श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५२ ] * काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना * ३९५ अपने कर्मोंके अनुसार] पुण्यात्मा और पापात्मा लोग जाया करते हैं॥ १३-१४॥ वहाँपर [भगवान् यमदेव] सदाचारियोंको धर्मराजके [सौम्य] रूपमें और दुराचारियोंको [यमराजके] क्रूर रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं। [उस लोकमें] अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप सदाचारी जन सब प्रकारके [सुखप्रद] भोगोंको और पापकमी प्राणी अनेक प्रकारकी नारकीय यातनाओंको भोगते हैं ॥ १५१/२ ॥ [वहाँ राजाने देखा कि कहीं पापात्मा जन] कुम्भीपाक नामक नरकमें पकाये जा रहे हैं, कहीं असिपत्रवन नामक नरकमें उनके अंग छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। कहीं लोहेके घनोंसे पापी पीटे जा रहे हैं, तो कहीं काँटोंसे बेधे जा रहे हैं। कुछ पापीजन तामिस्र, अन्धतामिस्र और मवादसे भरे कृमिकुण्ड आदि भयानक नरकोंमें गिराये जा रहे हैं। राजाने [नारकीय यातना भोग रहे] उन प्राणियोंको देखकर 'चलो-चलो' ऐसा कहते हुए आँखें बन्द कर लीं ॥ १६-१८ ॥ यमलोकसे आगे जाकर दूतोंने राजाको कुबेरके उत्तम लोकका दर्शन कराया। वह उत्कृष्ट लोक अति अद्भुत और इन्द्रलोकसे भी श्रेष्ठ था। उस लोकमें चमचमाते हुए सुवर्णमय भवन थे। रत्नदान, सुवर्णदान तथा कोटि-कोटि तुलादान करके परमभाग्यवान् लोग कुबेरके उस उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं॥ १९-२०१/२ ॥ वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको वरुणदेवताके उत्तम लोकका दर्शन कराया, जिसकी प्राप्ति तीर्थसेवन तथा अन्नदान करनेपर होती है। वह लोक कुबेरलोकसे भी उत्कृष्ट है। वहाँके निवासी जलमें रहकर बिना भीगे सुखलाभ करते हैं। जो लोग बावली, कुआँ, तालाब आदिका निर्माण कराते हैं और [प्यासे प्राणियोंको] जल देते हैं, वे ही यहाँ देखे जाते हैं॥ २१-२२१/२॥ इसके उपरान्त दूतोंने राजाको सुखमय वायुलोकका दर्शन कराया। जो लोग मनमाना आचरण नहीं करते तथा ग्रीष्मकालमें कपूर-खससे सुवासित जल और व्यजन (पंखे)-का दान करते हैं, उनको वायुलोकमें निवास प्राप्त होता है ॥ २३-२४ ॥ [वायुलोकसे] आगे चलकर दूतोंने राजाको दुर्गम सूर्यलोकका दर्शन कराया, जहाँपर पंचाग्नितपका अनुष्ठान करनेवाले तथा सूर्यदेवकी उपासनामें तन्मय मनुष्य और सूर्यतुल्य तेजस्वी पूर्णकाम मुनिगण निर्बाधरूपसे ब्रह्माजीके सौ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं ॥ २५-२६ ॥ तदुपरान्त दूतोंने राजाको तारागणोंसे परिपूर्ण चन्द्रलोकका दर्शन कराया। मौक्तिक एवं सुवर्णका दान और सोमयागका अनुष्ठान-इन उत्तम पुण्यकृत्योंके फलस्वरूप महात्मागण इस लोकको प्राप्त करते हैं। तदनन्तर आगे जाकर दूतोंने राजाको गोलोक दिखलाया। जो लोग ब्राह्मणोंको विधि-विधानसे हजारों गायें दान करते हैं, वे गायोंकी रोमसंख्याके तुल्य कल्पोंतक गोलोकमें निवास करते हैं ॥ २७-२९ ॥ वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको शाश्वत सत्यलोकका दर्शन कराया। जो लोग सत्यव्रती, वेदाध्ययनमें तत्पर, सदाचारी, वेदवेत्ता, शास्त्रज्ञ तथा यज्ञानुष्ठान करनेवाले हैं, एवं जो अन्नदानमें निरत, तीर्थसेवी और पुराणादिके पारायणमें तत्पर रहते हैं। जो ब्राह्मण दान लेनेमें रुचि नहीं रखते, परोपकारी, दानशील और तपोनिष्ठ हैं, ऐसे लोग सत्यलोकको प्राप्त करते हैं ॥ ३०-३२ ॥ वह सत्यलोक आठ हजार गव्यूति (सोलह हजार कोस)-के परिमाणमें फैला है और उतनी ही उसकी लम्बाई भी है। वहाँपर मुनि (ब्रह्मर्षि)-गण, राजर्षिगण, देवर्षिगण, दानव, गन्धर्व तथा अप्सराएँ ब्रह्माजीका स्तवन करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी अहर्निश सेवा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ उस लोकमें चारों ओर 'इन्द्रभवन' के समान (ऐश्वर्यमय) भवन शोभित होते हैं। सत्यलोक (के उस दिव्य वैभव)-को देखकर आश्चर्यचकित हुए राजाने उन दूतोंसे पूछा- ॥ ३५॥ राजाने कहा-मैं धन्य हूँ। मुझपर दयालु गणपतिने और आप दोनोंने बड़ा अनुग्रह किया है, जो कि मैं अत्यन्त दुर्लभ इन स्वर्गादि लोकोंको देख सका हूँ ॥ ३६ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त दूतोंने राजाको त्रिलोकीमें विख्यात वैकुण्ठलोकका दर्शन कराया। भक्तितत्पर वैष्णवजन उस लोकको प्राप्त करते हैं। वह सभी लोकोंमें श्रेष्ठतम Kalyana Visheshank 2021_Section_14_1_Front