श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३९४ * पुराणां हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे दूत राजाको लेकर वायुवेगसे चल पड़े और | पीठमें नेत्र थे। कुछ पापियोंका कण्ठ बड़ा ही दुबला- [उन्होंने सर्वप्रथम निकटवर्ती] पापकर्मा भूत-प्रेत- | पतला था और कुछ विशाल उदरवाले थे। विविध पिशाचादिकी आवासभूमिका राजाको दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ | रूपोंवाले वे प्रेत अन्तरिक्षवर्ती लोकमें बड़े कष्टके साथ वहाँपर विकृत आकारवाले कुछ प्राणी तो ऊपरकी | वैसे ही भटक रहे थे, जैसे खिड़की आदिसे आती हुई ओर पैर किये तथा नीचेकी ओर मुँह लटकाये स्थित थे। | सूर्यकिरणोंमें परमाणु भ्रमण-सा करते हुए प्रतीत होते हैं। कुछ प्रेतोंके पृष्ठभागमें मुख थे। कुछ प्रेतोंके नेत्र उनके | यह देखकर राजाने पूछा कि हे श्रेष्ठ दूतो! मुझे सिरपर लगे हुए थे और कुछके हृदयमें तथा कुछकी | बतलाइये कि यह कौन-सा लोक है ? ॥ ३९-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विमानके आगमनका वर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ बावनवाँ अध्याय काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना दूत बोले-हे नृपश्रेष्ठ! यह लोक भूत, प्रेत, | किन लोगोंका [निवासस्थान] है, यह बतलाइये' ॥ ७॥ पिशाच [आदि पापयोनियों]-का [निवास-स्थल] है। | वे दोनों बोले-[राजन् !] यह गन्धर्वनगर है। हे भूपते! जो लोग निन्दा, चुगलखोरी, तस्करी आदि पाप | जो लोग देवमन्दिरोंमें गायन [वादन, नृत्य आदि] करते करते हैं, वे यहाँ आते हैं ॥ १ ॥ | हैं, महान् पुण्यके कारण वे ही इस उत्तम नगरको प्राप्त [ब्रह्माजीने कहा-हे व्यासजी!] इसके पश्चात् | करते हैं। यह उत्तम नगर सिद्ध, चारण तथा गुह्यक सामने ही काशिराजने असुरों तथा राक्षसोंके लोकोंको | [आदि देवयोनियों]-की आवासभूमि है और यहाँ देखा, जहाँ विविध आकारवाले, ऊपरकी ओर उठे केशोंसे | नानाविध व्रत-दानादिरूप पुण्यराशिके प्रभावसे ही आना युक्त, भयावह, विकराल-मुख और बादलोंकी-सी गर्जना | सम्भव है ॥ ८-९ ॥ करते हुए पर्वताकार वे [असुर-राक्षस आदि] विद्यमान | इसके उपरान्त उन दूतोंने राजाको इन्द्रकी थे। अग्निकुण्डके सदृश देदीप्यमान उन (असुर-राक्षसादि)- | महिमाशालिनी, रमणीय नगरी (अमरावती) दिखलायी, को देखकर राजाने दूतोंसे फिर पूछा- हे दूतो! मैं पूछता हूँ | जो सौ अश्वमेधयज्ञ करनेपर ही सुलभ होती है ॥ १० ॥ कि यह नगर किन लोगोंका है, यह बतलाइये। तब वे दूत | उस नगरीमें सुवर्ण, रत्न, गौ, रथ, अश्व, गज बोले- '[राजन् !] यह लोक दुष्ट दानवों और राक्षसोंका | आदिके दानसे तथा तीर्थस्नान आदि नानाविध पुण्यकर्मोंके [निवास-स्थान] है। वैदिक तथा स्मार्त आचारसे | फलस्वरूप ही जाया जाता है ॥ ११ ॥ परिभ्रष्ट पापकर्मा लोग यहाँ रहते हैं' ॥ २-४ १/२ ॥ | उन दूतोंने वहाँ राजाको रमणीक इन्द्रभवन दिखलाया, तदुपरान्त राजाने उस [नगर]-के आगे गन्धर्वोंसे | उसे देखकर राजाने दूतोंसे कहा कि मैंने जैसा सुन रखा सेवित लोकको देखा। उस लोकमें चाँदी और सोनेसे | था, यह वैसा ही दीख रहा है ॥ १२ ॥ निर्मित भवन थे, वहाँकी भूमि सुवर्ण तथा रत्नोंसे मण्डित | दूतोंने वहाँसे आगे चलकर राजाको शोभाशाली थी। उस लोकके पुरुष तथा स्त्रियाँ नृत्य-गान आदिमें | अग्निलोकका दर्शन कराया। जहाँपर अग्निके समान निपुण और इच्छानुरूप विषयभोगोंसे युक्त थे ॥ ५-६ ॥ | तेजस्वी अनेकों अग्निहोत्री (द्विज) शोभित हो रहे थे। अत्यन्त सुख देनेवाले उस लोकको देखकर राजाने | वहाँसे आगे जाकर दूतोंने राजाको शुभ और अशुभ दूतोंसे फिर पूछा- 'हे दूतो! मैं पूछता हूँ कि यह नगर | परिणामोंवाले यमलोकका दर्शन कराया, जहाँ
क्री०ख०-अ०५२ ] * काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना * ३९५ अपने कर्मोंके अनुसार] पुण्यात्मा और पापात्मा लोग जाया करते हैं॥ १३-१४॥ वहाँपर [भगवान् यमदेव] सदाचारियोंको धर्मराजके [सौम्य] रूपमें और दुराचारियोंको [यमराजके] क्रूर रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं। [उस लोकमें] अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप सदाचारी जन सब प्रकारके [सुखप्रद] भोगोंको और पापकमी प्राणी अनेक प्रकारकी नारकीय यातनाओंको भोगते हैं ॥ १५१/२ ॥ [वहाँ राजाने देखा कि कहीं पापात्मा जन] कुम्भीपाक नामक नरकमें पकाये जा रहे हैं, कहीं असिपत्रवन नामक नरकमें उनके अंग छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। कहीं लोहेके घनोंसे पापी पीटे जा रहे हैं, तो कहीं काँटोंसे बेधे जा रहे हैं। कुछ पापीजन तामिस्र, अन्धतामिस्र और मवादसे भरे कृमिकुण्ड आदि भयानक नरकोंमें गिराये जा रहे हैं। राजाने [नारकीय यातना भोग रहे] उन प्राणियोंको देखकर 'चलो-चलो' ऐसा कहते हुए आँखें बन्द कर लीं ॥ १६-१८ ॥ यमलोकसे आगे जाकर दूतोंने राजाको कुबेरके उत्तम लोकका दर्शन कराया। वह उत्कृष्ट लोक अति अद्भुत और इन्द्रलोकसे भी श्रेष्ठ था। उस लोकमें चमचमाते हुए सुवर्णमय भवन थे। रत्नदान, सुवर्णदान तथा कोटि-कोटि तुलादान करके परमभाग्यवान् लोग कुबेरके उस उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं॥ १९-२०१/२ ॥ वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको वरुणदेवताके उत्तम लोकका दर्शन कराया, जिसकी प्राप्ति तीर्थसेवन तथा अन्नदान करनेपर होती है। वह लोक कुबेरलोकसे भी उत्कृष्ट है। वहाँके निवासी जलमें रहकर बिना भीगे सुखलाभ करते हैं। जो लोग बावली, कुआँ, तालाब आदिका निर्माण कराते हैं और [प्यासे प्राणियोंको] जल देते हैं, वे ही यहाँ देखे जाते हैं॥ २१-२२१/२॥ इसके उपरान्त दूतोंने राजाको सुखमय वायुलोकका दर्शन कराया। जो लोग मनमाना आचरण नहीं करते तथा ग्रीष्मकालमें कपूर-खससे सुवासित जल और व्यजन (पंखे)-का दान करते हैं, उनको वायुलोकमें निवास प्राप्त होता है ॥ २३-२४ ॥ [वायुलोकसे] आगे चलकर दूतोंने राजाको दुर्गम सूर्यलोकका दर्शन कराया, जहाँपर पंचाग्नितपका अनुष्ठान करनेवाले तथा सूर्यदेवकी उपासनामें तन्मय मनुष्य और सूर्यतुल्य तेजस्वी पूर्णकाम मुनिगण निर्बाधरूपसे ब्रह्माजीके सौ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं ॥ २५-२६ ॥ तदुपरान्त दूतोंने राजाको तारागणोंसे परिपूर्ण चन्द्रलोकका दर्शन कराया। मौक्तिक एवं सुवर्णका दान और सोमयागका अनुष्ठान-इन उत्तम पुण्यकृत्योंके फलस्वरूप महात्मागण इस लोकको प्राप्त करते हैं। तदनन्तर आगे जाकर दूतोंने राजाको गोलोक दिखलाया। जो लोग ब्राह्मणोंको विधि-विधानसे हजारों गायें दान करते हैं, वे गायोंकी रोमसंख्याके तुल्य कल्पोंतक गोलोकमें निवास करते हैं ॥ २७-२९ ॥ वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको शाश्वत सत्यलोकका दर्शन कराया। जो लोग सत्यव्रती, वेदाध्ययनमें तत्पर, सदाचारी, वेदवेत्ता, शास्त्रज्ञ तथा यज्ञानुष्ठान करनेवाले हैं, एवं जो अन्नदानमें निरत, तीर्थसेवी और पुराणादिके पारायणमें तत्पर रहते हैं। जो ब्राह्मण दान लेनेमें रुचि नहीं रखते, परोपकारी, दानशील और तपोनिष्ठ हैं, ऐसे लोग सत्यलोकको प्राप्त करते हैं ॥ ३०-३२ ॥ वह सत्यलोक आठ हजार गव्यूति (सोलह हजार कोस)-के परिमाणमें फैला है और उतनी ही उसकी लम्बाई भी है। वहाँपर मुनि (ब्रह्मर्षि)-गण, राजर्षिगण, देवर्षिगण, दानव, गन्धर्व तथा अप्सराएँ ब्रह्माजीका स्तवन करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी अहर्निश सेवा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ उस लोकमें चारों ओर 'इन्द्रभवन' के समान (ऐश्वर्यमय) भवन शोभित होते हैं। सत्यलोक (के उस दिव्य वैभव)-को देखकर आश्चर्यचकित हुए राजाने उन दूतोंसे पूछा- ॥ ३५॥ राजाने कहा-मैं धन्य हूँ। मुझपर दयालु गणपतिने और आप दोनोंने बड़ा अनुग्रह किया है, जो कि मैं अत्यन्त दुर्लभ इन स्वर्गादि लोकोंको देख सका हूँ ॥ ३६ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त दूतोंने राजाको त्रिलोकीमें विख्यात वैकुण्ठलोकका दर्शन कराया। भक्तितत्पर वैष्णवजन उस लोकको प्राप्त करते हैं। वह सभी लोकोंमें श्रेष्ठतम Kalyana Visheshank 2021_Section_14_1_Front
सकती। उस लोक (के गौरव)-का वर्णन करनेमें अनेक
