलाकर रोक लिया और उल्कापात तथा ओला- वृष्टिको स्वयं सुखपूर्वक सहन किया है॥ ३७-३८॥ इस प्रकारसे विचार करके लो ! वहाँपर सुखपूर्वक रहे। उन्हें वहाँ रहते हुए ग्यारह दिन व्यतीत हो गये। हे द्विज व्यासजी! बालक विनायकको बालकोंके समूहके साथ खेलते हुए देखकर उन्हीं विनायकद्वारा की गयी इस लीलाको कोई भी नहीं जान सका॥ ३९-४०॥ तदनन्तर अन्धकासुर तथा अम्भासुर नामक उन दोनों दैत्योंकी शक्ति क्षीण हो गयी और वे निश्चेष्ट हो गये। तब तुंग नामक दैत्य दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए बहुत जोरसे गरजा॥ ४१॥ मैं पर्वतका रूप धारणकर इस पक्षीको क्षणभरमें ही मार डालूँगा—ऐसा कहता हुआ वह तुंग नामक दैत्य उसी क्षण एक विशाल पर्वत बन गया। पाँच योजन विस्तारवाला वह पर्वत अनेक सरोवरों तथा नदियोंसे समन्वित था, वह पर्वत अपनी दिव्य औषधियोंके द्वारा आकाश तथा दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था॥ ४२-४३॥ उस पर्वतमें विविध प्रकारके पक्षी थे तथा वह ब्राह्मणोंके आश्रमोंसे सुशोभित था। तब वह पक्षिराज भी पंखयुक्त उस पर्वतको गिरता हुआ देखकर स्वयं भी उड़ते हुए घूमने लगा और उसने उस जलको रोक लिया तथा वह अपने पंखोंकी हवासे चराचर जगत्को घुमाने लगा॥ ४४-४५॥ उस समय पर्वतोंकी चोटियाँ इधर-उधर भूमिमें गिरने लगीं। पक्षीरूपी विनायकने अपनी चोंचके द्वारा उस तुंग पर्वतको उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे कश्यप- पुत्र गरुड़ सर्पको पकड़ लेते हैं। उस पर्वतको पकड़े हुए पक्षीरूपी विनायक आकाशमें घूम रहे थे। उन्होंने अपने एक पैर (पंजे)-से अन्धकासुरको तथा दूसरे पैर (पंजे)-से अम्भासुरको पकड़ रखा था॥ ४६-४७॥ महान् पक्षीरूप वे विनायक उसी रूपमें घूमते हुए भुवर्लोकको भी पार कर गये। वे दैत्य बहुत अधिक भ्रमण करा देनेसे अत्यन्त खिन्न हो गये और सूर्यकी तेज किरणोंद्वारा संतप्त हो गये॥ ४८॥ पर्वतके समान विशाल वे तीनों असुर प्राणोंसे रहित हो जानेपर भूमिपर गिर पड़े। गिरते हुए उन्होंने अनेक