भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 656 में से

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३९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है और किसी भी लोकसे उसकी तुलना नहीं की जा सकती। उस लोक (के गौरव)-का वर्णन करनेमें अनेक मुखवाले शेषनाग अथवा स्वयं मैं ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हूँ ॥ ३७-३८ ॥ ऊर्ज (कार्तिक मास), झष (सूर्यके मकरराशिगत होनेपर) तथा मेष (सूर्यके मेषराशिगत होनेपर)-के पवित्र अवसरोंपर (गंगादि जलतीर्थोंमें) स्नान करनेवाला, तिल-अन्नका दान करनेवाला, गोदान करनेवाला, गीताका अनुशीलन करनेवाला और प्राणिमात्रका उपकार करनेवाला-ये सभी निर्बाधरूपसे विष्णुलोक प्राप्त करते हैं। वह लोक पाँच हजार योजनके परिमाणवाला है। वहाँके देदीप्यमान भवनोंको विश्वकर्माने सोने, चाँदी और रत्नोंसे निर्मित किया है। उन भवनोंकी आभा सूर्य और चन्द्रमाके जैसी जान पड़ती है। [वहाँकि दिव्य] रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए भवनोंमें अन्धकारका [स्वल्पमात्र भी] प्रवेश नहीं होता। वहींपर अपने पार्षदों और देवी महालक्ष्मीके साथ दैत्यशत्रु भगवान् नारायण विराजते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥ अपनी पुण्यराशिके कारण उस वैष्णवधामको देखकर वे नरेश आनन्दमग्न हो गये। तदुपरान्त दूतोंने राजाको भगवान् शिवकी आवासभूमि कैलासके दर्शन कराये। [वह शिवधाम] सुमेरुपर्वतके दस हजार योजन विस्तारवाले शिखरपर अवस्थित है॥ ४२-४३॥ जहाँ सूर्य और चन्द्रमाके सदृश ज्योतिर्मय प्रासाद शोभित होते हैं और जिसको पंचाक्षर मन्त्र तथा रुद्राध्यायका जप करनेवाले एवं अनेक साधनानुष्ठानोंमें निरत पुण्यात्मा लोग प्राप्त करते हैं, भगवान् विनायककी कृपासे ऐसे शिवलोकका दर्शनकर राजाने कहा कि दर्शनमात्रसे ही पुण्य प्रदान करनेवाले सभी देवलोकोंको मैंने देख लिया है॥ ४४-४५१/२ ॥ उस स्थानसे आगे चलनेपर हजार योजनतक सूर्य- चन्द्र [आदि प्रकाशक] नहीं थे [वहाँ केवल सघन अन्धकार ही था]। राजा उस विमानके प्रकाशके ही सहारे आगे बढ़ रहे थे, उन्हें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। वहाँ चारों ओर केवल बड़े-बड़े पहाड़ों-जैसे भौरोंका बादलोंकी गड़गड़ाहट-सा असह्य घोष राजाको सुनायी दे रहा था॥ ४६-४७१/२ ॥ तब राजाने दूतोंसे पूछा कि 'यह किसका शब्द सुनायी पड़ रहा है और मैं भगवान् गणपतिके चरणोंका प्रत्यक्ष दर्शन कब करूँगा?' ॥ ४८१/२ ॥ तभी राजाने अपने सामने भ्रामरी नामक एक बलवती शक्तिको देखा। वह अनेक सूर्योंके सदृश तेजोमयी, भयानक आकृतिवाली तथा ब्रह्माण्डको कौरके समान निगलनेकी सामर्थ्यवाली थी ॥ ४९१/२ ॥ फैले हुए मुखवाली उस शक्तिको देखकर राजा मूर्च्छित हो गये। तब दूतोंने राजाको चैतन्य किया और उनको लेकर आगे चल पड़े। तदुपरान्त राजाने उस शक्तिसे भी अधिक भयावह आधारशक्तिको देखा। भ्रामरीके मस्तकपर स्थित वह प्रभामयी शक्ति विकराल केशोंवाली और लम्बी जिह्वा तथा लटकते हुए ओष्ठोंसे युक्त थी। उसे देखकर राजा [भयके मारे] काँपने लगे ॥ ५०-५२ ॥ दूतोंके द्वारा सान्त्वना दिये जानेपर आगे बढ़ते राजाने कामदायिनी नामक शक्तिको देखा, जो आधारशक्तिपर आरूढ़ थी और दस हजार योजनके विस्तारवाली थी। उसके श्वास-प्रश्वाससे पर्वत डोलने लगते थे और Kalyana Visheshank 2021_Section_14_1_Back