श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५१ ] * काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन * ३१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गूँज रही थी, जिसे सुनकर अन्य लोगोंने जाना कि यह तो विमान है। गणेशजीके द्वारा कृपापूर्वक प्रेषित, शोभासम्पन्न वह विमान काशिराजके सभा-प्रांगणमें उतर आया ॥ १५-१६ ॥ दिव्य वस्त्रों और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित प्रमोद और आमोद नामक वे दूत राजाके समीप आये। दिव्य मालाओं और अनुलेपन आदिसे सुशोभित तथा दिव्य कान्तिसे समन्वित वे गण कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहे थे। राजाने उनको गणपतिका ही स्वरूप जानकर उन्हें प्रणाम किया और तत्काल राजासनपर बैठाकर उनकी पूजा की। तदुपरान्त राजा उनसे जबतक कुछ पूछते, तबतक स्वयं ही वे दूत सभी लोगोंको सुनाते हुए उनसे कहने लगे- ॥ १७-१९ ॥ हे राजन्! हमलोग विनायकदेवकी कल्याणकारी आज्ञा आपसे निवेदित करते हैं, उनका कथन सुनो। तीनों लोकोंमें तुमसे श्रेष्ठ दूसरा भक्त नहीं है, जो उन्हें प्रसन्न कर सका हो। वे अहर्निश तुम्हारा ही स्मरण करते रहते हैं और निरन्तर तुम्हारे ही गुणोंका वर्णन किया करते हैं। आप धन्य हैं, पुण्यवान् हैं, आपने अपना जन्म सफल कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ तुम्हारा अवलोकन करते ही तत्क्षण पापोंका सघन अन्धकार विलीन हो जाता है। हम नहीं जानते कि तुमने पिछले जन्मोंमें कौन-सा तप किया है, जिसके कारण आपके महलमें पधारकर साक्षात् परब्रह्म इन बालरूप विनायकने भाँति-भाँतिकी लीलाएँ दिखायी हैं। इसलिये विनायकदेव और उनके भक्तोंकी महिमाका गोचर हो पाना सम्भव नहीं है। विनायकदेव तो सर्वदा आपका ही चिन्तन किया करते हैं ॥ २२-२४ ॥ उन्होंने तुम्हारे लिये एक वैभवपूर्ण दिव्य विमान भेजा है। हम लोग उनके आज्ञानुसार तुम्हें दिव्यलोक ले जायँगे। उन विभुने हम लोगोंसे कहा है कि काशिराजको शीघ्र लिवा लाओ। दूतोंकी [ये] बातें उन नरेशने और [साथ ही वहाँ उपस्थित] सभी लोगोंने सुनीं ॥ २५-२६ ॥ [यह सुनकर] बारम्बार खुशीके आँसू बहाते हुए वे नरेश मानो अमृतसिन्धुमें निमग्न-से हो गये। [इसके बाद धीरे-धीरे] अपनी स्वाभाविक अवस्थामें आकर उन गणोंको प्रणाम करके वे कहने लगे ॥ २७ ॥ आज हमारा जन्म लेना, हमारे माता-पिता, हमारी निष्ठा, भक्ति और राज्यसम्पत्ति-ये सभी धन्य हो गये, जो कि हमने आप लोगोंके अत्यन्त दुर्लभ, मंगलमय चरणयुगलोंका अवलोकन किया है ॥ २८ ॥ पार्थिव नेत्रोंसे जिसे देख पाना सम्भव नहीं है और जो इक्षु [रस]-सागरके मध्यमें स्थित है, ऐसे लोकोत्तर धाममें मुझे ले जानेके लिये मानो आप लोगोंके रूपमें भगवान् विनायक ही यहाँ आये हैं ॥ २९ ॥ जो सनातन परब्रह्म गुणोंसे परे, इन्द्रियोंसे अगोचर, चिदानन्दमय, विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयका कारण, अणुसे भी सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, सर्वव्यापी, संगहीन, साकार होकर गुणोंमें बरतनेवाला, [नाम-] रूपातीत होकर भी नानाविध [नाम-] रूपोंवाला और पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत है, उसने मुझ अकिंचनपर यह महान् अनुग्रह किया है ॥ ३०-३२ ॥ इतना कहकर उन काशिराजने [विनायकदेवको] नमस्कार किया और [वहाँ उपस्थित] सभी (मन्त्री, प्रजाजन, स्वजन आदि)-को [यथायोग्य] अवलोकन, आलिंगन आदिसे परितुष्ट करके दूतोंको प्रणामकर कहा कि मनुष्योंके लिये दुर्लभ इस विमानपर पहले आप लोग आरोहण कीजिये, इसके बाद ही मैं आरूढ़ होऊँगा ॥ ३३१/२ ॥ राजाने मन्त्रियोंको नमस्कार किया और उनके हाथमें अपने पुत्रको सौंपकर कहा- 'राजधर्मके अनुसार प्रजाओंको अनुशासित करते हुए उनका पालन करना चाहिये। महर्षि मुद्गलने जो कुछ बतलाया था, उसका मैंने आज यह प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया है' ॥ ३४-३५ ॥ ऐसा कहकर वे नरेश बारम्बार सम्मानित हुए उन दूतोंसे अधिष्ठित उस उत्तम विमानमें चर्म (पार्थिव)- देहसे ही आरूढ़ हुए ॥ ३६ ॥ विमानपर आरूढ़ होते ही उनकी देह सूर्यके समान तेजोमय हो गयी। तदुपरान्त उन दूतोंने काशिराजको दिव्य वस्त्राभूषणों और उत्तम गन्धानुलेपनसे अलंकृत किया ॥ ३७ ॥