श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] जिस प्रकारसे व्यक्ति मुख, नाक, हाथ आदि विभिन्न अंगोंके भिन्न होनेपर भिन्न नहीं होता। उसी प्रकारसे यह आत्मा भी जरायुज, स्वेदज आदि चार प्रकारके प्राणियोंमें अलग-अलग नहीं होता अर्थात् एक समान रूपसे स्थित रहता है। इस प्रकारसे प्रलोभनमें डाली गयी वे स्त्रियाँ परपुरुषोंके साथ भी सम्पर्क करने लगीं। ब्राह्मणोंका अग्निहोत्र तथा अन्य यज्ञोंके प्रति आदर शिथिल हो गया ॥ १३-१४॥ व्रतमें, दानमें, होममें, देवताओं तथा ब्राह्मणोंके पूजनमें और यज्ञीय पशुओंके आलभनमें लोग संशय करने लगे। [ब्राह्मणोंको न बुलाकर] लोग परस्पर एक-दूसरेके घरोंमें जाकर श्राद्ध-सम्बन्धी तथा व्रतोपवास-सम्बन्धी उत्तम भोजनको स्वयमेव ही करने लगे ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार वहाँ [वैदिक] धर्मका लोप होने लगा और पापकी वृद्धि हो गयी। तदनन्तर बौद्धरूप विष्णु शीघ्र ही राजा दिवोदासके भवनमें गये। राजा दिवोदासने अपने शुभ आसनपर बैठाकर परम भक्तिभावसे उनका पूजन किया। तदनन्तर बोलनेमें अत्यन्त कुशल बौद्धने दिवोदाससे यह वचन कहा- ॥ १७-१८ ॥ बौद्ध बोले— हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके हितकी बात बताता हूँ, उसे सुनकर आप आदरपूर्वक उसका पालन करें। इस वाराणसी नगरीका त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने अपने तेजसे निर्माण किया है। प्रलयकालमें भी वे सभी प्राणियोंके साथ इस वाराणसीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। इस नगरीमें पुण्यात्माजनों तथा मरनेके अनन्तर मोक्ष चाहनेवाले लोगोंके द्वारा ही निवास किया जाना चाहिये ॥ १९-२० ॥ पापात्मा जनोंको भैरवद्वारा इस नगरीसे बाहर कर दिया जाता है और पुण्यात्मा जनोंकी रक्षा भगवान् शिव तथा भैरव यहाँ करते रहते हैं। आपका पुण्य जबतक था, तबतक तो आप काशीमें राज्य करते हुए यहाँ स्थित रहे, किंतु अब आप वैसे पुण्यात्मा नहीं रहे। हे राजन् ! आपके राज्यमें नरकको प्राप्त करानेवाला पाप प्रवृत्त हो चुका है ॥ २१-२२१/२॥ राजा दिवोदास बोले— आपने मुझसे ठीक ही
[दायाँ स्तम्भ] कहा है, मैं आपके वचनोंका पालन करूँगा। ज्योतिर्विद् ढुंढिराजने पहले जो कहा, वह सत्य ही हो रहा है। हे पुरुषोत्तम ! यदि मैं आपके यथार्थ स्वरूपको जान सकूँ तो आप मुझे बतायें कि आप कौन हैं? जो मेरा हित करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर दयाके वशीभूत होकर उन्होंने राजा दिवोदासको अपना शंख, चक्र एवं गदाधारी चतुर्भुजरूप दिखाया। उन्होंने अपना विराट् एवं व्यष्टिरूपात्मक चित्स्वरूप उन्हें दिखलाया ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर राजा दिवोदासने अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्हें नमस्कार करके उनका पूजन किया। उनके दर्शनोंसे आह्लादित हुए राजा परम भक्तिपूर्वक नृत्य करने लगे ॥ २७ ॥ वे उनसे बोले—हे अनघ ! आज मैं अपने पितरोंसहित धन्य हो गया। पहले मैंने राज्यका त्यागकर बहुत-सा तप किया था। ब्रह्माजीने जबरदस्ती यह काशीका उत्तम राज्य मुझे सौंपा था। आज आपका दर्शन कर लेनेसे मेरे जन्म तथा मरण—दोनोंका बन्धन छूट गया है, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं आपके शरणागत हूँ और आपसे यही वरदान माँगता हूँ ॥ २८-२९१/२ ॥ मुनि (गृत्समद) बोले— ऐसा कहे जानेपर वे परमात्मा उन नृपश्रेष्ठ दिवोदाससे बोले—हे श्रेष्ठ राजन् ! भगवान् विश्वेश्वरकी कृपासे आपको भी परम मुक्ति प्राप्त होगी, इस समय आप काशीके राज्यका परित्यागकर सुखी हो जायँ ॥ ३०-३१ ॥ यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो भैरव और दण्डपाणि आपको काशीसे बाहर कर देंगे। उनका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा दिवोदास अत्यन्त चिन्तित हो उठे। तदनन्तर उनके कथनके कारणपर ध्यान लगाकर तथा विचार करके राजाने वह सब कुछ जान लिया कि ज्योतिषीके रूपमें वे ढुंढिराज गणेश थे। बौद्ध बनकर ये मायावी विष्णु ही यहाँ आये हुए हैं ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर उन्होंने सिर झुकाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और उनसे कहा—आप कौन हैं? तब वे महाविष्णु भी उनकी भावनाको समझ करके अपने वास्तविक रूपमें [पुनः] प्रकट हो गये। उस समय वे