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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 656 में से

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पृष्ठ 385

क्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रभु चतुर्भुजरूपमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये थे। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था और वे सभी लोकोंके परम आश्रयस्वरूप थे॥ ३४-३५॥ तब राजा दिवोदास उनसे बोले—हे पूज्य! आज मैं धन्य हो गया तथा मेरे पूर्वज भी धन्य हो गये, जो कि मैंने अपने पुण्यके प्रभावसे मोक्ष प्रदान करनेवाले आपके चरणयुगलका दर्शन किया है। आप मुझे परम मोक्ष प्रदान करें और इस मुद्राको ग्रहण करें, जिसे कि ब्रह्माजीने मुझे हठात् प्रदान किया था। अब आजसे यहाँ भगवान् शिव अपना राज्य शासन करें। तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—भगवान् शिव आपको मुक्ति प्रदान करेंगे॥ ३६-३७१/२॥ ब्रह्माजी बोले—राजा दिवोदाससे ऐसा कहकर महायोगेश्वर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये और पुनः बौद्धरूप धारणकर अपने आश्रमको चले गये। तत्पश्चात् उन्होंने भगवान् शिवके वहाँ आगमनके लिये दूतको भेजा। [दूतने भगवान् शिवसे कहा—] 'ज्योतिर्विद् ढुण्ढिराज गणेशने और मैंने राजा दिवोदासके राज्यमें बहुत प्रकारसे अधर्मकी वृद्धि की है और राजा दिवोदासने आपके लिये काशीके राज्यका परित्याग कर दिया है। अतः हे विश्वेश्वर! आप शीघ्र ही अपनी वाराणसीपुरीमें आयें'॥ ३८-४०१/२॥

इधर राजा दिवोदासने राजाके चिह्नोंका परित्याग करके महान् तप किया। उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिरमें अपने नामसे एक अत्यन्त विख्यात शिवलिंग (दिवोदासेश्वर)-की स्थापना की, वह लिंग सकाम उपासना करनेवालोंकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाला है और मोक्षार्थियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। वे राजा दिवोदास सभी प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म- अर्थ-काम तथा मोक्ष)-को प्रदान करनेवाले भगवान् शंकरके दर्शनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ४१-४२॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दिवोदासके] राज्य-त्यागका वर्णन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥

अड़तालीसवाँ अध्याय ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना, भगवान् शिवका काशीमें आकर ढुण्ढिराजकी स्तुति करना तथा ढुण्ढिराजकी महिमाका प्रतिपादन करना, रानी कीर्तिका काशी आकर ढुण्ढिराजकी भक्ति करना, ढुण्ढिराजका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे तथा उसके पुत्रको अनेक वर प्रदानकर कीर्तिपुत्रका 'पर्शुबाहु' नामकरण करना

मुनि गृत्समद बोले—राजा दिवोदासने काशीका राज्य छोड़ दिया है—ऐसा जानकर ढुण्ढिराज गणेश ज्योतिषीका रूप छोड़कर पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें आ गये और सभी लोगोंको सब प्रकारका अभिलषित पदार्थ देनेवाले बनकर ढुण्ढिविनायक नामसे काशीमें स्थित हो गये॥ १॥ तदनन्तर आनन्दमें निमग्न हुए महाबुद्धिमान् ढुण्ढिराजने भगवान् शिवके पास यह सन्देश कहकर दूत