भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 656 में से

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पृष्ठ 401

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करते हैं, रजोगुणका आश्रय लेकर [ब्रह्माके रूपमें विश्वप्रपंचकी] रचना करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर [रुद्ररूपसे ब्रह्माण्डका] संहार करते हैं। यह चराचर जगत् आपके ही नियन्त्रणमें है॥ ३१ ॥ जो निर्मलचित्त व्यक्ति आपका अहर्निश भजन करता है, आप उसके विघ्नोंको आक्रान्त करके [भक्तवत्सलताके कारण] उसके चारों ओर मँडराया करते हैं। वह [अपने निश्छल भक्तिभावसे] आपको वशीभूत करके सुखपूर्वक सोता है और आप [उसके हितार्थ] वैसे ही दौड़ते रहते हैं, जैसे बछड़ेके लिये गाय दौड़ती है॥ ३२ ॥ जो लोग दूसरे (देवताओं)-की उपासना करते हुए नानाविध सन्ताप प्राप्तकर संसार-चक्रमें बारम्बार भटकते रहते हैं, वे भी कभी-कभी आपके [करुणापूर्ण] अनुग्रहको प्राप्त करके [पुनः] मनुष्य-शरीर धारण करते हैं और तब [आपका सायुज्य] पा लेते हैं॥ ३३॥ भले ही कोई व्यक्ति धूलके कणों, आकाशीय तारागणों और बादलोंके द्वारा बरसाये जलबिन्दुओंको गिन ले, परंतु आपके गुणोंको गिन पानेमें तो अपनी सारी ही आयुमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हो सकते। [हे भगवन्! वस्तुतः आप निराकार और साकार—दोनों ही रूपोंवाले हैं; क्योंकि] निराकार कहे जानेवाले आपकी यदि आकृति न होती, तो उपासनाविधि ही व्यर्थ हो जाती और गुणोंके परिणामभूत प्राकृतिक प्रपंच तथा विभिन्न जीवोंके भाँति-भाँतिके कर्मभोग भी किस प्रकार सिद्ध हो पाते ? ॥ ३४-३५॥ यदि सज्जनोंकी संगति हो, उनका अनुग्रह हो, शास्त्रविहित कर्तव्यमें निष्ठा हो और निरन्तर आपका अनुध्यान हो तो चित्तकी शुद्धि, आपका महान् अनुग्रह, ज्ञान और मोक्ष—ये सभी दुर्लभ नहीं रहते * ॥ ३६ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारके स्तवनको सुनकर सन्तुष्ट हुए उन विनायकने काशिराजसे कहा कि 'मनोवांछित वर ग्रहण करो' ॥ ३७ ॥ राजाने कहा—[हे प्रभो !] जो मैं यहाँ आ सका हूँ, इतनेसे ही वरदानका प्रयोजन सिद्ध हो गया, अब मेरा पुनः जन्म-मरण न हो, इसका उपाय कीजिये ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजी बोले—स्तुतिसे सन्तुष्ट हुए विनायक उन दिव्य देहवाले काशिराजसे 'तथास्तु' (ऐसा ही हो)—इस प्रकार बोले और करोड़ों कल्पोंतकके लिये उनको अपने समीपमें स्थान दिया ॥ ३९ ॥ हे मुने ! उन विनायकदेवने ही कृपापूर्वक मुझको यह स्तोत्र बताया था, तदुपरान्त मैंने नारदजीको और नारदजीने महर्षि गौतमको यह स्तोत्र बतलाया। फिर महर्षि गौतमने इसे सभी ऋषियोंको प्रदान किया। अत्यन्त पावन यह स्तोत्र विघ्ननाशक और ज्ञान, मोक्ष तथा समस्त वांछित फलोंको देनेवाला है ॥ ४०-४१ ॥ गणपतिदेवके समक्ष जो मनुष्य तीनों सन्ध्याओंमें इसका पाठ करता है, उसे भक्तिकी प्राप्ति होती है। इसका पाठ करके विद्यार्थी विद्या, पुत्रार्थी सन्तान तथा विजयार्थी विजय प्राप्त कर लेता है। हे मुने ! जो-जो


  • नृप उवाच नमामि ते नाथ पदारविन्दं ब्रह्मादिभिर्ध्येयतमं शिवाय। यत्पद्मपाशासिपरश्वधादिसुचिह्नितं विघ्नहरं निजानाम्॥ यदर्च्यते विष्णुशिवादिभिः सुरैरनेककार्यार्थकरैर्नैरैश्च। अनेकशो विघ्नविनाशदक्षं संसारतप्तामृतवृष्टिकारि ॥ नमामि ते नाथ मुखारविन्दं त्रिलोचनं वह्निरवीन्दुतारम्। कृपाकटाक्षामृतसेचनेन तापत्रयोन्मूलनदृष्टशक्ति ॥ नमामि ते नाथ करारविन्दं अनेकहेतिक्षतदैत्यसङ्घम्। अनेकभक्ताभयदं सुरेश संसारकूपोत्तरणावलम्बम्॥ त्वमेव सत्त्वात्मतया बिभर्षि सृजस्यदो राजसतामवाप्य। तमोगुणाधारतया च हंसि चराचरं ते वशगं गणेश ॥ यः शुद्धचेता भजतेऽनिशं त्वामाक्रम्य विघ्नान् परिधावसि त्वम्। स त्वां वशे कृत्य सुखं हि शेते वत्सं यथा गौरिव धावसि त्वम् ॥ येऽन्यन् भजन्तः समवाप्य तापान् संसारचक्रे बहुधा भ्रमन्तः। कदापि तेऽनुग्रहमाप्य तेऽपि भजन्ति मानुष्यमवाप्य तेऽपि ॥ धरारजः कोऽपि मिमीते नाके तारागणं वारिमुचां च धाराः। नालं गुणानां गणनां हि कर्तुं शेषो विधाता तव वर्षपूरैः ॥ निराकृतेस्ते यदि नाकृतिः स्यादुपासनाकर्मविधिर्वृथा स्यात्। गुणप्रपञ्चः प्रकृतेर्विलासा जनस्य भोगश्च तथा कथं स्यात् ॥ सत्सङ्गतिश्चेत्सदनुग्रहः स्यात् सत्कर्मनिष्ठा सदनुस्मृतिश्च। चित्तस्य शुद्धिर्महती कृपा ते ज्ञानं विमुक्तिश्च न दुर्लभा स्यात् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ५३ । २७-३६)