३९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है और किसी भी लोकसे उसकी तुलना नहीं की जा सकती। उस लोक (के गौरव)-का वर्णन करनेमें अनेक मुखवाले शेषनाग अथवा स्वयं मैं ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हूँ ॥ ३७-३८ ॥ ऊर्ज (कार्तिक मास), झष (सूर्यके मकरराशिगत होनेपर) तथा मेष (सूर्यके मेषराशिगत होनेपर)-के पवित्र अवसरोंपर (गंगादि जलतीर्थोंमें) स्नान करनेवाला, तिल-अन्नका दान करनेवाला, गोदान करनेवाला, गीताका अनुशीलन करनेवाला और प्राणिमात्रका उपकार करनेवाला-ये सभी निर्बाधरूपसे विष्णुलोक प्राप्त करते हैं। वह लोक पाँच हजार योजनके परिमाणवाला है। वहाँके देदीप्यमान भवनोंको विश्वकर्माने सोने, चाँदी और रत्नोंसे निर्मित किया है। उन भवनोंकी आभा सूर्य और चन्द्रमाके जैसी जान पड़ती है। [वहाँकि दिव्य] रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए भवनोंमें अन्धकारका [स्वल्पमात्र भी] प्रवेश नहीं होता। वहींपर अपने पार्षदों और देवी महालक्ष्मीके साथ दैत्यशत्रु भगवान् नारायण विराजते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥ अपनी पुण्यराशिके कारण उस वैष्णवधामको देखकर वे नरेश आनन्दमग्न हो गये। तदुपरान्त दूतोंने राजाको भगवान् शिवकी आवासभूमि कैलासके दर्शन कराये। [वह शिवधाम] सुमेरुपर्वतके दस हजार योजन विस्तारवाले शिखरपर अवस्थित है॥ ४२-४३॥ जहाँ सूर्य और चन्द्रमाके सदृश ज्योतिर्मय प्रासाद शोभित होते हैं और जिसको पंचाक्षर मन्त्र तथा रुद्राध्यायका जप करनेवाले एवं अनेक साधनानुष्ठानोंमें निरत पुण्यात्मा लोग प्राप्त करते हैं, भगवान् विनायककी कृपासे ऐसे शिवलोकका दर्शनकर राजाने कहा कि दर्शनमात्रसे ही पुण्य प्रदान करनेवाले सभी देवलोकोंको मैंने देख लिया है॥ ४४-४५१/२ ॥ उस स्थानसे आगे चलनेपर हजार योजनतक सूर्य- चन्द्र [आदि प्रकाशक] नहीं थे [वहाँ केवल सघन अन्धकार ही था]। राजा उस विमानके प्रकाशके ही सहारे आगे बढ़ रहे थे, उन्हें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। वहाँ चारों ओर केवल बड़े-बड़े पहाड़ों-जैसे भौरोंका बादलोंकी गड़गड़ाहट-सा असह्य घोष राजाको सुनायी दे रहा था॥ ४६-४७१/२ ॥ तब राजाने दूतोंसे पूछा कि 'यह किसका शब्द सुनायी पड़ रहा है और मैं भगवान् गणपतिके चरणोंका प्रत्यक्ष दर्शन कब करूँगा?' ॥ ४८१/२ ॥ तभी राजाने अपने सामने भ्रामरी नामक एक बलवती शक्तिको देखा। वह अनेक सूर्योंके सदृश तेजोमयी, भयानक आकृतिवाली तथा ब्रह्माण्डको कौरके समान निगलनेकी सामर्थ्यवाली थी ॥ ४९१/२ ॥ फैले हुए मुखवाली उस शक्तिको देखकर राजा मूर्च्छित हो गये। तब दूतोंने राजाको चैतन्य किया और उनको लेकर आगे चल पड़े। तदुपरान्त राजाने उस शक्तिसे भी अधिक भयावह आधारशक्तिको देखा। भ्रामरीके मस्तकपर स्थित वह प्रभामयी शक्ति विकराल केशोंवाली और लम्बी जिह्वा तथा लटकते हुए ओष्ठोंसे युक्त थी। उसे देखकर राजा [भयके मारे] काँपने लगे ॥ ५०-५२ ॥ दूतोंके द्वारा सान्त्वना दिये जानेपर आगे बढ़ते राजाने कामदायिनी नामक शक्तिको देखा, जो आधारशक्तिपर आरूढ़ थी और दस हजार योजनके विस्तारवाली थी। उसके श्वास-प्रश्वाससे पर्वत डोलने लगते थे और Kalyana Visheshank 2021_Section_14_1_Back
क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उसके वज्रतुल्य कठोर शरीरमें वह पुरी (गणपतिका धाम) अवस्थित थी ॥ ५३-५४ ॥ तदुपरान्त दूतोंने राजासे कहा कि जिसका स्मरण करके तुम परितृप्तिका अनुभव करते हो और जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय तथा कल्याणमय है, उस स्वानन्दपत्तन (गणपतिधाम)-का तुम दर्शन करो ॥ ५५ ॥ जिसके हजारों उत्तम प्रासाद मोती, चाँदी और सूर्यकान्तमणियों (अथवा माणिक्य)-से बनाये गये हैं और जो सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटित हैं ॥ ५६ ॥ जहाँकी फर्श नीलमकी है और जहाँके लोग अग्निके समान तेजस्वी हैं। पीतरत्न अर्थात् पुखराजके द्वारा बनाये गये घाटों-तटोंवाले तथा नीलाभ, शीतल, स्वच्छ जलसे पूर्ण कुआँ, बावली, तालाब, सरोवर आदि जहाँ शोभित हो रहे हैं। जिनका कि जल पीनेसे लोगोंको भूख-प्यास, बुढ़ापा, रोग आदि नहीं सताते ॥ ५७-५८ ॥ जहाँपर विविध प्रकारके वृक्षों और लताओंसे शोभायमान और अत्यन्त स्वच्छ खेलके मैदान हैं तथा जहाँ मध्याह्नकालीन करोड़ों सूर्योंके समान भासमान दिव्य ओषधियाँ (अथवा तरु-लताएँ) शोभा पाती हैं। जहाँपर रात्रिमें नीचे उतरे हुए निष्कलंक चन्द्रमण्डलमें विलासीजन (दर्पणकी भाँति) अपना मुखावलोकन करते हैं। जहाँकी पुष्पवाटिकाओंकी सुवासित वायु विलासीजनोंके [विहारजनित] श्रमको दूर करती है। [ऐसे उस गणपतिधामके अन्तर्वर्ती] इक्षु [रस]-सागरके तटपर पहुँचकर आनन्दमग्न हुए वे [नरेश एवं दोनों दूत] विमानसे उतर गये ॥ ५९-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डका 'विनायकलोकगमनवर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ ❖ तिरपनवाँ अध्याय काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना और उनकी स्तुति करना ब्रह्माजी बोले-उन लोगोंने पुण्यराशिके कारण मिलनेवाले उस इक्षुसागरके रसका भलीभाँति पान किया। इक्षुसागरके मध्यमें एक निर्मल पुष्करिणी थी, जिसमें सूर्यके समान भासमान और हजारों पंखुड़ियोंवाला एक उत्तम कमल था। उस कमलके मध्यमें उन विनायकदेवका अत्यन्त मनोहर पर्यंक स्थित था ॥ १-२ ॥ पर्यंकपर दिव्य आस्तरण (बिछौना) बिछा हुआ था और वह दिव्य धूपोंसे सुवासित था। उसपर नानाविध दिव्य पुष्प बिखेरे गये थे तथा उसमें जटित उत्तम कान्तिवाली रत्नराशिकी आभा सभी दिशाओं और विदिशाओं (दिक्कोण ईशान आदि)-को उद्भासित कर रही थी। ऐसे उस पर्यंकपर सोये हुए विनायकदेवपर व्यजन डुलाये जा रहे थे ॥ ३-४ ॥ वे विनायकदेव करोड़ों चन्द्रमाओंकी-सी कान्तिवाले, विविध अलंकारोंसे मण्डित तथा सर्पोंसे विभूषित थे। उनकी सूँड़ केलेके तने-जैसी थी और उसमें [एकमात्र] दाँत शोभा पा रहा था। ओढ़े हुए दिव्याम्बरसे वे आवृत थे। उनके ललाटपर [तीसरा] नेत्र और सिरपर मुकुट शोभायमान था। उन्होंने [कानोंमें] कुण्डल, [हाथोंमें] बाजूबन्द, [अँगुलियोंमें] अँगूठी और [कटिदेशमें] बहुमूल्य करधनीको धारण कर रखा था ॥ ५-६ ॥ उनके सिद्धिप्रदायक चरणोंको सिद्धिदेवी और बुद्धिदेवी दबा रही थीं तथा अणिमा एवं गरिमा नामक सिद्धियाँ उनपर श्वेत चामर डुलानेमें निरत थीं। ज्वालिनी और तेजिनी नामक शक्तियाँ जगमगाती हुई-सी [मानो वहाँ प्रकाश फैलानेके लिये] उनके दोनों ओर अवस्थित थीं। भगवान् विनायक दिव्य गन्धानुलेपनसे अनुलिप्त एवं दिव्य मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ७-८ ॥ महिमा तथा प्रथिमा नामक सिद्धियाँ उनके समक्ष जल एवं निष्ठीवनपात्र (पीकदान) और रत्नजटित सुवर्णमय छत्र लिये खड़ी थीं ॥ ९ ॥ [वहाँ पहुँचकर] वे दूत काशिराजका हाथ पकड़कर विनायकदेवके समक्ष गये और वार्तालापका अवसर देखने लगे, तभी भगवान् जग गये ॥ १० ॥ Kalyana_Visheshank_2021_Section_14_2_Front
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३९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उन दूतोंने विनायकदेवको प्रणाम करके निवेदन | स्थापना की। तदुपरान्त मैं आपसे आज्ञा लेकर जन्मदाता किया कि आपकी आज्ञासे इन्हें हम लिवा लाये हैं- | पिता कश्यपजीके पास चला गया ॥ २०-२२ ॥ ऐसा कहकर उनके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए वे दोनों | उनको प्रणाम करके मैं समस्त वैभवोंसे परिपूर्ण इस दूर खड़े हो गये ॥ १९॥ | अपने धाममें आ गया। [यहाँपर] आपके ही विषयमें प्रबुद्ध हुए उन विनायकदेवको राजाने हाथ जोड़कर | सोचता हुआ मैं कहीं भी शान्ति न पा सका। तब आपके प्रणाम किया और अत्यन्त प्रीतिसे बोले 'आज मेरा वंश | आदिभाव अर्थात् मेरे प्रति वात्सल्यमूलक भक्तिभावको धन्य हो गया, मेरे माता-पिता, जन्म लेना, विद्या, | जानकर मैंने मुनिश्रेष्ठ मुद्गलको आपके घर भेजा और तपस्या, नेत्र और पुत्र आदि भी धन्य हैं; क्योंकि ब्रह्माजीके | उनकी कृपासे आपने और स्वयं उन मुद्गलमुनिने भी इस द्वारा जिनका ध्यान किया जाता है, ऐसे अपने चरणयुगलका | स्थानको प्राप्त किया है, यह स्थान तो श्रेष्ठ मुनिजनों [आपने] हमें दर्शन कराया है॥ १२-१३॥ | तथा ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी सर्वदा अलभ्य ही मैंने जैसा वैभव [यहाँका] देखा है, वैसा तो | है' ॥ २३-२५ ॥ ब्रह्मलोक, कैलास, इन्द्रलोक आदि किसी भी लोकमें | ब्रह्माजी बोले-उन विनायकके वचनामृतका नहीं दिखायी देता' ॥ १४ ॥ | पानकर और बार-बार उनकी वन्दना करके काशिराज तदुपरान्त उन विनायकने दूतोंको बैठनेकी आज्ञा | अपनी बुद्धिके अनुसार स्तवन करने लगे ॥ २६ ॥ दी। जब दूत बैठ गये, तब राजाने विनायकको [उन्हीं | राजा बोले- हे नाथ! जो कमल, पाश, खड्ग, पूर्वपरिचित] बालकके रूपमें देखा, जिन्होंने नरान्तक | परशु आदिके चिह्नोंसे युक्त हैं, ब्रह्मा आदि देवगण अपने और देवान्तक नामक दैत्योंका वध किया था। उन | कल्याणहेतु एकमात्र जिनका ही ध्यान किया करते हैं मृदुलदेह, हिम और कर्पूरके समान शुभ्र, अत्यन्त गौर | और जो भक्तोंके विघ्नोंका ध्वंस कर देते हैं, आपके उन तथा दो भुजाओंसे युक्त [बालरूप] विनायकको देखकर | चरणारविन्दोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २७ ॥ राजा कुछ भी बोल न सके। आँसुओंसे उनका गला भर | [हे नाथ! मैं आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना आया। काशिराजने आनन्दाश्रुओंकी धारासे विनायकदेवके | करता हूँ,] जो विष्णु, शिव आदि देवताओं तथा चरणयुगलको भिगो दिया ॥ १५-१७ ॥ | नानाविध अभीष्टसिद्धिके अभिलाषी मनुष्योंके द्वारा राजाके अलौकिक भक्तिभावको जानकर विघ्न- | बारम्बार पूजित होते हैं और विघ्नोंका नाश करनेमें विनायकने उन्हें उठाया और आलिंगन किया। [तब | कुशल एवं सांसारिक तापोंसे सन्तप्त प्राणियोंपर कृपामृतकी काशिराजने भी] विनायकके मस्तकको वैसे ही सूंघा, | वर्षा करनेवाले हैं ॥ २८ ॥ जैसे सुदीर्घकालोपरान्त समागत पुत्रका मस्तक पिता | हे नाथ! कृपाकटाक्षरूपी अमृतवर्षणसे तीनों तापोंका सूंघता है। तब विनायकदेवका भी गला आँसुओंसे भर | शमन करनेकी जिसमें प्रत्यक्ष सामर्थ्य गोचर होती है, आया और वे तथा राजा दोनों ही रोमांचित हो उठे। | आपके उस अग्नि-सूर्य-चन्द्रात्मक तीन नेत्रोंवाले आनन्दसिन्धुमें निमग्न हुए उन दोनोंको योगियोंकी भाँति | मुखारविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २९ ॥ शरीरका भान न रहा॥ १८-१९॥ | हे नाथ! हे सुरेश्वर! जो नानाविध अस्त्र-शस्त्रोंके इसके पश्चात् [प्रकृतिस्थ होनेपर] बालरूपी विनायकने | द्वारा दैत्यसमूहको विनष्ट करनेवाला, अनेकों भक्तोंको राजासे कहा- 'हे तात! आपके घरमें खेल-खेलमें मैंने | निर्भय करनेवाला और संसाररूपी कूपसे निकलनेका सहारा अनेक बार सदसद् व्यवहार किया है, वह सब आप सहन | है, मैं आपके उस करारविन्दकी वन्दना करता हूँ॥ ३०॥ करते रहे। मैंने वहाँ बहुत-से दैत्योंका वध किया, भूमिक | हे गणपति! आप [अजन्मा हैं तथापि] सत्त्वगुणका भार नष्ट किया, सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा धर्ममर्यादाकी | आश्रय लेकर [विष्णुरूपसे प्रजाओंका] भरण-पोषण
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क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करते हैं, रजोगुणका आश्रय लेकर [ब्रह्माके रूपमें विश्वप्रपंचकी] रचना करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर [रुद्ररूपसे ब्रह्माण्डका] संहार करते हैं। यह चराचर जगत् आपके ही नियन्त्रणमें है॥ ३१ ॥ जो निर्मलचित्त व्यक्ति आपका अहर्निश भजन करता है, आप उसके विघ्नोंको आक्रान्त करके [भक्तवत्सलताके कारण] उसके चारों ओर मँडराया करते हैं। वह [अपने निश्छल भक्तिभावसे] आपको वशीभूत करके सुखपूर्वक सोता है और आप [उसके हितार्थ] वैसे ही दौड़ते रहते हैं, जैसे बछड़ेके लिये गाय दौड़ती है॥ ३२ ॥ जो लोग दूसरे (देवताओं)-की उपासना करते हुए नानाविध सन्ताप प्राप्तकर संसार-चक्रमें बारम्बार भटकते रहते हैं, वे भी कभी-कभी आपके [करुणापूर्ण] अनुग्रहको प्राप्त करके [पुनः] मनुष्य-शरीर धारण करते हैं और तब [आपका सायुज्य] पा लेते हैं॥ ३३॥ भले ही कोई व्यक्ति धूलके कणों, आकाशीय तारागणों और बादलोंके द्वारा बरसाये जलबिन्दुओंको गिन ले, परंतु आपके गुणोंको गिन पानेमें तो अपनी सारी ही आयुमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हो सकते। [हे भगवन्! वस्तुतः आप निराकार और साकार—दोनों ही रूपोंवाले हैं; क्योंकि] निराकार कहे जानेवाले आपकी यदि आकृति न होती, तो उपासनाविधि ही व्यर्थ हो जाती और गुणोंके परिणामभूत प्राकृतिक प्रपंच तथा विभिन्न जीवोंके भाँति-भाँतिके कर्मभोग भी किस प्रकार सिद्ध हो पाते ? ॥ ३४-३५॥ यदि सज्जनोंकी संगति हो, उनका अनुग्रह हो, शास्त्रविहित कर्तव्यमें निष्ठा हो और निरन्तर आपका अनुध्यान हो तो चित्तकी शुद्धि, आपका महान् अनुग्रह, ज्ञान और मोक्ष—ये सभी दुर्लभ नहीं रहते * ॥ ३६ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारके स्तवनको सुनकर सन्तुष्ट हुए उन विनायकने काशिराजसे कहा कि 'मनोवांछित वर ग्रहण करो' ॥ ३७ ॥ राजाने कहा—[हे प्रभो !] जो मैं यहाँ आ सका हूँ, इतनेसे ही वरदानका प्रयोजन सिद्ध हो गया, अब मेरा पुनः जन्म-मरण न हो, इसका उपाय कीजिये ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजी बोले—स्तुतिसे सन्तुष्ट हुए विनायक उन दिव्य देहवाले काशिराजसे 'तथास्तु' (ऐसा ही हो)—इस प्रकार बोले और करोड़ों कल्पोंतकके लिये उनको अपने समीपमें स्थान दिया ॥ ३९ ॥ हे मुने ! उन विनायकदेवने ही कृपापूर्वक मुझको यह स्तोत्र बताया था, तदुपरान्त मैंने नारदजीको और नारदजीने महर्षि गौतमको यह स्तोत्र बतलाया। फिर महर्षि गौतमने इसे सभी ऋषियोंको प्रदान किया। अत्यन्त पावन यह स्तोत्र विघ्ननाशक और ज्ञान, मोक्ष तथा समस्त वांछित फलोंको देनेवाला है ॥ ४०-४१ ॥ गणपतिदेवके समक्ष जो मनुष्य तीनों सन्ध्याओंमें इसका पाठ करता है, उसे भक्तिकी प्राप्ति होती है। इसका पाठ करके विद्यार्थी विद्या, पुत्रार्थी सन्तान तथा विजयार्थी विजय प्राप्त कर लेता है। हे मुने ! जो-जो
- नृप उवाच नमामि ते नाथ पदारविन्दं ब्रह्मादिभिर्ध्येयतमं शिवाय। यत्पद्मपाशासिपरश्वधादिसुचिह्नितं विघ्नहरं निजानाम्॥ यदर्च्यते विष्णुशिवादिभिः सुरैरनेककार्यार्थकरैर्नैरैश्च। अनेकशो विघ्नविनाशदक्षं संसारतप्तामृतवृष्टिकारि ॥ नमामि ते नाथ मुखारविन्दं त्रिलोचनं वह्निरवीन्दुतारम्। कृपाकटाक्षामृतसेचनेन तापत्रयोन्मूलनदृष्टशक्ति ॥ नमामि ते नाथ करारविन्दं अनेकहेतिक्षतदैत्यसङ्घम्। अनेकभक्ताभयदं सुरेश संसारकूपोत्तरणावलम्बम्॥ त्वमेव सत्त्वात्मतया बिभर्षि सृजस्यदो राजसतामवाप्य। तमोगुणाधारतया च हंसि चराचरं ते वशगं गणेश ॥ यः शुद्धचेता भजतेऽनिशं त्वामाक्रम्य विघ्नान् परिधावसि त्वम्। स त्वां वशे कृत्य सुखं हि शेते वत्सं यथा गौरिव धावसि त्वम् ॥ येऽन्यन् भजन्तः समवाप्य तापान् संसारचक्रे बहुधा भ्रमन्तः। कदापि तेऽनुग्रहमाप्य तेऽपि भजन्ति मानुष्यमवाप्य तेऽपि ॥ धरारजः कोऽपि मिमीते नाके तारागणं वारिमुचां च धाराः। नालं गुणानां गणनां हि कर्तुं शेषो विधाता तव वर्षपूरैः ॥ निराकृतेस्ते यदि नाकृतिः स्यादुपासनाकर्मविधिर्वृथा स्यात्। गुणप्रपञ्चः प्रकृतेर्विलासा जनस्य भोगश्च तथा कथं स्यात् ॥ सत्सङ्गतिश्चेत्सदनुग्रहः स्यात् सत्कर्मनिष्ठा सदनुस्मृतिश्च। चित्तस्य शुद्धिर्महती कृपा ते ज्ञानं विमुक्तिश्च न दुर्लभा स्यात् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ५३ । २७-३६)
