भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 656 में से

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पृष्ठ 393

क्री०ख०-अ०५० ] * मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायक-लोकका परिचय बताना * ३९१

[बायाँ स्तम्भ] हैं। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल उनका उदरदेश है। वे विनायक इक्कीस स्वर्गोंमें व्याप्त हैं। औषधियाँ उनके रोम हैं। नदियाँ तथा सागर उनके पसीनेकी बूँदके रूपमें भासित होते हैं। उनके प्रत्येक रोमके अन्तर्गत [अनन्तानन्त] ब्रह्माण्ड धूलिकणोंके समान अवस्थित हैं ॥ ४१-४२ ॥ तैंतीस करोड़ देवता और जो हजारों प्रकारके जीव हैं, वे उनके प्रत्येक रोमकूपमें उसी प्रकार आभासित होते हैं, जैसे कि गूलरमें बैठे हुए मच्छर ॥ ४३ ॥ हे राजन् ! अब मैं विनायकके उस लोककी रचनाके विषयमें संक्षेपमें बताता हूँ। मेरुपर्वतका जो उच्च शिखर है, वह कैलासशिखरके समान है। वह हजार योजन ऊँचा है। वह जनशून्य तथा श्रेष्ठ मुनिजनोंके लिये भी अगम्य है। वहाँपर एक उच्च शक्ति है, जिसका नाम भ्रामिका है ॥ ४४-४५ ॥ उस शक्तिके चारों ओर विशुद्ध तेजवाले भ्रमर गुंजन करते रहते हैं। उस भ्रामिका शक्तिके ऊपर पद्मासनपर आधारशक्ति स्थित है, जो स्वर्णिम आभावाली है। उस आधारशक्तिके मस्तकपर कामदायिनी नामक शक्ति है, उसकी आभा करोड़ों सूर्योंके समान है, उसीके मस्तकपर बृहत्तम गणपतिपीठ अवस्थित है ॥ ४६-४७ ॥ वह अत्यन्त विकराल जटाओंके भारको धारण किये रहती है तथा [वैसे ही विकराल मुखसे युक्त है।] वह हजारों सूर्योंके समान प्रकाशमान है और अपनी आभासे दसों दिशाओंको द्योतित करती रहती है। उस (पीठ) का विस्तार दस हजार योजन है, उतनी ही उसकी चौड़ाई भी है। उस पीठके मध्यमें एक योजन चौड़ा स्वानन्दभुवन नामक लोक है, जो असंख्यों सूर्योंके समान आभावाला है। वहाँपर स्वर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित असंख्य गृह हैं, जो गज- मुक्ताके समान प्रभासे सम्पन्न हैं। वह स्वानन्दभुवन नामक विनायकधाम दुःख तथा मोहसे रहित है, उन विनायककी कृपासे ही वह लोक प्राप्त हो सकता है। उस स्वानन्दभुवनसे उत्तर दिशामें श्रेष्ठ इक्षुसागर है ॥ ४८-५१ ॥ उस इक्षुसागरके मध्यमें सहस्रदलकमलसे समन्वित एक मंगलमयी पद्मिनी (पुष्करिणी) है, उस (पुष्करिणी)- के मध्यमें सहस्र दलोंवाला एक कमल उसी प्रकार

[दायाँ स्तम्भ] सुशोभित होता है, जिस प्रकार कि चन्द्रमा [आकाशमण्डल- में] शोभित होता है। उस सहस्रदल कमलकी कर्णिकामें एक शय्या है, जो रत्नों तथा स्वर्णसे निर्मित है। हे राजन् ! उसी तल्पमें दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए भगवान् विनायक शयन करते हैं ॥ ५२-५३ ॥ उनकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियाँ बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक सदैव उनके चरणोंको दबाया करती हैं। सामवेद मूर्तिमान् विग्रह धारणकर भक्तिपूर्वक उनकी महिमाका गान करते रहते हैं। सभी शास्त्र मूर्तिमान् होकर उनका स्तवन करते रहते हैं। सभी पुराण उनके सद्गुणोंका वर्णन करते रहते हैं ॥ ५४-५५ ॥ उस स्वानन्दभुवनमें सहस्रदलकी कर्णिकामें स्थित तल्पके ऊपर भगवान् विनायक बालरूप धारणकर विराजमान रहते हैं। वे अपनी सूँड़से सुशोभित रहते हैं। उनके सभी अंग अत्यन्त कोमल हैं। उनकी आभा अरुणवर्णकी है। उनके नेत्र विशाल हैं। वे दाँतवाले हैं। उन्होंने मुकुट तथा कुण्डल धारण कर रखे हैं। उनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक सुशोभित है। स्वतः प्रकाशमान वे विनायक दिव्य मालाओं तथा वस्त्रोंको धारण किये हुए हैं, उनके शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन लगा हुआ है ॥ ५६-५७ ॥ वे मोतियों तथा मणियोंकी माला धारण किये हैं, जिसमें अनेक रत्न लगे हुए हैं। वे विनायक अनन्त कोटि सूर्योंके समान ओजसे सम्पन्न हैं और उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र सुशोभित है। वे विनायक भगवान् स्मरणमात्र करनेसे मनुष्योंके पापोंको उसी प्रकार तत्क्षण विनष्ट कर देते हैं, जैसे कि गंगाजी करती हैं। हे राजन् ! उनकी शय्याके दोनों ओर तेजोवती तथा ज्वालिनी नामक दो शक्तियाँ सदैव स्थित रहती हैं, जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रभावाली हैं ॥ ५८-५९१/२ ॥ उस स्वानन्दभुवन नामक लोकमें न तो शीत है, न वृद्धावस्था है, न थकावट है, न स्वेद है और न तन्द्रा ही है। वहाँ भूख एवं प्यास तथा दुःख कभी भी नहीं होता है। अपने पुण्यके प्रभावसे जो व्यक्ति वहाँ निवास करते हैं, वे सदा ही आनन्द-सरोवरमें निमग्न रहते हैं; क्योंकि वहाँ विश्वमें व्याप्त रहनेवाले, बालकका स्वरूप

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