श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३९४ * पुराणां हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे दूत राजाको लेकर वायुवेगसे चल पड़े और | पीठमें नेत्र थे। कुछ पापियोंका कण्ठ बड़ा ही दुबला- [उन्होंने सर्वप्रथम निकटवर्ती] पापकर्मा भूत-प्रेत- | पतला था और कुछ विशाल उदरवाले थे। विविध पिशाचादिकी आवासभूमिका राजाको दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ | रूपोंवाले वे प्रेत अन्तरिक्षवर्ती लोकमें बड़े कष्टके साथ वहाँपर विकृत आकारवाले कुछ प्राणी तो ऊपरकी | वैसे ही भटक रहे थे, जैसे खिड़की आदिसे आती हुई ओर पैर किये तथा नीचेकी ओर मुँह लटकाये स्थित थे। | सूर्यकिरणोंमें परमाणु भ्रमण-सा करते हुए प्रतीत होते हैं। कुछ प्रेतोंके पृष्ठभागमें मुख थे। कुछ प्रेतोंके नेत्र उनके | यह देखकर राजाने पूछा कि हे श्रेष्ठ दूतो! मुझे सिरपर लगे हुए थे और कुछके हृदयमें तथा कुछकी | बतलाइये कि यह कौन-सा लोक है ? ॥ ३९-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विमानके आगमनका वर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ बावनवाँ अध्याय काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना दूत बोले-हे नृपश्रेष्ठ! यह लोक भूत, प्रेत, | किन लोगोंका [निवासस्थान] है, यह बतलाइये' ॥ ७॥ पिशाच [आदि पापयोनियों]-का [निवास-स्थल] है। | वे दोनों बोले-[राजन् !] यह गन्धर्वनगर है। हे भूपते! जो लोग निन्दा, चुगलखोरी, तस्करी आदि पाप | जो लोग देवमन्दिरोंमें गायन [वादन, नृत्य आदि] करते करते हैं, वे यहाँ आते हैं ॥ १ ॥ | हैं, महान् पुण्यके कारण वे ही इस उत्तम नगरको प्राप्त [ब्रह्माजीने कहा-हे व्यासजी!] इसके पश्चात् | करते हैं। यह उत्तम नगर सिद्ध, चारण तथा गुह्यक सामने ही काशिराजने असुरों तथा राक्षसोंके लोकोंको | [आदि देवयोनियों]-की आवासभूमि है और यहाँ देखा, जहाँ विविध आकारवाले, ऊपरकी ओर उठे केशोंसे | नानाविध व्रत-दानादिरूप पुण्यराशिके प्रभावसे ही आना युक्त, भयावह, विकराल-मुख और बादलोंकी-सी गर्जना | सम्भव है ॥ ८-९ ॥ करते हुए पर्वताकार वे [असुर-राक्षस आदि] विद्यमान | इसके उपरान्त उन दूतोंने राजाको इन्द्रकी थे। अग्निकुण्डके सदृश देदीप्यमान उन (असुर-राक्षसादि)- | महिमाशालिनी, रमणीय नगरी (अमरावती) दिखलायी, को देखकर राजाने दूतोंसे फिर पूछा- हे दूतो! मैं पूछता हूँ | जो सौ अश्वमेधयज्ञ करनेपर ही सुलभ होती है ॥ १० ॥ कि यह नगर किन लोगोंका है, यह बतलाइये। तब वे दूत | उस नगरीमें सुवर्ण, रत्न, गौ, रथ, अश्व, गज बोले- '[राजन् !] यह लोक दुष्ट दानवों और राक्षसोंका | आदिके दानसे तथा तीर्थस्नान आदि नानाविध पुण्यकर्मोंके [निवास-स्थान] है। वैदिक तथा स्मार्त आचारसे | फलस्वरूप ही जाया जाता है ॥ ११ ॥ परिभ्रष्ट पापकर्मा लोग यहाँ रहते हैं' ॥ २-४ १/२ ॥ | उन दूतोंने वहाँ राजाको रमणीक इन्द्रभवन दिखलाया, तदुपरान्त राजाने उस [नगर]-के आगे गन्धर्वोंसे | उसे देखकर राजाने दूतोंसे कहा कि मैंने जैसा सुन रखा सेवित लोकको देखा। उस लोकमें चाँदी और सोनेसे | था, यह वैसा ही दीख रहा है ॥ १२ ॥ निर्मित भवन थे, वहाँकी भूमि सुवर्ण तथा रत्नोंसे मण्डित | दूतोंने वहाँसे आगे चलकर राजाको शोभाशाली थी। उस लोकके पुरुष तथा स्त्रियाँ नृत्य-गान आदिमें | अग्निलोकका दर्शन कराया। जहाँपर अग्निके समान निपुण और इच्छानुरूप विषयभोगोंसे युक्त थे ॥ ५-६ ॥ | तेजस्वी अनेकों अग्निहोत्री (द्विज) शोभित हो रहे थे। अत्यन्त सुख देनेवाले उस लोकको देखकर राजाने | वहाँसे आगे जाकर दूतोंने राजाको शुभ और अशुभ दूतोंसे फिर पूछा- 'हे दूतो! मैं पूछता हूँ कि यह नगर | परिणामोंवाले यमलोकका दर्शन कराया, जहाँ