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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 656 में से

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पृष्ठ 390

३८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तदनन्तर पुत्रको राज्य सौंपकर वे स्वर्गलोकको गये। भगवान् ढुंढिविनायकका सारूप्य प्राप्तकर वे अनेक कल्पोंतक स्वर्गलोकमें स्थित रहे ॥ १७-१८ ॥ [ ब्रह्माजी बोले— ] हे मुने! इस प्रकारसे मैंने शमीके प्रभावका, उसके द्वारा विनायकके पूजनसे प्राप्त होनेवाले पुण्यका तथा मन्दारकी महिमाका भी वर्णन संक्षेपमें आपसे निरूपित किया। इसलिये आपके द्वारा भी शमी एवं मन्दारके द्वारा विनायकका पूजन किया जाना चाहिये, भक्तिभावपूर्वक उन इष्टदेवके लिये समर्पित किया गया पत्र-पुष्प उन्हें अमृततुल्य प्रिय प्रतीत होता है ॥ १९-२० ॥ तत्तद् देवताके लिये निषिद्ध पत्र-पुष्प अर्पित करनेवाला नरक प्राप्त करता है। जिसका जो मुख्य आराध्य देवता होता है, उसके लिये विहित पत्र-पुष्पादि अर्पण करनेवाला अथवा अन्य देवोंको अपने अभीष्ट देवकी बुद्धिसे पत्र- पुष्पोंको अर्पित करनेवाला भक्त दोषको प्राप्त नहीं होता है, इस प्रकार गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु एवं सूर्य—इन पंचदेवोंकी आराधनासे व्यक्ति अपने अभीष्ट देवको प्राप्त होता है ॥ २१-२२ ॥ सात्त्विक पूजा करनेवाला सात्त्विक भक्त अपने अभीष्ट देवका तादात्म्य प्राप्त करता है, राजस पूजा करनेवाला देवताका सारूप्य प्राप्त करता है, सतोगुणी उपासना एवं रजोगुणी उपासना—इन दोनों भावोंसे [मिश्रित] उपासना करनेवाला भक्त देवताके सामीप्यको प्राप्त करता है और तामसी स्वभाववाला तामसी उपासनाके द्वारा देवताके लोकको प्राप्त करता है। इस प्रकार सात्त्विक, राजस एवं तामस—तीनों प्रकारकी भक्ति निष्फल नहीं होती ॥ २३ १/२ ॥ व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! विनायकका लोक किस लोकमें स्थित है, मेरे इस संशयको आप इस समय दूर करें, हे प्रभो! सब कुछ जाननेवाले आपको छोड़कर मैं अन्य किससे पूछूँ? ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] इस विषयमें मैंने देवर्षि नारदजीको बतलाया था, उन्होंने महर्षि मुद्गलको बताया, महर्षि मुद्गलने विनायकके उस मांगलिक लोकके विषयमें काशिराजको बतलाया ॥ २६ ॥ प्राचीन समयमें उन विनायकने अपनी कामदायिनी शक्तिसे स्वयं ही उस लोकका निर्माण किया और उन्होंने 'निजलोक' यह उसका नाम रखा ॥ २७ ॥ काशिराजने अपने चर्मचक्षुओंसे उस विनायकलोकका विमानमें स्थित रहकर दर्शन किया था, जिसे प्राप्त करके स्त्री अथवा पुरुष—कोई भी हो, वह न तो दुःख प्राप्त करता है और न काम-क्रोधादि द्वन्द्वोंसे बाधित होता है ॥ २८ ॥ उस निजलोकमें व्यक्ति ज्योतिर्मय स्वरूपको प्राप्तकर ब्रह्माजीके कल्पपर्यन्त निवास करता है और [अमृतोपम रससे पूर्ण] उस इक्षुसागरका आनन्द लेता है, जो कि वहींपर अवस्थित है ॥ २९ ॥ वह विनायकलोक महाप्रलयकी वेलामें भी विद्यमान रहता है, वह अविनाशी लोक है और उन विनायकदेवका सनातन पीठ एवं निद्रास्थान है ॥ ३० ॥ वहाँ सिद्धि तथा बुद्धि नामकी उनकी दो पत्नियाँ उनकी सेवा करती रहती हैं, सामवेद अपनी सामध्वनियोंके द्वारा उनकी महिमाका गान करते रहते हैं। मनुष्यके द्वारा जिस-जिस भी वस्तुकी कामना की जाती है, वहाँ स्थित कल्पवृक्ष वह सब उन्हें प्रदान करता है ॥ ३१ ॥ उस कल्पवृक्षके प्रभावसे वहाँ अकल्पनीय वस्तुएँ भी प्राप्त हो जाती हैं। मैंने कई बार सभी लोकोंका विविध प्रकारसे वर्णन किया है, किंतु गणेशजीके निजलोकका वर्णन करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, अब आप आगे क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमीपत्र एवं मन्दारपुष्पसमर्पणके फलका वर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