४०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुमने पूछा था, वह सब मैंने इस प्रकार बतलाया, काशिराजका आख्यान सुननेके बाद तुम और क्या सुनना चाहते हो ?॥ ४२-४३१/२॥ भृगुजी बोले- ब्रह्माजीके इन वचनोंको सुनकर व्यासजीका सन्देह नष्ट हो गया और उन उत्तमबुद्धि मुनिवरने दूसरी कथाओंको विस्तारपूर्वक सुननेके लिये प्रश्न किया॥ ४४१/२॥ व्यासजीने पूछा- [हे ब्रह्मन् !] उन विनायकने किस प्रकार अतिदरिद्र शुक्लके घरमें आदरपूर्वक साधारण भोजन करके उसकी दरिद्रताको दूर किया और काशिराजके समीप क्या-क्या लीलाएँ की थीं तथा काशिराजने क्या किया, यह सब बतलािये॥ ४५-४६॥ विनायकदेवने कैसे दोनों दैत्यों (नरान्तक और देवान्तक)-को मारा और कैसे पृथ्वीका भार हरण किया तथा किस रीतिसे धर्मकी स्थापना की-यह सब भली- भाँति आप मुझे बतलािये॥ ४७॥ ब्रह्माजी बोले-हे मुने ! उन बालरूप विनायकने शुक्लकी दरिद्रताका हरण करके और भी जो-जो लीलाएँ की थीं, वह सब चरित मैं तुमको संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ ४८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजाको स्वानन्दभुवनप्राप्तिका वर्णन' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥ चौवनवाँ अध्याय काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना ब्रह्माजी बोले- [एक दिन विनायकदेव भक्तिके वशीभूत होकर धनहीन शुक्लके घर जा पहुँचे और] उन बालरूप गणपतिने शुक्लके यहाँ भोजन किया, तदुपरान्त वहीं प्रांगणमें खेलते-खेलते क्षणभरमें सो गये। इधर [बहुत-से] नगरनिवासी जन, जो कि उन्हें भोजन कराना चाह रहे थे, विनायकको बुलानेके लिये काशिराजके भवनमें आये॥ १-२॥ काशिराजने उन नागरिकोंसे कहा [कि विनायक तो अभी यहीं खेल रहा था, लगता है] कि वह खेलता- खेलता यहाँसे [कहीं और] चला गया। तब लोग प्रत्येक घरमें विनायकको खोजने लगे। तभी कुछ लोगोंने कहा कि वह तो शुक्लके घर गया हुआ है, तब वे नागरिक उस अकिंचन शुक्ल और विनायकदेवकी निन्दा करने लगे॥ ३-४॥ नागरिक जन बोले- जैसे ऊँट कोमल पल्लवोंको छोड़कर काँट चबाता है, वैसे ही यह विनायक वैभवसम्पन्न हम लोगोंकी उपेक्षा करके उस दरिद्रके घर जा पहुँचा। राजाने तो उसे व्यर्थ ही ईश्वर मान लिया है; क्योंकि यदि वह बालक ईश्वर होता तो सभीके मनको प्रसन्न रखता॥ ५-६॥ उस बच्चेने कैसे [उस दरिद्रका] अतिसामान्य और अल्पमात्र भोजन किया होगा, यह सोचकर उन नागरिकोंमें- से कुछ भले लोग विनायकको ले आनेके लिये उद्यत हो गये। वे लोग इधर-उधर भटकने लगे और विनायकका पता पानेके लिये पथिकजनोंसे पूछने लगे कि क्या [आप लोगोंने] विनायकको कहीं देखा है। विनायकके प्रति भक्तिसम्पन्न वे लोग स्थान-स्थानपर उसके बारेमें पूछते हुए भ्रमण कर रहे थे। तब कुछ लोगोंने कहा कि वह कदाचित् शुक्लके घर गया है॥ ७-९॥ तब वे लोग तत्काल ही शुक्लके घर जा पहुँचे, वहाँ उन्हें जब ज्ञात हुआ कि विनायकदेव शयन कर रहे हैं तो वे सत्त्वगुणी जन [यह सोचकर] मौन भावसे बैठ गये कि जब वे विभु जगेंगे, तब उनसे हम [भोजनके लिये] प्रार्थना करेंगे। उन्हीं लोगोंमें कुछ रजोगुणी जन भी थे, वे [सोते हुए] विनायकसे कहने लगे- 'अरे ! उठो, भोजन करनेके लिये चलो, नहीं तो भोजन बासी हो जायगा॥ १०-११॥ [अरे !] तेरे लिये राजधानीके लोग कोलाहल कर रहे हैं, [और तू यहाँ शान्तिपूर्वक सो रहा है]। शुक्ल अर्थात् विशुद्ध भिक्षासे जीविकोपार्जन करनेवाले इस
क्री०ख०-अ०५४] * काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना * ४०१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] गरीब शुक्लको तो स्वयंके लिये भी भिक्षा पूरी नहीं पड़ती और इसके घर कोई पानीतक नहीं पीता। तब तूने कश्यपका पुत्र होकर भी इसके घरका दूषित भोजन कैसे कर लिया ?' इस प्रकार उन विनायककी कुछ लोग तो भाँति-भाँतिकी बातें कहकर भर्त्सना कर रहे थे और कुछ अन्य लोग उनका स्तवन करनेमें लगे थे ॥ १२-१४ ॥ मुनि बोले- इस प्रकार उन सभी लोगोंकी बातें सुनकर कश्यपात्मज गणेशजी [जग गये और] कहने लगे। विनायकदेव बोले- [हे नागरिको !] भक्तिपूर्वक अर्पित किये गये भोजनको मैं इच्छानुरूप ग्रहण कर चुका हूँ, अब तो मुझमें एक पग भी चल पानेकी सामर्थ्य नहीं है। मैं पूर्णरूपसे तृप्त हूँ, जिसके कारण इस समय तो एक ग्रास भी खानेकी मुझे इच्छा नहीं हो रही है ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले - तब [गणेशजीकी] ऐसी निष्ठुरता देखकर वे लोग हतोत्साह हो गये और आपसमें वार्तालाप करने लगे कि इस बालकके विषयमें क्या किया जाय ? ॥ १७॥ जब गणेशजीने पुरवासियोंकी विकलताको जाना तो जैसे आकाश एक और अखण्ड होकर भी घटाकाश, मठाकाशादिके भेदसे अनेकरूप प्रतीत होता है अथवा जैसे सूर्यविम्ब एक होकर भी विभिन्न जलकुम्भोंमें अनेक रूपोंमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही वे विभु क्षणभरमें अनन्त रूपोंमें प्रकट हो गये और प्रत्येक (नागरिक)-के घरमें जाकर अनेकविध बालक्रीड़ाएँ करने लगे ॥ १८-१९ ॥ वे विनायकदेव कहीं मार्गकी सीढ़ियोंमें, कहीं झूलों-हिंडोलोंमें, कहीं शय्यापर तो कहीं महलोंमें जाकर खेलते और हास-परिहास करते। कहीं घरके बच्चोंके साथ बैठकर भोजन करते। कहीं स्वयं शास्त्राध्ययन करते, तो कहीं आप ही पढ़ाने लगते ॥ २०-२१॥ काशिराजके साथ उन्हें अपने घरपर आया देख वह गृहस्वामी हर्षित होता और कहता कि आज तो मैं धन्य हो गया। इस प्रकार वे विनायक राजाके साथ सभीके घर गये। कहीं उनका तैलसे अभ्यंग (मालिश) किया जाता तो किसीके घरमें वे स्वच्छ जलसे स्नान कर
[दायाँ स्तम्भ] रहे होते। कहींपर अत्यन्त आदरसे उनके पैर धुले जाते, तो कहीं षोडशोपचार विधिसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा होती ॥ २२-२४ ॥ कहीं वे बालभाव (बालोचित चंचलता) - के कारण जैसे-तैसे परमान्न (पायस, कृसर आदि) ग्रहण करते तो कहीं कस्तूरी, चन्दन आदि नानाविध सुगन्धित द्रव्यों और पुष्पोंसे पूजित होते। तदुपरान्त उन्हें भाँति-भाँतिके नैवेद्य अर्पित किये जाते। जब वे यथेष्ट मात्रामें भोजन करके सो जाते तो घरकी महिलाएँ, छोटे बच्चे और सेवक उनकी चरण-संवहनादि (पैर दबाना, पंखा झलना आदि)-के द्वारा सेवा कर रहे होते ॥ २५-२६१/२ ॥ कहीं वे वेदपारायण करते, तो कहीं गायन कर रहे होते। कहीं वे महापुरुषों और श्रीहरिके चरित्रोंको सुना करते, तो कहीं राजाके साथ नृत्यांगनाओंका नृत्य देखते ॥ २७-२८ ॥ कहीं उनका मंगलदीपोंसे नीराजन किया जाता, तो कहीं वे विभु हाथमें पाश लेकर छोटे-छोटे बच्चोंके साथ खेला करते। कहीं वे पुराणों, धर्मशास्त्रों, स्मृतियों आदिका प्रवचन करते। इस प्रकारसे विनायकदेवने सभीके घरोंमें भोजनकर सबकी कामनाओंको पूर्ण किया। जिस- जिस व्यक्तिने जो-जो अभिलाषा की, उसकी वह-वह अभिलाषा उन्होंने वैसे ही पूर्ण की, जैसे प्रसन्न हुए भगवान् शिव, सर्वकामप्रदायक कामधेनु, कल्पवृक्ष अथवा चिन्तामणि- ये सभी पूर्ण करते हैं ॥ २९-३११/२ ॥ उस समय [सबकी अभिलाषा पूर्ण करके] उन विनायकने अपने 'दीननाथ' इस नामको सफल बनाया। [उनके इस अलौकिक चरितसे विस्मित हुए] देवताओंने दुन्दुभी बजायी और घर-घरमें फूल बरसाये। इधर वे काशिराज ऐसे विलक्षण चरितको देखकर भ्रमित हो गये और अपने लोगोंसे कहने लगे ॥ ३२-३३॥ 'यह बालक विनायक तो मेरे ही समीप स्थित है, तब कैसे ये सभीके घरोंमें जा पहुँचा और सबके द्वारा पूजित हो रहा है ॥ ३४ ॥ यदि यह सभीके घरोंमें गया तो इस समय इसका यहाँ होना कैसे सम्भव है? मुझे जो भी बुलाने आता है, उससे मैं
४०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
बार-बार यही कहता हूँ कि विनायकके बिना मैं आपके घर भोजनके लिये कैसे चल सकता हूँ?' ॥ ३५१/२ ॥ राजाने अपने घरमें कश्यपपुत्र विनायकके साथ भोजन किया और [रहस्य जाननेके अभिप्रायसे] बीचमें ही उठकर, भोजन करते विनायकको छोड़कर बाहर जब आकर देखने लगे तो उन्होंने विनायकको बाहर भी बैठा हुआ देखा ॥ ३६१/२ ॥ [राजाने देखा कि] जहाँ-तहाँ अत्यन्त विस्मित लोग इस बातकी चर्चा कर रहे थे कि 'विभु विनायकने काशिराजके साथ जाकर अनेक घरोंमें भोजन किया है!' उनकी बातें सुनकर हँसते हुए वे काशिराज लोगोंसे कहने लगे- 'मेरे बिना विनायक किस प्रकार विभिन्न घरोंमें भोजन करने चला गया?' तदुपरान्त राजाने दो- तीन घरोंमें जाकर देखा कि कश्यपपुत्र और वे स्वयं भी प्रत्येक घरमें भोजन कर रहे हैं - ॥ ३७-३९१/२ ॥ इसी बीच [एक अन्य अद्भुत वृत्तान्त काशीमें घटित हुआ-] सनक और सनन्दन ये दोनों मुनिश्रेष्ठ स्नानादिसे निवृत्त होकर भोजनार्थ भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि [सारी काशीमें] महान् उल्लास छाया हुआ है और वह सुन्दर [नगरी] विनायकमयी हो गयी है। वे जिस-जिस घरमें प्रवेश करते, उन्हें वहाँ-वहाँ विनायक ही दीखते। तब वे [आश्चर्यचकित-से होकर] बाहर आ जाते ॥ ४०-४२ ॥ उन मुनियोंने विनायकको कहीं भोजन करते हुए, कहीं भोजन किये हुए, कहीं सोते हुए, कहीं खेलते हुए, कहीं जप करते हुए, कहीं पढ़ते हुए तो कहीं पढ़ाते हुए देखा। प्रत्येक स्थानपर ऐसी ही स्थितिको देखकर वे आपसमें कहने लगे कि 'यहाँ तो भोजनके लिये कोई उपयुक्त स्थल दीखता नहीं है, अतः हमलोग शुक्लके घर चलते हैं, वही आदरपूर्वक हमारा विविध प्रकारसे आतिथ्य करेगा' ॥ ४३-४४१/२ ॥ इस प्रकारसे [आपसमें] निश्चय करके वे शुक्लके घर जा पहुँचे तो उनको वहाँ भी कश्यपपुत्र विनायक दिखायी पड़े। तब क्षुधापीड़ित वे लोग मुँह लटकाये हुए नगरसे बाहर चले गये। उन्होंने वहाँ भी भगवान् विनायकके
