भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 656 में से

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पृष्ठ 400

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३९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उन दूतोंने विनायकदेवको प्रणाम करके निवेदन | स्थापना की। तदुपरान्त मैं आपसे आज्ञा लेकर जन्मदाता किया कि आपकी आज्ञासे इन्हें हम लिवा लाये हैं- | पिता कश्यपजीके पास चला गया ॥ २०-२२ ॥ ऐसा कहकर उनके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए वे दोनों | उनको प्रणाम करके मैं समस्त वैभवोंसे परिपूर्ण इस दूर खड़े हो गये ॥ १९॥ | अपने धाममें आ गया। [यहाँपर] आपके ही विषयमें प्रबुद्ध हुए उन विनायकदेवको राजाने हाथ जोड़कर | सोचता हुआ मैं कहीं भी शान्ति न पा सका। तब आपके प्रणाम किया और अत्यन्त प्रीतिसे बोले 'आज मेरा वंश | आदिभाव अर्थात् मेरे प्रति वात्सल्यमूलक भक्तिभावको धन्य हो गया, मेरे माता-पिता, जन्म लेना, विद्या, | जानकर मैंने मुनिश्रेष्ठ मुद्गलको आपके घर भेजा और तपस्या, नेत्र और पुत्र आदि भी धन्य हैं; क्योंकि ब्रह्माजीके | उनकी कृपासे आपने और स्वयं उन मुद्गलमुनिने भी इस द्वारा जिनका ध्यान किया जाता है, ऐसे अपने चरणयुगलका | स्थानको प्राप्त किया है, यह स्थान तो श्रेष्ठ मुनिजनों [आपने] हमें दर्शन कराया है॥ १२-१३॥ | तथा ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी सर्वदा अलभ्य ही मैंने जैसा वैभव [यहाँका] देखा है, वैसा तो | है' ॥ २३-२५ ॥ ब्रह्मलोक, कैलास, इन्द्रलोक आदि किसी भी लोकमें | ब्रह्माजी बोले-उन विनायकके वचनामृतका नहीं दिखायी देता' ॥ १४ ॥ | पानकर और बार-बार उनकी वन्दना करके काशिराज तदुपरान्त उन विनायकने दूतोंको बैठनेकी आज्ञा | अपनी बुद्धिके अनुसार स्तवन करने लगे ॥ २६ ॥ दी। जब दूत बैठ गये, तब राजाने विनायकको [उन्हीं | राजा बोले- हे नाथ! जो कमल, पाश, खड्ग, पूर्वपरिचित] बालकके रूपमें देखा, जिन्होंने नरान्तक | परशु आदिके चिह्नोंसे युक्त हैं, ब्रह्मा आदि देवगण अपने और देवान्तक नामक दैत्योंका वध किया था। उन | कल्याणहेतु एकमात्र जिनका ही ध्यान किया करते हैं मृदुलदेह, हिम और कर्पूरके समान शुभ्र, अत्यन्त गौर | और जो भक्तोंके विघ्नोंका ध्वंस कर देते हैं, आपके उन तथा दो भुजाओंसे युक्त [बालरूप] विनायकको देखकर | चरणारविन्दोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २७ ॥ राजा कुछ भी बोल न सके। आँसुओंसे उनका गला भर | [हे नाथ! मैं आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना आया। काशिराजने आनन्दाश्रुओंकी धारासे विनायकदेवके | करता हूँ,] जो विष्णु, शिव आदि देवताओं तथा चरणयुगलको भिगो दिया ॥ १५-१७ ॥ | नानाविध अभीष्टसिद्धिके अभिलाषी मनुष्योंके द्वारा राजाके अलौकिक भक्तिभावको जानकर विघ्न- | बारम्बार पूजित होते हैं और विघ्नोंका नाश करनेमें विनायकने उन्हें उठाया और आलिंगन किया। [तब | कुशल एवं सांसारिक तापोंसे सन्तप्त प्राणियोंपर कृपामृतकी काशिराजने भी] विनायकके मस्तकको वैसे ही सूंघा, | वर्षा करनेवाले हैं ॥ २८ ॥ जैसे सुदीर्घकालोपरान्त समागत पुत्रका मस्तक पिता | हे नाथ! कृपाकटाक्षरूपी अमृतवर्षणसे तीनों तापोंका सूंघता है। तब विनायकदेवका भी गला आँसुओंसे भर | शमन करनेकी जिसमें प्रत्यक्ष सामर्थ्य गोचर होती है, आया और वे तथा राजा दोनों ही रोमांचित हो उठे। | आपके उस अग्नि-सूर्य-चन्द्रात्मक तीन नेत्रोंवाले आनन्दसिन्धुमें निमग्न हुए उन दोनोंको योगियोंकी भाँति | मुखारविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २९ ॥ शरीरका भान न रहा॥ १८-१९॥ | हे नाथ! हे सुरेश्वर! जो नानाविध अस्त्र-शस्त्रोंके इसके पश्चात् [प्रकृतिस्थ होनेपर] बालरूपी विनायकने | द्वारा दैत्यसमूहको विनष्ट करनेवाला, अनेकों भक्तोंको राजासे कहा- 'हे तात! आपके घरमें खेल-खेलमें मैंने | निर्भय करनेवाला और संसाररूपी कूपसे निकलनेका सहारा अनेक बार सदसद् व्यवहार किया है, वह सब आप सहन | है, मैं आपके उस करारविन्दकी वन्दना करता हूँ॥ ३०॥ करते रहे। मैंने वहाँ बहुत-से दैत्योंका वध किया, भूमिक | हे गणपति! आप [अजन्मा हैं तथापि] सत्त्वगुणका भार नष्ट किया, सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा धर्ममर्यादाकी | आश्रय लेकर [विष्णुरूपसे प्रजाओंका] भरण-पोषण