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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 656 में से

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पृष्ठ 399

क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उसके वज्रतुल्य कठोर शरीरमें वह पुरी (गणपतिका धाम) अवस्थित थी ॥ ५३-५४ ॥ तदुपरान्त दूतोंने राजासे कहा कि जिसका स्मरण करके तुम परितृप्तिका अनुभव करते हो और जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय तथा कल्याणमय है, उस स्वानन्दपत्तन (गणपतिधाम)-का तुम दर्शन करो ॥ ५५ ॥ जिसके हजारों उत्तम प्रासाद मोती, चाँदी और सूर्यकान्तमणियों (अथवा माणिक्य)-से बनाये गये हैं और जो सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटित हैं ॥ ५६ ॥ जहाँकी फर्श नीलमकी है और जहाँके लोग अग्निके समान तेजस्वी हैं। पीतरत्न अर्थात् पुखराजके द्वारा बनाये गये घाटों-तटोंवाले तथा नीलाभ, शीतल, स्वच्छ जलसे पूर्ण कुआँ, बावली, तालाब, सरोवर आदि जहाँ शोभित हो रहे हैं। जिनका कि जल पीनेसे लोगोंको भूख-प्यास, बुढ़ापा, रोग आदि नहीं सताते ॥ ५७-५८ ॥ जहाँपर विविध प्रकारके वृक्षों और लताओंसे शोभायमान और अत्यन्त स्वच्छ खेलके मैदान हैं तथा जहाँ मध्याह्नकालीन करोड़ों सूर्योंके समान भासमान दिव्य ओषधियाँ (अथवा तरु-लताएँ) शोभा पाती हैं। जहाँपर रात्रिमें नीचे उतरे हुए निष्कलंक चन्द्रमण्डलमें विलासीजन (दर्पणकी भाँति) अपना मुखावलोकन करते हैं। जहाँकी पुष्पवाटिकाओंकी सुवासित वायु विलासीजनोंके [विहारजनित] श्रमको दूर करती है। [ऐसे उस गणपतिधामके अन्तर्वर्ती] इक्षु [रस]-सागरके तटपर पहुँचकर आनन्दमग्न हुए वे [नरेश एवं दोनों दूत] विमानसे उतर गये ॥ ५९-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डका 'विनायकलोकगमनवर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ ❖ तिरपनवाँ अध्याय काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना और उनकी स्तुति करना ब्रह्माजी बोले-उन लोगोंने पुण्यराशिके कारण मिलनेवाले उस इक्षुसागरके रसका भलीभाँति पान किया। इक्षुसागरके मध्यमें एक निर्मल पुष्करिणी थी, जिसमें सूर्यके समान भासमान और हजारों पंखुड़ियोंवाला एक उत्तम कमल था। उस कमलके मध्यमें उन विनायकदेवका अत्यन्त मनोहर पर्यंक स्थित था ॥ १-२ ॥ पर्यंकपर दिव्य आस्तरण (बिछौना) बिछा हुआ था और वह दिव्य धूपोंसे सुवासित था। उसपर नानाविध दिव्य पुष्प बिखेरे गये थे तथा उसमें जटित उत्तम कान्तिवाली रत्नराशिकी आभा सभी दिशाओं और विदिशाओं (दिक्कोण ईशान आदि)-को उद्भासित कर रही थी। ऐसे उस पर्यंकपर सोये हुए विनायकदेवपर व्यजन डुलाये जा रहे थे ॥ ३-४ ॥ वे विनायकदेव करोड़ों चन्द्रमाओंकी-सी कान्तिवाले, विविध अलंकारोंसे मण्डित तथा सर्पोंसे विभूषित थे। उनकी सूँड़ केलेके तने-जैसी थी और उसमें [एकमात्र] दाँत शोभा पा रहा था। ओढ़े हुए दिव्याम्बरसे वे आवृत थे। उनके ललाटपर [तीसरा] नेत्र और सिरपर मुकुट शोभायमान था। उन्होंने [कानोंमें] कुण्डल, [हाथोंमें] बाजूबन्द, [अँगुलियोंमें] अँगूठी और [कटिदेशमें] बहुमूल्य करधनीको धारण कर रखा था ॥ ५-६ ॥ उनके सिद्धिप्रदायक चरणोंको सिद्धिदेवी और बुद्धिदेवी दबा रही थीं तथा अणिमा एवं गरिमा नामक सिद्धियाँ उनपर श्वेत चामर डुलानेमें निरत थीं। ज्वालिनी और तेजिनी नामक शक्तियाँ जगमगाती हुई-सी [मानो वहाँ प्रकाश फैलानेके लिये] उनके दोनों ओर अवस्थित थीं। भगवान् विनायक दिव्य गन्धानुलेपनसे अनुलिप्त एवं दिव्य मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ७-८ ॥ महिमा तथा प्रथिमा नामक सिद्धियाँ उनके समक्ष जल एवं निष्ठीवनपात्र (पीकदान) और रत्नजटित सुवर्णमय छत्र लिये खड़ी थीं ॥ ९ ॥ [वहाँ पहुँचकर] वे दूत काशिराजका हाथ पकड़कर विनायकदेवके समक्ष गये और वार्तालापका अवसर देखने लगे, तभी भगवान् जग गये ॥ १० ॥ Kalyana_Visheshank_2021_Section_14_2_Front

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