परम मनोहर स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा ॥ ४५-४६ ॥ यह देख उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये तो उन्हें अन्तःकरणमें विनायक दीखने लगे, जब मुनियोंने फिर आँखें खोलीं तो उनको बाहर भी विनायकके ही दर्शन हुए। उन मुनियोंने ऊपर-नीचे, मध्यमें तथा दिशाओं-विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-में विनायकको ही देखा ॥ ४७ ॥ तदुपरान्त वे मुनि नेत्र बन्दकर ध्यानमग्न हो गये और कुछ क्षणोंके बाद जब उन्होंने नेत्र खोले तो दोनों एक-दूसरेको विनायकरूपमें देखने लगे। सनकको सनन्दन और सनन्दनको सनक विनायकके रूपमें दीखने लगे। वे जिस-जिस देवताका ध्यान करते, उस-उस देवताके रूपमें उनको विनायकका ही दर्शन हुआ ॥ ४८-४९ ॥ तदुपरान्त उन मुनियोंके समक्ष सर्वव्यापक, सर्वरूप भगवान् विनायक प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उन मुनियोंने दश भुजाओंसे युक्त, सिद्धि और बुद्धिदेवीसे समन्वित, सिंहपर आरूढ़, देदीप्यमान मुकुट-कुण्डल एवं बाजूबन्द (आदि अलंकारों)-से विभूषित, दिव्य गन्ध, दिव्य माल्य, नाग, अर्धचन्द्र, कस्तूरीका तिलक और अग्निसदृश कान्तिमय वस्त्रोंको धारण किये हुए और दुष्टोंके लिये दुःसह तथा सत्पुरुषोंके लिये सौम्य, तेजस्वितासे युक्त भगवान् विनायकको देखा ॥ ५०-५२ ॥ तब निर्भ्रान्त हुए तत्त्ववेत्ता परम बुद्धिमान् मुनियोंने उन विनायकदेवको प्रणाम किया और बड़ी ही भक्तिसे हाथ जोड़कर उन पंचभूतस्वरूप विभु गणेशका स्तवन करने लगे ॥ ५३१/२ ॥ वे बोले-जो परब्रह्म नित्य, अद्वैत, अद्वय, सनातन, चराचरात्मा एवं सर्वरूप है और जिसके [एक-एक] रोममें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड भ्रमण करते रहते हैं। उपनिषद्वाक्य भी जिसका प्रतिपादन कर पानेमें समर्थ नहीं होते, उसका स्तवन करना कैसे सम्भव हो सकता है? हे देव! आपने हमारी मनोकामना जानकर उसे पूर्ण कर दिया ॥ ५४-५६ ॥ बालरूपको धारण करनेवाले आपकी महिमाको हम समझ नहीं सके, आपने पृथ्वीके भारका हरण
क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०३ करनेके लिये इस उत्तम कश्यपात्मजरूपको अंगीकार किया है॥ ५७॥ ब्रह्माजी बोले-उन मुनियोंके स्तवन करते- करते उनके समक्ष [आविर्भूत हुआ] वह रूप अन्तर्धान हो गया। उन निर्भ्रान्त मुनियोंने जब स्वरूपको अन्तर्हित जाना तो एक विशाल प्रासाद बनवाकर भगवान् विनायककी एक सुन्दर मूर्ति, जैसी कि उन्होंने देखी थी, उस प्रासादमें वेदघोष तथा मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ शुभ मुहूर्तमें स्थापित कर दी और उसका नाम 'वरदविनायक' रखा। वहींपर उन मुनियोंने एक उत्तम सरोवरका भी निर्माण कराया, जो गणेशतीर्थके नामसे विख्यात हुआ ॥ ५८-६०१/२॥ इस तीर्थमें स्नान, दान और उन गणपतिदेवका पूजन करनेसे मनुष्य अपने पूर्वकृत पापोंसे मुक्त होकर समस्त मनोवांछितोंको प्राप्त कर लेता है। [वरद- विनायककी स्थापना होनेके बाद] वहाँ मुनिगण तथा दिक्पालोंसहित सभी देवगण उपस्थित हुए और समर्चित हुए विनायकदेवका दर्शन, स्तवन तथा वन्दन करके पुनः लौट गये। इस प्रकार बालरूप विनायकके प्रभावकी परीक्षा करनेके लिये आये हुए सनक और सनन्दन उनके प्रभावको देखकर सन्तोषपूर्वक अपने परमलोकको चले गये ॥ ६१-६३१/२॥ जो इन बालरूप विनायकके इस मंगलमय चरित्रका भक्ति-भावसे श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह देहावसानके बाद ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। [इस अरिष्टनाशक चरित्रका पाठ-श्रवण करनेसे] बालग्रहजनित पीड़ा नहीं होती और सर्वत्र विजयकी प्राप्ति होती है ॥ ६४-६५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'काशीमें वरदविनायकमूर्तिकी स्थापनाका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥ पचपनवाँ अध्याय भगवान् विनायकका अपने भक्त ब्राह्मण शुक्लको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना ब्रह्माजी बोले-उन (सनक और सनन्दन)-के चले जानेके अनन्तर जब काशिराजने विनायकको नहीं देखा तो उन नृपश्रेष्ठको बड़ा मोह हुआ। [उसी दशामें] वे अश्वारूढ़ हो घर-घर भटकने लगे और कहने लगे विनायक कहाँ भोजन करने गया है, वह मुझे छोड़कर अकेला ही मिठाई खाने क्यों चला गया ? ॥ १-२ ॥ वे घर-घर जाकर पूछने लगे कि विनायक कहाँ चला गया, अभी-अभी तो भोजन करके वह बाहर आया था और खेलना चाह रहा था। तब [पुरवासियोंने उनसे कहा कि] आप व्यर्थमें क्यों पूछ रहे हैं? वह तो आपके ही साथ था। सभी नागरिकोंके द्वारा ऐसा उत्तर दिये जानेपर वे वैसे ही विह्वल हो उठे, जैसे परिवारवाला निर्धन गृहस्थ ॥ ३-४१/२॥ [तभी राजासे] कुछ लोगोंने कहा कि वह विनायक तो शुक्लके घरमें खेल रहा है। तब राजा प्रसन्नतापूर्वक शुक्लके घर जा पहुँचे, वहाँ उन्होंने बालरूपधारी विभु विनायकको उसके घरके आँगनमें वृषभपर आरूढ़ देखा ॥ ५-६॥ दूसरे शिवके समान प्रतीत होनेवाले वृषभारूढ़ उन विनायकको देखकर राजाने बड़े ही भक्तिभावसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहने लगे- ॥ ७॥ राजा बोले- [यह उचित ही कहा गया है कि] बालकमें न साधुता होती है और न ज्ञान अथवा स्नेह ही होता है। मुझे छोड़कर [अकेले-अकेले] तुमने विविध प्रकारके मिष्टान्न क्यों खाये ? ॥ ८॥ ब्रह्माजी बोले-राजाकी इस बातको सुनकर विनायक कहने लगे- [हे राजन्!] जहाँ-जहाँ मैंने भोजन किया, वहाँ-वहाँ तुमने भी भोजन किया है। हे
४०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मन्द! तुम मिथ्या भाषण कर रहे हो। [तुमने मुझे बालक | शुक्लको उत्तम वैभव प्रदान किया, जो सबको कहा है, पर वास्तवमें] बुद्धि आपकी ही बालकों-जैसी | आश्चर्यचकित करनेवाला तथा कुबेरके वैभवसे अधिक है। मेरी बातके साक्षी ये सभी लोग हैं, तुम इनसे पूछो, | श्रेष्ठ था। इधर महामना शुक्लने [सोचा कि लगता है] ये बतायेंगे ॥ ९-१० ॥ | विनायकदेव साधारण भोजन अर्पित करनेके कारण ब्रह्माजी बोले- तब विनायककी बात सुनकर | मुझपर रुष्ट हो गये हैं, यह विचारकर वे दीनभावसे लोगोंने राजासे कहा कि आपने विनायकके साथ अभी- | पत्नीके साथ [घर] लौट आये ॥ १९-२० ॥ अभी भोजन किया है। हे नृपसत्तम ! आप तो वृद्ध हैं, | [वहाँसे लौटकर अपने घरके समीपमें आये हुए] सत्पुरुष हैं, आप मिथ्या क्यों बोल रहे हैं? तब वे | शुक्लने जब अपनी घास-फूसकी कुटिया नहीं देखी तो ज्ञानवान् नरेश स्वाभाविक अवस्थामें आकर कहने | वे अत्यधिक चिन्तित हो उठे। उसी समय मानो लगे- ॥ ११-१२ ॥ | [किसीके द्वारा] बलपूर्वक प्रेरित किये गये सेवक- राजा बोले- [हे देव!] आपकी यह सर्वोत्कर्षमयी | सेविकाओंने शुक्ल और उनकी पत्नीको सुगन्धित तैलका माया जानी नहीं जा सकती, यह तो योगियोंको भी | मर्दन करके स्नान कराया तथा आभूषणों एवं स्वर्णिम मोहित करनेवाली है। आप धन्य हैं, क्योंकि सभी रूपोंमें | वस्त्रोंसे सुसज्जित किया ॥ २१-२२ ॥ सर्वत्र आप ही पूजित होते हैं ॥ १३ ॥ | [अपने भवनमें] सब प्रकारके वैभवको देखकर ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त रोमांचित शरीरवाले वे | वे दोनों अत्यधिक विस्मित थे। [वहाँकी] सुवर्णमयी नरेश ध्यानस्थ हो गये और उस दशामें वे स्वयं ही | दीवारोंमें रत्न जड़े थे, स्थान-स्थानपर मोतियों- विनायकके समान रूपवाले प्रतीत होने लगे ॥ १४ ॥ | मणियोंसे जटिल, भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मंच, शय्या, जिस प्रकार जल (-राशि)-में गिरा हुआ जल | आसन आदि तथा स्वर्णसे निर्मित पात्र विद्यमान थे। (-बिन्दु) उस जल (-राशि)-की समताको प्राप्त | वहाँपर नाना प्रकारके वस्त्र, आच्छादन (बिस्तर, पर्दे करता है, वैसे ही उन विनायकके ध्यानमें तन्मय होकर | आदि) तथा खानेयोग्य भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थ राजाने उन्हींका स्वरूप पा लिया। तदुपरान्त वैनायकी | थे ॥ २३-२४१/२ ॥ मायाके प्रभावसे वे नृपश्रेष्ठ पुनः (विनायकरूपसे) भिन्न | यह सब देखकर वे आपसमें कहने लगे- [अरे!] रूपवाले अर्थात् अपने स्वाभाविक रूपवाले हो गये ॥ १५ ॥ | यह छोटा-सा घर कैसे इन्द्रभवनके जैसा हो गया! तदुपरान्त राजाने विनायकको पालकीमें बैठाया | तदुपरान्त शुक्लने पत्नीसे कहा- 'हे भाग्यशालिनि! और भाँति-भाँतिके बाजे बजवाते, नानाविध नृत्य- | इस सबको तुम विनायककी ही कृपासे प्राप्त हुआ गीतादिके साथ उनको अपने महलमें ले गये ॥ १६ ॥ | समझो। अल्पमात्र [पूजा-सत्कार]-से सन्तुष्ट होनेवाले उस समय बालरूप विनायक देवताओंके बीचमें | वे महाविभु यद्यपि प्रकटरूपसे तो कुछ नहीं देते, परंतु कामदेवके समान अत्यधिक शोभा पा रहे थे और उनके | परोक्षरूपसे अपने द्वारा प्रचुर मात्रामें दिये गये [धन- पीछे-पीछे पत्नीके साथ शुक्ल धीरे-धीरे भक्तिपूर्वक जा | वैभवादि]-को भी वे थोड़ा ही मानते हैं। उन विभुको रहे थे। [एकाएक] बालक विनायकने अपना मुँह | भक्तिपूर्वक समर्पित किया गया यत्किंचित् (उपहार) भी घुमाकर जब शुक्लको देखा तो उन्हें बड़ी लज्जा आयी | उनको अत्यधिक जान पड़ता है ॥ २५-२८ ॥ कि अरे! बिना इसको सन्तुष्टिदायक कोई वर दिये मैं | इसलिये अपने कल्याणके लिये भयवश, कामनाविश, कैसे चला आया ? ॥ १७-१८ ॥ | स्नेहके कारण अथवा शत्रुभावसे ही सही, उन इस प्रकार मनमें विचारकर उन विभु विनायकदेवने | (विनायकदेव)-का स्मरण, वन्दन, स्तवन तथा पूजन
क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करना चाहिये' ॥ २९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इसके बाद (-का एक अन्य वृत्तान्त है।) नरान्तकके द्वारा प्रेरित शूर तथा चपल नामक दूत उस नगरमें बहुत समयसे छिपकर रह रहे थे। जिनके प्रचण्ड गर्जनसे तीनों लोक पीपलके पत्तेके समान काँप उठते थे और जिनके सिर हिला देनेमात्रसे इन्द्रसहित सभी देवगण काँपने लगते थे। बल, पराक्रम और गर्जनमें जिनकी बराबरी करनेवाला त्रिलोकीमें कोई भी नहीं था ॥ ३०-३१ १/२ ॥ [पालकीमें बैठे विनायकदेवको देखकर] वे दोनों परस्पर कहने लगे कि डोलीमें बैठा हुआ यह मुनिकुमार तो मार डालनेयोग्य है; क्योंकि इसने पूर्वमें आये हुए बलशाली दैत्योंका वध किया है। हमें उनका बदला लेना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥ [ऐसा निश्चय करके उन दैत्योंने] विद्युत्-रूप धारण किया और उच्च स्वरसे गरजने लगे। उनके तेजके कारण [पालकीकी रक्षामें नियुक्त] सैनिकोंके नेत्र चौंधिया- से गये और वे अत्यन्त व्याकुल होकर 'यह क्या, यह क्या' इस प्रकार चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ३४ १/२ ॥ इसी बीचमें वे दोनों दैत्य पालकीके समीप आ पहुँचे। [उन्हें देखकर] पालकी ढोनेवाले [भयवश] उन विनायकको छोड़कर भाग निकले। तब उन बलवान् दैत्योंको विनायकने बलपूर्वक अपने हाथोंसे पकड़ लिया और धरतीपरसे उन्हें उखाड़ फेंकनेके लिये वे बलपूर्वक दोनोंको घुमाने लगे, फिर सहसा करुणावश दैत्योंको पुनः भूतलपर खड़ा कर दिया ॥ ३५-३७ ॥ [विनायकदेवने उनसे कहा कि] मनुष्यको उसीका वध करना चाहिये, जो अपनेसे अधिक पराक्रमी हो। मच्छरको मार डालनेसे व्यक्तिका कौन-सा पौरुष प्रकट होगा? ॥ ३८ ॥ तदुपरान्त विनायकने दैत्योंसे पूछा-'बताओ, तुम लोग किसके दूत हो ? [तुम्हें अपराधबोध नहीं होना चाहिये, क्योंकि] अपनी शक्तिभर प्रयत्न करनेसे भी [सफलता न मिलनेपर] व्यक्तिको दोष नहीं लगता' ॥ ३९ ॥ विनायककी इन बातोंको सुनकर उनके समक्ष स्थित दैत्योंने कहा कि आप दयासिन्धु कहे गये हैं, दीनपालक ! आप तो हमारे साक्षात् पिता ही हैं ॥ ४० ॥ गर्भाधान करनेवाला, उपनयन करनेवाला, विद्या देनेवाला, रक्षक और भरण-पोषण करनेवाला- इन पाँच लोगोंको तीनों लोकोंमें पिता कहा जाता है ॥ ४१ ॥ हे देव! हमलोग नरान्तकके द्वारा भेजे गये दूत हैं। हमने [अपने वास्तविक] स्वरूपको छिपा रखा है। हम तो आपका अपकार कर रहे थे, पर आपने कृपापूर्वक हमें बचा लिया ॥ ४२ ॥ हे सर्वज्ञ ! आप अतीत, वर्तमान तथा भविष्य - सबको जानते हैं। जो-जो लोग वैरवश आपके समीप आये, वे सभी क्षणभरमें आपके द्वारा मार डाले गये ॥ ४३ ॥ इसी बीच पुरवासी जन विनायकसे कहने लगे- 'देव! ये दोनों दुष्ट तो संसारको भय देनेवाले हैं, आपने इनकी क्यों रक्षा की, इनपर किया गया उपकार तो हानि ही करेगा, क्योंकि साँपको दिया गया दूध तो जहर ही बनता है' ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब विनायकदेवने पुरवासियोंसे कहा- 'मैं पहले ही इन्हें अभयदान दे चुका हूँ, अब इसके विपरीत व्यवहार कैसे किया जा सकता है ? ॥ ४६ ॥ यह कहकर विनायकने उन दोनोंको मुक्त कर दिया, तब काशिराजने कहा [हे प्रभो! आपने] असंख्य अपराधोंको क्षमा करके उन शत्रुओंको मुक्त कर दिया। [वास्तवमें कोई] प्राणी जीवित रहेगा या मृत्युको प्राप्त करेगा, इसमें आपकी इच्छा ही कारण है। यह कहकर विनायकके साथ काशिराज राजभवन आ गये ॥ ४७-४८ ॥ तदुपरान्त विनायक और काशिराजको प्रणाम करके और राजा तथा विविध रूपोंवाले विनायककी प्रशंसा करते हुए सभी लोग अपने-अपने घर चले आये ॥ ४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दूतोंकी मुक्तिका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥
छप्पनवाँ अध्याय
४०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 छप्पनवाँ अध्याय नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त वे दोनों दूत रौद्रपुर | नामक असुर बालकको मारनेके लिये खड़े थे, बालकने नामक नगरमें स्थित नरान्तकके सभाभवनमें जा पहुँचे। | उन दोनोंको [वहाँ] भूतलपर पीस डाला॥ १०॥ वह मनोहर सभाभवन मणि-मुक्ता आदिसे विभूषित और | तदुपरान्त विशाल हाथीका रूप धारण करके हजारों स्तम्भोंसे शोभायमान था। उसकी लम्बाई-चौड़ाई | कुण्डिन्य (कुण्ड) नामक असुर वहाँ रास्ता रोककर खड़ा सौ-सौ योजनकी थी। उस नाना आश्चर्योंसे परिपूर्ण | हो गया तो उस बलशाली कुमारने कुण्डासुरका गण्डस्थल रमणीक सभाभवनमें अनेक शूर-वीर बैठे थे॥ १-२॥ | विदीर्णकर उसे क्षणभरमें मार डाला॥ ११ १/२ ॥ वहाँ विविध प्रकारकी मणियोंसे जटित सुन्दर | इसके बाद [विनायकको] मारनेके लिये जृम्भिणी आसनपर वह नरान्तक बैठा था और उसीके समीप उत्तम | (नामक राक्षसी) धर्मदत्तके घर पहुँची, वहाँ (स्थित) आसनोंपर उसके दो मन्त्री बैठे थे। जो कि बलवानोंमें | विनायकने उसके सिरपर नारियलसे प्रहार किया, तो वह श्रेष्ठ और [शरीरकी विशालताके कारण] गगनचुम्बी | भी मर गयी। फिर ज्वालासुर, व्याघ्रतुण्डासुर और तीसरा मस्तकोंवाले थे। तभी वे शूर और चपल नामक दूत | विदारणासुर—ये तीनों बालकको मारनेके लिये आये। नरान्तक [-के निकट गये और उस]-को प्रणामकर | तब पहले असुर ज्वालने उस पुरीको जलाना आरम्भ [उसके] बहुत-से गुणोंका वर्णन करने लगे॥ ३-४॥ | किया और तीसरा असुर विदारण वायुरूप धारणकर दूतोंने कहा—[हे महाराज!] दूतको चाहिये कि | ज्वालासुरकी सहायता करने लगा॥ १२-१४॥ वह जो कुछ भी अच्छा-बुरा विवरण हो, उसे बतलाये, | [उन तीनोंमें दूसरा जो] व्याघ्रतुण्ड था, वह सभी ऐसा न करनेपर वह अपराधी होता है और उसे स्वामीके | प्राणियोंका भक्षण करनेको उद्यत था। तब अनन्त दारुण कोपका भाजन बनना पड़ता है। दूतकी बातको | मायाओंवाले उस बालकने तीनोंको मार डाला॥ १५॥ सुनकर स्वामीको विचारपूर्वक अपना परम हित सिद्ध | तदुपरान्त ज्योतिषीके रूपमें मेघनाद नामक असुर करना चाहिये॥ ५ १/२ ॥ | आया तो विनायकने उसको अंगूठीसे प्रहार करके मार हम लोग [आपके आदेशानुसार] विनायकका | डाला। यह बड़े आश्चर्यकी बात थी। फिर कूप और अपकार करनेके लिये उस नगरमें गये और अत्यन्त गुप्त | कन्दर नामवाले दो मायावी असुर भी बलपूर्वक मारे रीतिसे बालक विनायक [-का वध करनेहेतु अवसर]- | गये। तत्पश्चात् बालकको मारनेके लिये अम्भ, अन्धक की प्रतीक्षा करते हुए रहने लगे॥ ६ १/२ ॥ | तथा तुंग नामक असुर आ पहुँचे। एक (अन्धक)-ने तब सर्वप्रथम विघण्ट और दन्तुर, जो बालकके | अँधेरा फैला दिया, दूसरा (अम्भ) मूसलाधार वर्षा करने रूपमें थे तथा विनायकको मारना चाह रहे थे; उन्होंने | लगा और तीसरा (तुंग) ऊँची चोटीवाला पहाड़ बनकर विनायकका आलिंगन किया तो उसने दोनोंको भस्म कर | बालकके ऊपर कूद पड़ा॥ १६-१८॥ दिया। तदुपरान्त बालकको उड़ाकर मारनेके उद्देश्यसे | तब विशाल पक्षीका रूप धारण करके [उस पतंग और विधूल वायुरूप धारणकर जा पहुँचे, तो | विनायकने] तीनोंको ही बहुत दूर फेंक दिया। फिर उन विनायकने उनका मस्तक फोड़कर वध कर दिया। तब | असुरोंका बदला लेनेके लिये भ्रमरा नामकी एक राक्षसी शिलाके रूपमें प्रबलासुर आया तो विनायकने उसके | सुन्दर युवतीके रूपमें आयी। वह बालकको खाना सैकड़ों टुकड़े कर डाले॥ ७-९॥ | चाहती थी। तब उस विघ्नराजने राक्षसीके वक्षपर आरूढ़ मार्गमें गधेका रूप धारणकर काम और क्रोध | होकर उसके प्राण हर लिये॥ १९-२०॥
