श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुमने पूछा था, वह सब मैंने इस प्रकार बतलाया, काशिराजका आख्यान सुननेके बाद तुम और क्या सुनना चाहते हो ?॥ ४२-४३१/२॥ भृगुजी बोले- ब्रह्माजीके इन वचनोंको सुनकर व्यासजीका सन्देह नष्ट हो गया और उन उत्तमबुद्धि मुनिवरने दूसरी कथाओंको विस्तारपूर्वक सुननेके लिये प्रश्न किया॥ ४४१/२॥ व्यासजीने पूछा- [हे ब्रह्मन् !] उन विनायकने किस प्रकार अतिदरिद्र शुक्लके घरमें आदरपूर्वक साधारण भोजन करके उसकी दरिद्रताको दूर किया और काशिराजके समीप क्या-क्या लीलाएँ की थीं तथा काशिराजने क्या किया, यह सब बतलािये॥ ४५-४६॥ विनायकदेवने कैसे दोनों दैत्यों (नरान्तक और देवान्तक)-को मारा और कैसे पृथ्वीका भार हरण किया तथा किस रीतिसे धर्मकी स्थापना की-यह सब भली- भाँति आप मुझे बतलािये॥ ४७॥ ब्रह्माजी बोले-हे मुने ! उन बालरूप विनायकने शुक्लकी दरिद्रताका हरण करके और भी जो-जो लीलाएँ की थीं, वह सब चरित मैं तुमको संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ ४८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजाको स्वानन्दभुवनप्राप्तिका वर्णन' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥ चौवनवाँ अध्याय काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना ब्रह्माजी बोले- [एक दिन विनायकदेव भक्तिके वशीभूत होकर धनहीन शुक्लके घर जा पहुँचे और] उन बालरूप गणपतिने शुक्लके यहाँ भोजन किया, तदुपरान्त वहीं प्रांगणमें खेलते-खेलते क्षणभरमें सो गये। इधर [बहुत-से] नगरनिवासी जन, जो कि उन्हें भोजन कराना चाह रहे थे, विनायकको बुलानेके लिये काशिराजके भवनमें आये॥ १-२॥ काशिराजने उन नागरिकोंसे कहा [कि विनायक तो अभी यहीं खेल रहा था, लगता है] कि वह खेलता- खेलता यहाँसे [कहीं और] चला गया। तब लोग प्रत्येक घरमें विनायकको खोजने लगे। तभी कुछ लोगोंने कहा कि वह तो शुक्लके घर गया हुआ है, तब वे नागरिक उस अकिंचन शुक्ल और विनायकदेवकी निन्दा करने लगे॥ ३-४॥ नागरिक जन बोले- जैसे ऊँट कोमल पल्लवोंको छोड़कर काँट चबाता है, वैसे ही यह विनायक वैभवसम्पन्न हम लोगोंकी उपेक्षा करके उस दरिद्रके घर जा पहुँचा। राजाने तो उसे व्यर्थ ही ईश्वर मान लिया है; क्योंकि यदि वह बालक ईश्वर होता तो सभीके मनको प्रसन्न रखता॥ ५-६॥ उस बच्चेने कैसे [उस दरिद्रका] अतिसामान्य और अल्पमात्र भोजन किया होगा, यह सोचकर उन नागरिकोंमें- से कुछ भले लोग विनायकको ले आनेके लिये उद्यत हो गये। वे लोग इधर-उधर भटकने लगे और विनायकका पता पानेके लिये पथिकजनोंसे पूछने लगे कि क्या [आप लोगोंने] विनायकको कहीं देखा है। विनायकके प्रति भक्तिसम्पन्न वे लोग स्थान-स्थानपर उसके बारेमें पूछते हुए भ्रमण कर रहे थे। तब कुछ लोगोंने कहा कि वह कदाचित् शुक्लके घर गया है॥ ७-९॥ तब वे लोग तत्काल ही शुक्लके घर जा पहुँचे, वहाँ उन्हें जब ज्ञात हुआ कि विनायकदेव शयन कर रहे हैं तो वे सत्त्वगुणी जन [यह सोचकर] मौन भावसे बैठ गये कि जब वे विभु जगेंगे, तब उनसे हम [भोजनके लिये] प्रार्थना करेंगे। उन्हीं लोगोंमें कुछ रजोगुणी जन भी थे, वे [सोते हुए] विनायकसे कहने लगे- 'अरे ! उठो, भोजन करनेके लिये चलो, नहीं तो भोजन बासी हो जायगा॥ १०-११॥ [अरे !] तेरे लिये राजधानीके लोग कोलाहल कर रहे हैं, [और तू यहाँ शान्तिपूर्वक सो रहा है]। शुक्ल अर्थात् विशुद्ध भिक्षासे जीविकोपार्जन करनेवाले इस