श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५० ] * मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायक-लोकका परिचय बताना * ३८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचासवाँ अध्याय महर्षि मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायकके लोक 'स्वानन्दभुवन' का परिचय बताना तथा सदैव वहाँ विद्यमान रहनेवाले विनायकके स्वरूपका निरूपण करना, मुद्गलजीके उपदेशसे काशिराजद्वारा गणेशोपासना और अन्तमें विनायक-लोकको प्राप्त करना
[बायाँ स्तम्भ] व्यासमुनि बोले— [हे ब्रह्मन् !] काशिराजने महर्षि मुद्गलजीके उपदेशसे किस प्रकार विनायकके उस उत्तम स्थानको प्राप्त किया, इसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—तीर्थयात्राके प्रसंगसे एक बार महर्षि मुद्गल काशिराजके पास गये। राजाने उनका आतिथ्य- सम्मान करके उन सर्वज्ञ मुनि मुद्गलसे पूछा— ॥ २ ॥ राजा बोले—विनायकका लोक कौन-सा है? और मेरेद्वारा उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? ॥ २१/२ ॥ मुद्गल बोले— [हे राजन् !] स्वानन्दभुवन तथा निजलोक—ये दो अत्यन्त प्रसिद्ध नाम विनायकलोकके हैं। जब देवान्तक तथा नरान्तक नामके दो दैत्य उत्पन्न होंगे, तब विनायक भी उनके वधके लिये मनुष्यरूपमें अवतरित होंगे ॥ ३–४१/२ ॥ वे पराक्रमी विनायक अपनी इच्छाके अनुसार इस मनुष्यलोकमें बालकरूपसे अद्भुत पराक्रमशाली लीला करेंगे। हे राजन् ! जब आप अपने पुत्रके विवाहके उद्देश्यसे उन्हें अपने घर लायेंगे, तो उस समय वे [अपना लोकोत्तर] पुरुषार्थ प्रदर्शित करेंगे और [लीलावश] भगवद्भक्त निर्धन 'शुक्ल' नामक ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी दुर्लभ अमोघ लक्ष्मी प्रदान करेंगे [तथा और भी बहुत-सी लीलाएँ करेंगे], हे काशिराज ! हे महाबाहु! तब (उसी समय) आप उनकी भक्तिके प्रभावसे विनायकके निजलोकको प्राप्त करेंगे ॥ ५-८ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर मुनि मुद्गलके चले जानेपर महान् बुद्धिमान् काशिराज गणेशजीकी भक्ति करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर लीलाके लिये विग्रह धारण करनेवाले वे प्रभु विनायक कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुए ॥ ९-१० ॥ उन्होंने अनेकों दैत्योंका वध किया और नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ कीं। शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्होंने
[दायाँ स्तम्भ] शीघ्र ही उसके दारिद्र्यका हरण कर लिया। तदनन्तर वे काशिराजके भवनमें [पुनः लौट] गये। उन्होंने [उसी अवतारकालमें] देवान्तक तथा नरान्तक नामक महाबलशाली दो दैत्योंका वध किया ॥ ११-१२ ॥ तत्पश्चात् वे विनायकदेव क्षीरसागरके मध्य स्थित अपने 'स्वानन्दभुवन' नामक लोकको चले गये। तबसे काशिराज विनायकके विरहसे दुखी होकर सदा उनका स्मरण-ध्यान किया करते थे ॥ १३ ॥ वे अपनी राजसभाके मध्य किसी पुरुषको यह समझकर आलिंगन कर लेते थे कि यही विनायक है। वे सम्पूर्ण जगत्को विनायकरूप समझते थे ॥ १४ ॥ वे दिन-रात ध्यानमें उनका दर्शन करते हुए विनायकमय ही हो गये थे। कभी वे निराहार ही रह जाते थे। उन दिनों कभी वे अपनी रुचिके अनुसार एक ग्रासमात्र ही भोजन करते, कभी वे हँसने लगते तो कभी नाचने लगते ॥ १५-१६ ॥ स्वप्नमें वे उन विनायकका दर्शन करके बहुत समयतक सोते ही रह जाते थे। राजाकी इस प्रकारकी अन्यमनस्कताकी स्थिति देखकर उनके मन्त्रीगण अत्यन्त चिन्तित हो उठे ॥ १७ ॥ वे यह सोचने लगे कि यदि लोग राजाकी इस प्रकारकी मनःस्थितिके विषयमें जान जायँगे तो शत्रुओंकी सेना आक्रमण कर सकती है। इस प्रकारकी चिन्ता करते हुए जब मन्त्रीगण राजाके दरबारमें उपस्थित थे, तो उसी समय महर्षि मुद्गल अपना ध्यान भंगकर राजाके पास आये। उन मुनिके दर्शनसे चेतनाको प्राप्त हुए राजाने उन्हें प्रणाम किया ॥ १८-१९ ॥ उन्हें आसनपर बैठाकर राजाने यथाविधि उनका पूजन किया और फिर हाथ जोड़कर कहने लगे—'हे मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा वंश धन्य हो गया, मेरा