क्री०ख०-अ०५६ ] * नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान * ४०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् विद्युत्-रूप धारणकर हम दोनों बालकको मारनेकी इच्छासे उसके पास गये तो उस बलिष्ठने अपने हाथोंसे हमें पकड़ लिया। फिर सारी कार्ययोजनाको पूछकर उस दयालुने हमें छोड़ दिया। उसको सारा वृत्तान्त बताकर हमलोग स्वामी (आप)-के समीप उपस्थित हुए हैं॥ २१-२२॥ एक बार उस नगरमें सभी लोगोंने अकेले विनायकको भोजनके लिये [एक ही साथ] निमन्त्रित किया और उसी समय निर्धन शुक्लने भी निमन्त्रण दिया। तब सर्वप्रथम उन विभुने द्रवीभूत वह भात तेल मिलाकर खा लिया और फिर वे अनन्त स्वरूप बनाकर सबके घरोंमें भोजन करने गये ॥ २३-२४॥ वे प्रत्येक घरमें काशिराजके साथ भोजन करते रहे, परंतु मोहवश काशिराज उनकी लीलाको समझ नहीं सके। हे स्वामिन्! इस प्रकारकी सामर्थ्य तो न कहीं देखी गयी है और न सुनी ही गयी है। अतः इस समय जो आपके लिये हितकर हो, उसीको भलीभाँति सम्पन्न किया जाय। हमको तो यही जान पड़ता है कि विनायकको जीतनेवाला [कोई] पुरुष तीनों लोकोंमें है ही नहीं ॥ २५-२६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन दोनोंकी ऐसी बातें सुनकर नरान्तक [क्रोधके कारण] जलने लगा। संसारको मानो खा जानेके लिये फैलाये हुए अपने मुखसे वह आग उगलने लगा और भयानक भृकुटिको टेढ़ी करके नरान्तक बोला—बन्दर कितना ही उछल-कूद करता हो, पर वह सिंहका कभी अनिष्ट नहीं कर पाता। अजगरमें निगलनेकी शक्ति तो होती है, परंतु वह भूमिको नहीं निगल सकता ॥ २७-२९॥ हमें तो आपकी बातें सुनकर मनमें आश्चर्य-सा हो रहा है। जुगनू तभीतक चमकता है, जबतक कि चन्द्रमा नहीं दीखता और चन्द्रमा भी तभीतक प्रकाशित होता है, जबतक सूर्य नहीं दृष्टिगत होता। सूर्यका तेज भी तभीतक ही है, जबतक कि राहु नहीं दीख पड़ता ॥ ३०-३१॥ [वैसे ही] यह बालक भी तभीतक महान् है, जबतक कालरूप मुझको वह नहीं देख लेता। अब तुम
[दायाँ स्तम्भ] लोग काशिराजके साथ उस बालकको मरा हुआ ही जानो। वह वहीं जानेवाला है, जहाँ उसके द्वारा मारे गये दैत्य गये हैं॥ ३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशाओंको गुँजाते हुए गरजने लगा॥ ३३॥ नरान्तकके गर्जनकी ध्वनिसे पूरित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसके बाद उसने सभी वीरोंको आज्ञा दी कि 'तैयार हो जाओ। कवच धारण करके [मैं स्वयं भी] काशिराजकी नगरी जा रहा हूँ।' उसके इस प्रकार कहते ही [लड़नेके लिये] तैयार सेना आ गयी ॥ ३४-३५॥ वह चतुरंगिणी सेना अत्यन्त भीषण, ध्वजोंसे समन्वित तथा [शत्रुओंका] सर्वविध [पराक्रम] शमन करनेवाली थी। उस समय सेनाके [प्रयाणसे उठी हुई] धूलसे सारा दिग्-दिगन्त आच्छादित-सा हो गया ॥ ३६॥ सूर्यके [धूलसे] ढँक जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। सिन्दूर लगानेसे रक्ताभ ललाटवाले, संख्यातीत पैदल सैनिक उछल-उछलकर दौड़ते हुए युद्धाभ्यास कर रहे थे। खुले हुए बालोंवाले कुछ दूसरे सैनिक हाथोंमें खड्ग तथा भुशुण्डी लिये हुए थे। [विनायकके हाथों] मारे गये दैत्योंका प्रिय करनेकी इच्छावाले कुछ दैत्य हाथोंमें भिन्दिपाल तथा मुसल लिये थे। कुछ सैनिक हाथोंमें ढाल, शिलाखण्ड, वृक्ष, खट्वांग, शक्ति तथा पाश लिये हुए [चल रहे] थे॥ ३७-३९ १/२ ॥ [पैदल सैनिकोंके पीछे-पीछे] उस समय घण्टा- ध्वनिसे शोभायमान गजसेना चल रही थी। [हाथियोंका वह समूह] सिन्दूरसे अरुणिम गण्डस्थलवाला तथा दाँतों और झूल आदिके आवरणसे युक्त होनेके कारण शोभायमान था। वह चलता हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो भाँति-भाँतिकी धातुओं (गेरू, शिलाजतु आदि)-से समन्वित पर्वतोंका समूह जा रहा हो ॥ ४०-४१॥ चिंग्घाड़ते और अपने दाँतोंको बजाते हुए वे हाथी मानो पहाड़ोंको छिन्न-भिन्न-सा करना चाह रहे थे। यदि [उनको नियन्त्रित करनेवाले] महावत न रहते तो वे सबका विध्वंस ही कर डालते। उस समय
४०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- गण्डस्थलसे बहते हुए] मदजलने [दिशाओंको ढक | बाणोंसे समन्वित, छोटी-छोटी घण्टियोंसे सज्जित और लेनेवाली] धूलको शान्त कर दिया ॥ ४२१/२ ॥ | सुवर्णनिर्मित धुरी, ध्वज तथा विशाल पहियोंसे युक्त तदुपरान्त [नरान्तककी सेनाके] घुड़सवार निकले। | था ॥ ४७-४८ ॥ उनके सिर मुकुटकी भाँति शोभायमान शिरस्त्राणोंसे युक्त | वह नरान्तक स्वर्णभूषण, मौक्तिकमालिका, अँगूठी, थे और उनके हाथोंमें चाकू, ढाल, कृपाण, धनुष तथा | तथा खड्गादिसे विभूषित था। उसकी विशाल काया बाण शोभा पा रहे थे। [नरान्तककी सेनाके हाथियोंकी] | कृष्णवर्णकी थी और उसके हाथमें वीरोचित विजयकंकण चिंघाड़ और [घोड़ोंकी] हिनहिनाहटने आकाशको | बँधा हुआ था। विशाल मुकुटसे शोभायमान नरान्तकके अतिशय गुणयुक्त कर दिया अर्थात् आकाश उन शब्दोंसे | कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसने अपने भर-सा गया ॥ ४३-४४ ॥ | शरीरमें केसर, अगुरु, कस्तूरी तथा कर्पूरसे युक्त सुगन्धित वे सैनिक कवच, शिरस्त्राण, त्रिशूल [आदि | लेप लगा रखा था ॥ ४९-५० ॥ युद्धोपकरणों]-से समन्वित थे और उन्होंने अपने हाथोंमें | उसने पवित्र होकर उन अस्त्रोंका स्मरण किया, जिनका गदा, मुद्गर, पट्टिश, विशाल फरसा आदि आयुधोंको | कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया था। वीरोचित आवेशके धारण कर रखा था। कुछ सैनिक हाथोंमें चक्र, तोमर, | कारण उसका शरीर वैसे ही फूल गया, जैसे [वातप्रकोप भाला, तलवार, पाश, अंकुश आदि लिये हुए थे। उनके | आदि] रोगके कारण रोगीका शरीर फूल जाता है। नाना घोड़े नानाविध अलंकारों और चामरोंसे अलंकृत थे। उन | प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे दिशाओं और दिक्कोणोंको अश्वोंमें वायुकी-सी तीव्रता और मनके समान गतिशीलता | गुंजित करते हुए अनेकों वीर सैनिक विनायकको जीतनेके थी, उनकी चेष्टाओंसे जान पड़ता था कि वे मानों | लिये गरजते हुए दीख रहे थे ॥ ५१-५२ ॥ आकाशको ही आक्रान्त कर लेंगे ॥ ४५-४६१/२ ॥ | हाथियोंके चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, सैनिकोंकी इसके पश्चात् अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर रथारूढ़ | ललकार और रथोंके पार्श्वभागकी घर्घरहाटसे बड़ा महारथी नरान्तकने प्रस्थान किया। उसका रथ स्वर्ण, | भीषण नाद हुआ, उसे सुनकर भयभीत देवगण पर्वत- रजत तथा मुक्तामणियोंसे जटिल, अनेकों अलंकृत घोड़ोंसे | कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकारसे वह नरान्तक युक्त, नानाविध आयुधोंसे पूर्ण, सैकड़ों धनुषों और | काशिराजके नगरमें जा पहुँचा ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकका निर्गमन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना ब्रह्माजी बोले-जब उस दैत्यराजने युद्धहेतु | बचानेके लिये दसों दिशाओंमें भागते जा रहे थे ॥ ३ ॥ प्रयाण किया तो प्राग्गुल्मों (राज्यकी सीमावर्ती चौकियों)- | [यह दशा देखकर] राजाने भोजन त्याग दिया में स्थित लोग भागकर राजाके समीप आये और भोजन | और वायुके समान (वेगपूर्वक) उठ खड़े हुए। सर्वप्रथम करते हुए राजासे कहने लगे कि चतुरंगिणी सेनाके साथ | उन्होंने युद्धोचित वेषभूषा धारण की और फिर लोगों वह दैत्यराज नरान्तक आ गया है। इधर नगरनिवासी भी | (सैनिकों)-को आदेश दिया कि 'युद्धके लिये तैयार हो युद्ध-वाद्योंकी ध्वनि सुनकर जोर-जोरसे चिल्लाने | जाओ।' ऐसा कहकर राजाने रणभेरी बजवायी ॥ ४१/२ ॥ लगे ॥ १-२ ॥ | बलवान् नरेशने खड्ग, ढाल, तरकस, धनुष, नगरमें लोगों (-के चीखने-चिल्लाने)-के कारण | कवच तथा शिरस्त्राण धारण किया और उन विनायककी अत्यधिक कोलाहल हो रहा था। लोग अपने प्राण | पूजा की, 'विनायक! आपकी जय हो'-ऐसा कहकर
