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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 656 में से

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पृष्ठ 392

जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा भवन धन्य हो गया और मेरे नेत्र धन्य हो गये। जिनकी कृपासे मनुष्योंको संसारसे तारनेवाला परम स्थान प्राप्त होता है और जिनकी अवमाननासे महान् दुःखोंकी प्राप्ति होती है, उन्हीं आपका मैंने बड़े ही पुण्यके प्रभावसे आज दर्शन किया है।' तदनन्तर उनकी वाणीसे परम सन्तुष्ट होकर वे ब्राह्मण मुद्गल उनसे बोले- ॥ २०-२२॥ मुद्गल बोले - [हे राजन्!] आप-जैसा विनीत स्वभाववाला व्यक्ति न तो मैंने देखा है और न आप- जैसे व्यक्तिके विषयमें कुछ सुना ही है। आपके द्वारा किये गये पूजनसे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। मैं आपके मनोरथको पूर्ण करूँगा ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी बोले- महर्षि मुद्गलके वचनसे परम सन्तुष्टिको प्राप्त काशिराज उनसे बोले- 'हे मुने! मैं इसी शरीरसे विनायकके धाम स्वानन्दभुवनको प्राप्त करना चाहता हूँ और वहाँ चिरकालतक रहना चाहता हूँ। मुझे अन्य किसी सम्पदाकी आवश्यकता नहीं है।' तदनन्तर महर्षि मुद्गल उनसे बोले- 'मैं आपकी वाणीसे सन्तुष्ट हूँ। हे राजन्! आप अपने इसी पांचभौतिक जड़ देहसे विनायकजीके 'स्वानन्दभुवन' नामक उस लोकको प्राप्त करेंगे, जो जन्म-मरणके बन्धनसे सर्वथा रहित है। वहाँ पाँच हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारकी सम्पदाओंका उपभोग करनेके अनन्तर आप ब्रह्माजीके एक कल्पपर्यन्त परम आनन्दको प्राप्त करेंगे' ॥ २४-२७ ॥ राजा बोले - मुने! विनायकका वह लोक कैसा है? उसका क्या नाम है? आप सत्य-सत्य बतायें। उस लोकमें किस पुण्यके द्वारा जाना होता है। मैंने अन्य लोकोंके विषयमें तो बहुत कुछ सुन रखा है, पर इस लोकको मैं नहीं जानता ॥ २८ ॥ मुद्गलजी बोले - हे राजन्! सुनिये, मैंने महर्षि कपिलजीके मुखसे उस लोककी महिमाको सुना है। आपने जिन लोकोंके विषयमें सुना है, वे सामान्यतः प्रसिद्ध हैं ॥ २९ ॥ हे भूपते! इस गणेशलोककी गति अत्यन्त गहन है। इस स्वानन्दभुवन लोकका एक नाम दिव्यलोक है और दूसरा नाम निजलोक है। हे महामते! उस लोकमें भगवान् विनायक कामदायिनी नामक पीठमें विराजमान रहते हैं, वह पाँच हजार योजनके विस्तारवाला है। वहाँकी भूमि रत्नमयी तथा सुवर्णमयी है। वहाँ वे विनायक दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सुशोभित होते हैं। स्वानन्दभुवन नामका वह दिव्य लोक इक्षुसागरके मध्यमें स्थित है ॥ ३०-३२ ॥ न वेदोंके पारायणसे, न दानसे, न व्रत-यज्ञ और जपसे, न ही विविध प्रकारकी तपस्याओंके द्वारा कभी भी वह लोक प्राप्त किया जा सकता है। भगवान् विनायककी कृपा और उनकी निरन्तर भक्तिसे ही वह प्राप्त होता है। विघ्नराट् विनायक वहाँ समष्टि तथा व्यष्टिरूपसे निरन्तर विद्यमान रहते हैं ॥ ३३-३४ ॥ वे विनायक अपने पैरोंसे सातों पातालोंको व्याप्त करके स्थित हैं। वे शेषनागके सहस्र सिरोंको तथा जलमें स्थित कूर्मको [आक्रान्त किये हुए हैं।] उन्होंने कानोंके द्वारा सभी दिशाओंको व्याप्त कर रखा है। बालोंके द्वारा आकाशमण्डलको धारण करके वे आधारकमलपर विद्यमान हैं। पुण्यात्माजन भ्रूमध्यमें स्थित अग्निचक्रमें विद्यमान द्विदल कमलमें उनका ध्यान करते हैं ॥ ३५-३६ ॥ खेचरी मुद्रासे समन्वित सिद्ध साधक ही उनका ध्यान कर सकता है, दूसरा और कोई ध्यानमें समर्थ नहीं हो पाता। प्रभासे सुशोभित सहस्र दलोंवाला जो ब्रह्माण्डकमल है, उस ब्रह्माण्डकमलमें वे विनायक तेजोरूपसे स्थित रहते हैं। इसी प्रकार हृदयमें स्थित द्वादशदल कमलमें, नाभिचक्रमें स्थित दशदल कमलमें, लिंगदेशमें स्थित शुभ षड्दल कमलमें और कण्ठदेशमें स्थित षोडशदल कमलमें वे विघ्नराट् तेजःस्वरूपमें देदीप्यमान होकर उसी तरह सर्वत्र विद्यमान रहते हैं, जैसे कि सत्यलोकमें ब्रह्मा विद्यमान रहते हैं ॥ ३७-३९ ॥ द्वादशदल कमल वैकुण्ठ है, वहाँ भगवान् विष्णु सदा विद्यमान रहते हैं, कण्ठमें स्थित षोडशदल कमलमें पंचवक्त्र भगवान् शिव अपने गणोंके साथ उसी प्रकार निवास करते हैं, जैसे कि कैलासमें रहते हैं ॥ ४० ॥ चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि-ये विनायकके तीन नेत्र