श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- धारण किये हुए तथा विश्वको जाननेवाले भगवान् श्रीविनायक सर्वदा विद्यमान रहते हैं॥ ६०-६११/२ ॥ मुद्गलजी बोले- हे राजन् ! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार भगवान् गणेशजीके लोकका वर्णन किया, अब आप भी अनन्य भक्तिपूर्वक उन विनायककी आराधना करें॥ ६२१/२॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर महर्षि मुद्गल अपने स्थानको चले गये। इधर काशिराज भी गणेशजीकी आराधनामें तत्पर हो गये। उन्होंने पाँच हजार वर्षतक राज्य किया, तदनन्तर वे इसी शरीरसे विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् विनायकके उस स्वानन्दभुवन नामक धाममें गये ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गणेशलोकवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥ इक्यावनवाँ अध्याय काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन व्यासजीने पूछा- हे भगवन् ! यह मुझे बताइये कि काशिराजने किस रीतिसे विघ्नराज गणेशकी आराधना की और कैसे उन्होंने चर्मदेह (पार्थिव शरीर)-से [गणपतिके] परमोत्तम धामको प्राप्त किया? [गणपतिकी लीलाकथाओंको] सुनता हुआ मैं कभी तृप्त नहीं होता ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे परम बुद्धिमान् ! इस पापनाशिनी कथाका तुम भली-भाँति श्रवण करो। हे महाप्राज्ञ ! जिस प्रकार आसक्तिहीन काशिराजने स्वानन्दभुवन (गणपति धाम)-को प्राप्त किया था, वह प्राचीन वृत्तान्त मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ २-३ ॥ ज्ञानसिन्धु महर्षि मुद्गलसे [गणपतिके] माहात्म्यको जानकर वे नरेश मन, वचन तथा कर्मसे गणेशजीकी भक्तिमें तत्पर हो गये ॥४॥ वे विनायकदेवकी प्रसन्नताके लिये धेनु, गज, अश्व, भवन, अन्न आदिका दान तथा [धर्मशास्त्रोक्त] दशविध दान एवं और भी बहुत-से दान बारम्बार दिया करते थे। वे प्रतिदिन मिष्टान्न आदि विविध खाद्य पदार्थों तथा धन आदिसे ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करके उनसे गणेशजीके प्रति अविचल भक्ति-भावकी याचना किया करते थे॥ ५-६१/२ ॥ [एक बार] माघमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथि और मंगलवारका शुभ अवसर उपस्थित हुआ। [राजाने उस दिन] उषःकालमें स्नान किया और सन्ध्या- वन्दनादि नित्य कर्मोंको सम्पन्न किया। तदुपरान्त राजोचित विविध वस्त्र-अलंकारादिसे अपनी देहको विभूषित करके उन्होंने बन्धु-बान्धवों, ब्राह्मणों तथा समस्त प्रजाओंको बुलवाया और उन सबको [यथायोग्य] विविध रत्नाभूषण-वस्त्रादिसे सम्मानित किया ॥ ७-९ ॥ वे नरेश सभाभवनसे जानेको उद्यत उन लोगोंको बार-बार रोक रहे थे और विमानके आनेकी दिशामें पुनः-पुनः देख रहे थे ॥ १० ॥ उधर गणेशजीने उन महात्मा नरेश (-के परम धामगमन)-का अवसर जानकर अपने दूतोंके साथ अत्यन्त ज्योतिर्मय एक विमान भेजा ॥ ११ ॥ गणेशजीने [दूतोंसे] कहा- हे आमोद और प्रमोद ! तुम लोग पृथ्वीतलपर जाओ और मेरे भक्त उन काशिराजको इस उत्तम विमानमें बैठाकर यहाँ (मेरे धाममें) ले आओ ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब वे दूत गणेशजीकी आज्ञा प्राप्तकर और उनको प्रणाम करके उस दिव्य लोकसे चल पड़े तथा वह दिव्य विमान लेकर काशिराजके समीप जा पहुँचे ॥ १३ ॥ उस [दिव्य विमान]-के तेजसे हतप्रभ हुए कुछ लोगोंने उसे प्रलयकालीन अग्नि समझा और कुछ लोगोंने उस विमानको बिना बादलोंके गिरती हुई बिजली मान लिया। कुछ अन्य लोग सोच रहे थे कि लगता है कि सूर्य-मण्डल ही [भूतलपर] गिर रहा है ॥ १४१/२ ॥ उस विमानमें घण्टा, तुरही (एक वाद्य) आदि वाद्यों तथा गन्धर्व-अप्सराओं [-के गायन]-की ध्वनि