भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 656 में से

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पृष्ठ 322

३२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वनों तथा उपवनोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ४९ ॥ उन दैत्योंके शरीरोंको देखनेके लिये स्त्रियों तथा बच्चोंके साथ वहाँके लोग नगरीके समीपमें गये और उन्हें देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए ॥ ५० ॥ उन दैत्योंके शरीरोंके टुकड़े चट्टानोंके समान लग रहे थे। इस प्रकार दैत्योंकी माया को देखकर सभी लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये ॥ ५१ ॥ वहाँसे लौटनेपर लोगोंने देवरूपी उस वटवृक्षको नहीं देखा। वटवृक्षके अन्तर्धान हो जानेपर बालक विनायकने वह पक्षीका रूप भी त्याग दिया। तब काशिराजने बालक विनायकका आलिंगन किया। नगरके निवासियों तथा स्वयं काशिराजने उनसे कुशल-समाचार पूछा और परम प्रसन्नतापूर्वक उन विघ्ननाशक विनायकका पूजन किया। लोगोंने महर्षि कश्यपजीके पुत्र उन विनायककी बड़ी ही प्रसन्नतासे प्रशंसा की ॥ ५२-५४ ॥ हे देव! हम लोग उन दैत्योंद्वारा उत्पन्न की गयी उस महान् मायाको नहीं जानते हैं और आपके सामर्थ्य तथा गुणोंको भी हम नहीं जानते हैं, जिनका वर्णन करनेमें वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं। आपने लीलापूर्वक हम सबकी रक्षा की है और महान् संकटसे मुक्त कराया है। आँधी- तूफान समाप्त हो गया है, अनेक प्रकारके उत्पात दूर हो गये हैं तथा वृष्टि भी रुक गयी है। अन्धकारके विनष्ट हो जानेपर सूर्यका बिम्ब दिखायी दे रहा है। उस समय सभी लोगोंके मन प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ ५५-५७ ॥ नदियाँ पहलेकी भाँति निर्मल जलवाली हो गयीं, जैसा पहले था, वैसा ही सब कुछ हो गया। देवताओंने देवाधिदेव उन विनायकके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५८ ॥ विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ सभी लोगोंने उस सुसज्जित काशीनगरीमें प्रवेश किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान यह कहते हुए दिया कि इस दानसे विनायकदेव हमपर प्रसन्न हों ॥ ५९ ॥ काशिराजने शान्तिहोम सम्पन्न करके बहुत-सा गोधन दानमें दिया। तदनन्तर सभीको विसर्जित करके काशिराजने विनायकके साथ स्वयं भी भोजन किया ॥ ६० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत '[अम्भासुर, अन्धकासुर तथा तुंगासुर नामक] तीन दैत्योंके वधका वर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना, बालक विनायकद्वारा उसका वध, देवताओं आदिके द्वारा विनायककी स्तुति ब्रह्माजी बोले- हे द्विज व्यासजी! मेरे द्वारा कहे जानेवाले बालक विनायकके महान् आश्चर्यजनक चरित्रका आप श्रवण करें, वह मनुष्योंके सभी पापोंको दूर करनेवाला है। अम्भासुरका जो सिर कटकर उसके घरमें जाकर गिरा था, उसे उसकी माता भ्रमराकी सखीने देखा और भ्रमराको बतलाया ॥ १-२ ॥ उस समय भ्रमरा सोनेसे बने पलंगपर सोयी थी, वह झटसे उठकर आँगनमें आयी और अपने पुत्रके सिरको देखकर मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥ शोकमें निमग्न होकर वह अपने दोनों हाथोंसे अपनी छाती पीटने लगी। उसके आभूषण गिरने लगे, वह हाथीके द्वारा कुचली हुई कमलिनीके समान खिन्न हो गयी। उसके हाथोंके कंगन बिखर गये। उसकी चोली फट गयी, वह अत्यन्त दुर्बल-सी हो उठी। कपड़ोंके बिखर जानेसे उसका विशाल शरीर कुछ-कुछ नग्न-सा दिखलायी पड़ने लगा। वह विह्वल होकर भूमिपर लोट-पोट करने लगी ॥ ४-५ ॥ सखियों, भाइयों तथा स्वजनोंके द्वारा वैसा करनेसे रोकी जाती हुई उसे तीन मुहूर्त बीत जानेपर होश आया और वह कुछ बोलने लगी। वह उठ पड़ी और अपने दोनों हाथोंसे पुनः अपना सिर पीटने लगी ॥ ६ १/२ ॥ भ्रमरा बोली- जिसने अमरावतीसहित सम्पूर्ण