श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भेजा कि आप शीघ्र ही काशीमें चले आयें ॥ २ ॥ भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ होकर दिव्य वाद्योंके घोषके साथ अपने गणोंसे घिरे हुए रहकर वाराणसीकी ओर चल पड़े। वहाँ निराहार रहकर महर्षि जैगीषव्य, जो तपस्या करते-करते दीमककी बाँबीके समान हो गये थे, उनपर कृपा करके भगवान् शिव ढुण्ढिविनायकको प्रणाम करके उनसे बोले- ॥ ३-४॥ भगवान् शिव बोले- हे विश्वेश्वर! आप ही विश्वरूप हैं, हे देव! आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। आप ही इसकी रक्षा करते हैं और आप ही इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप जीवोंके शुभ एवं अशुभ कर्मोंके द्रष्टा हैं और उन्हें तदनुरूप विविध प्रकारका सुख-भोग प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५ ॥ इस चराचर जीव-जगत्का आप संहार करनेवाले हैं और आप ही सत्त्वादि तीन गुणोंमें विभेद करनेवाले हैं। आपके ही कृपाप्रसादसे भगवान् विष्णु, पद्मयोनि ब्रह्मा और भगवान् शिव अपने-अपने कर्मोंको करनेमें समर्थ होते हैं। आपके बिना वेदोंका विधि-विधान व्यर्थ हो जाता है और आपकी ही कृपाशक्तिसे देवताओंके शत्रु असुरोंका विनाश होता है ॥ ६-७॥ पूर्वकालमें अनन्तशक्तिसम्पन्न प्रकृतिस्वरूपा महिषासुरमर्दिनी दुर्गाने आपका ही पूजन करके महिषासुरका वध किया था और उस समय महिषासुरके द्वारा छोड़ी गयी श्वासवायुके द्वारा उड़ाये गये पर्वतोंके गिरनेके भयसे भयभीत इस समस्त विश्वकी रक्षा भी की थी ॥ ८ ॥ आप अप्रमेय हैं, सम्पूर्ण लोकके साक्षीस्वरूप हैं, आप अविनाशी हैं, आप कारणोंके भी कारण हैं, सम्पूर्ण वेदराशि आपका वर्णन करनेमें कुण्ठित हो जाती है। आपकी उपासनाके बलपर ही शेषनाग इस पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ९ ॥ सन्त-महात्माजन आपको ही प्रणाम करके आपकी भलीभाँति पूजा करते हैं और मनसे आपका ही स्मरण करते हुए यजन करते हैं। निष्कामीजन भी आपकी ही भक्ति करते हुए आवागमनसे रहित मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ १० ॥ आप अनेक स्वरूपवाले हैं, आप अनेकों पैर, अनेकों नेत्र, अनेकों सिर, अनेकों कान, अनेकों बाहु और अनेकों जिह्वावाले हैं। आप अनन्तविज्ञानघन हैं, अनेकों ब्रह्माण्डोंके कारणरूप हैं और परम प्रकाशमान हैं। हे अखिलेश्वर! आपकी कृपाके फलस्वरूप ही चिरकालतक प्रयत्न करनेके पश्चात् मैं इस अविमुक्तक्षेत्र काशीका दर्शन कर पाया हूँ ॥ ११ ॥ मुनि गृत्समद बोले- इस प्रकार उन ढुण्ढि- विनायककी स्तुति करके और उनकी पूजा करके भगवान् शंकर उनसे प्रार्थना करते हुए बोले- [हे प्रभो!] काशीपुरीको पाकर अब काशीकी विरहजन्य मेरी पीड़ा दूर हो गयी है। अब आप मेरे भक्तों तथा इस काशीपुरीकी सदा रक्षा करते रहें, बिना आपकी कृपाके काशीमें निवास करना किसी प्रकार सम्भव न हो ॥ १२-१३॥ दण्डपाणि भैरव और आप ढुण्ढिविनायककी जिसपर कृपा होगी, उसीको मैं उसके मृत्युकालमें तारक ब्रह्मका उपदेश दूँगा, इसके अतिरिक्त और किसीको भी नहीं दूँगा। माघमासकी [कृष्णपक्षकी] चतुर्थी तिथिमें मंगलवारके दिन चन्द्रोदय होनेपर जो व्यक्ति पुओं, मोदकों तथा अन्य उपचारोंद्वारा आपका पूजन करेगा और जो इस स्तोत्रके पाठसे आपका स्तवन करेगा, उसके भी कष्टोंको दूर करके आप उसके समस्त मनोरथोंको पूर्ण करें और अनेक प्रकारकी धन-सम्पत्ति उसे प्रदान करें ॥ १४- १६ ॥ प्रातःकाल उठकर जो तीनों कालोंमें अथवा एक समय भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे भोग तथा मोक्ष प्राप्त होगा। यहाँ आप अन्वेषण करके मनुष्योंको सभी पदार्थोंको प्रदान करते हैं, अतः आप 'ढुण्ढि' इस नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे ॥ १७-१८ ॥ आपका 'ढुण्ढि' यह नाम मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। साथ ही इस नामका स्मरण करनेसे यह सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान करनेवाला होगा ॥ १९ ॥