क्री०ख०-अ०५७ ] * काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना * ४०९
[बायाँ स्तम्भ] प्रणाम किया और उनका स्मरण करते हुए अश्वपर आरूढ हुए ॥ ५-६ ॥ उनके भेरीरवको सुनकर सभी सैनिक [युद्धके लिये] तैयार हो गये और अत्यन्त उत्साहमें भरकर शीघ्रतापूर्वक पैदल तथा अश्व, गज, रथादिमें आरूढ़ हो चल पड़े। वे योद्धागण त्रिलोकीको निगलनेकी सामर्थ्यवाले थे। [इन सभी सैनिक वीरोंके साथ] वे नरेश नगरके पूर्वभागमें विद्यमान एक वेदीमें स्थित हो गये ॥ ७-८॥ राजाने मन्त्रियों तथा सभी सैनिकोंको धन-वस्त्रादिसे सन्तुष्ट किया और कहा कि आपलोग पराक्रम दिखलाइये, आज उसका अवसर आया है ॥ ९ ॥ यद्यपि विनायककी अनुकम्पासे हमें कहीं भी भय नहीं है, तथापि दैत्य बड़ा ही बलवान् है, इसने अपने पराक्रमसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है ॥ १० ॥ विजयमें कोई नियम नहीं होता (कि इसकी ही विजय होगी) और मनुष्य प्रारब्धके अधीन होते हैं। मैं यह बात इसीलिये कह रहा हूँ, कि अपनी सेना शत्रुसेनाके लाखवें भागके भी बराबर नहीं है ॥ ११ ॥ कहाँ सागर और कहाँ घड़ाभर पानी, कहाँ सूर्य और कहाँ जुगुन्यू! सामनीतिका आश्रय लेनेवाले हम लोग तो राजलक्ष्मीके साथ उन (विनायक)-के द्वारा ही सुरक्षित रहे हैं। उन विनायकने कितने ही दैत्योंका वध किया था, जिसका अपराध अब बादमें हम लोगोंके सिरपर आया है। आज वह (नरान्तक) सामनीतिको त्यागकर युद्ध करने आया है, अतः जिससे हित हो, वैसा विचार करना चाहिये ॥ १२-१३ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब वहाँ स्थित महामन्त्रीने भयविह्वल राजासे कहा—'हे राजन्! बुद्धिशील चार लोगोंके साथ आप दैत्यराज नरान्तककी शरणमें चले जाइये; क्योंकि अपना काम बनानेके लिये नीचोंका आश्रय लेना भी कल्याणकारी है। हे राजेन्द्र ! आपको मैं बृहस्पतिका मत बता रहा हूँ, उसे सुनिये और सुनकर वैसा ही कीजिये, तो अवश्य ही कल्याण होगा' ॥ १४-१६ ॥ बृहस्पति कहते हैं— [आपत्तिग्रस्त पुरुषको चाहिये कि] वह कन्यादान, सहभोजन, वस्त्रादिका उपहार,
[दायाँ स्तम्भ] मधुर बातें, प्रणिपात, प्रीतिभाव, सहयात्रा, यशोगान, शत्रुके विश्वासपात्र जनोंका समर्थन आदि मुख्य उपायोंसे शत्रुओंका संहार कर दे ॥ १७ ॥ महामात्य बोला—[राजन् !] यदि वह [बदलेमें] विनायकको माँग ले तो उसे विनायकको भी सौंपकर राज्यकी रक्षा कर लेनी चाहिये। मुझे तो यही उचित जान पड़ता है, जिसमें आपका हित हो, उसीका निश्चय कीजिये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब सभी लोग राजासे बोले— 'हे नृप! वैरशान्तिके लिये महामात्यने सर्वथा उचित बात कही है, वही ठीक है, वही समर्थनीय है' ॥ १९ ॥ वे लोग इस प्रकार विचार ही कर रहे थे कि तभी उन अत्यन्त बलशाली सभी दैत्योंने टिड्डियोंके समान सेनाओंके द्वारा नगरको घेर लिया ॥ २० ॥ जब नगरवासी लोग [छिपनेके लिये] नगरके बीचमें गये तो उन पापियोंने उस नगरको ही जलाना आरम्भ किया। दसों दिशाओंमें प्रचण्ड अग्नि धधक उठी। धुएँके कारण सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया, जिससे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो संसारमें अति भयानक प्रलय ही आ गया हो ॥ २१-२२ ॥ जो लोग आगसे घबराकर बाहर निकल रहे थे, उनको शत्रु पकड़ लेते थे। [वे पापी नगरमें रहनेवाली] कुमारियों और युवतियोंको कुत्सित चेष्टाओंके द्वारा शीलभ्रष्ट कर रहे थे। [इस घृणित व्यवहारसे] अत्यधिक लज्जित कुछ स्त्रियाँ तत्काल प्राण त्याग दे रही थीं। कुछने नगरद्वारसे गिरकर आत्महत्या कर ली ॥ २३-२४ ॥ कुछ अन्य महिलाओंने विषभक्षण, शस्त्रघात तथा फाँसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। [दैत्यराजके] अनुचरोंने [बहुत-सी] सुन्दर स्त्रियोंको पकड़कर उन्हें अपने स्वामीके समीप पहुँचा दिया ॥ २५ ॥ नरान्तकने उन स्त्रियोंके साथ दुराचार करके उन्हें अपनी राजधानी भिजवा दिया। इस प्रकारकी विनाशलीलाको देखकर राजाने अपने मन्त्रियोंसे कहा- ॥ २६ ॥ यदि हम लोगोंके देखते-देखते स्त्रियोंको ये दुरात्मा
४१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पापी ले जा रहे हैं, तो यह हमारे लिये बड़ी बदनामीकी बात होगी, अतः हम असुरोंसे युद्ध करेंगे। ऐसा कहकर उत्साहपूर्वक युद्ध करनेवाले उन नरेशने अपने अश्वको चलनेका संकेत किया और तत्काल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर बाणवर्षा करने लगे ॥ २७-२८ ॥ काशिराजने धनुषसे वैसे ही बाण बरसाना आरम्भ किया, जैसे बादल जल बरसाते हैं। [उस बाणवर्षासे] सूर्य आच्छादित हो गया और दैत्य किंकर्तव्यविमूढ हो गये। उन बाणोंसे दैत्यवृन्द विनष्ट होने लगा। कुछ दैत्य मर गये, कुछ खण्ड-खण्ड हो गये और कुछ दैत्योंके चरण छिन्न-भिन्न हो गये ॥ २९-३० ॥ कुछ दैत्योंके पेट फट गये, कुछकी भुजाएँ कट गयीं, कुछकी आँखें फूट गयीं और कुछ दैत्योंकी जंघाएँ विदीर्ण हो गयीं। सेनाके साथ मन्त्रिगण काशिराजका अनुगमन कर रहे थे। उन सभीने मिलकर खड्ग, परशु आदि आयुधोंसे उन शत्रुसैनिकोंका संहार कर डाला ॥ ३१-३२ ॥ युद्धभूमिमें उनके प्रहारोंसे कुछ दैत्य मर गये और कुछ भूतलपर गिर पड़े। इधर वे दैत्य भी [राजाके पक्षके] सैनिकोंका महान् शस्त्रोंके द्वारा संहार करने लगे। सेनाके चक्र्रमणके कारण उठी हुई धूलसे भीषण अन्धकार छा गया, जिसके कारण वे सैनिक बिना पहचानके, अपने और पराये पक्षके योद्धाओंको शस्त्रोंसे मारने लगे तथा एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मल्लयुद्ध करने लगे ॥ ३३-३४१/२ ॥ [उस समय] अश्वारोही अश्वारोहियोंसे, गजारोही गजारोहियोंसे, पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंसे तथा रथारोही रथारोहियोंसे [भाँति-भाँतिके] शस्त्रों, बाणों आदिके द्वारा युद्ध कर रहे थे। इस रीतिसे सैनिकवीरोंका वह भीषण संग्राम हो रहा था ॥ ३५-३६ ॥ [राजासे पराभूत हुई] दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी और भागने लगी। तब विजयी काशिराजने उच्च स्वरसे सिंहके समान गर्जना की। तदुपरान्त युद्धोत्सुक हाथीके समान उत्साहपूर्वक वे विभिन्न सैन्य-समूहोंमें जा-जाकर, प्रमुख-प्रमुख योद्धाओंको मारते रहे, तथा उस महाभीषण सेनाको तितर-बितर करते हुए उन्होंने दैत्यसेनाके एक लाख वीरोंका संहार कर डाला ॥ ३७-३८१/२ ॥ इस प्रकारसे [सेनाका] विनाश करनेमें लगे उन नरेशको देखकर शत्रुसैनिकोंने [यत्नपूर्वक] रोका और 'यही काशिराज हैं' ऐसा निश्चय करके उन्हें सबने घेर लिया तथा राजाकी प्रबल बाणवर्षाको [किसी प्रकार] सहन करते हुए उनको शत्रुओंने बलपूर्वक बन्दी बना लिया ॥ ३९-४० ॥ मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाके बन्दी बना लिये जानेपर राजसैनिक उच्च स्वरसे 'राजा पकड़ लिये गये हैं' ऐसा कहते हुए चीत्कार करने लगे ॥ ४१ ॥ तदुपरान्त दैत्योंने कुछ राजसैनिकोंको पकड़ लिया, कुछ भाग निकले, कुछ मर गये, कुछ घायल हो गये और कुछ सैनिक दैत्योंके शरणापन्न हो गये। जैसे घनघोर जंगलमें बलशाली भेड़िये हृष्ट-पुष्ट बैलको पकड़ लेते हैं, वैसे ही नरान्तकके दूत मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाको [पकड़कर उन्हें] नरान्तकके समीप ले गये ॥ ४२-४३ ॥ अवरुद्ध न होनेयोग्य दैत्यसैनिकोंके द्वारा वह पूरा नगर जला दिया गया, तदुपरान्त नरान्तकने अपने शूर- वीर योद्धाओंसे कहा— हे वीरो ! जिस कार्यके लिये हम लोग आये थे, वह सम्पन्न हो चुका है। इस समय वह मुनिपुत्र विनायक मेरे लिये नगण्य ही है। जब राजा ही जीत लिया गया तो सेना भी पराजित है, किलेपर अधिकार हो जानेपर नगरको भी विजित ही मानना चाहिये। काशिराजके पराजित हो जानेसे निश्चय ही बालक विनायक भी पराजित हो चुका है ॥ ४४-४६ ॥ यह राजा विवश होकर अभी बालकको ले आयेगा—ऐसा कहकर [विजयसूचक] बाजे बजवाता हुआ नरान्तक अपनी राजधानीकी ओर चल पड़ा ॥ ४७ ॥ उस समय यशोगान करनेवाले बन्दीजन नरान्तकका स्तवन कर रहे थे, काशिराजको उसने अपने आगे कर रखा था और वह यशोगायक बन्दीजनोंको [वांछित] वस्तुएँ तथा ब्राह्मणोंको [दान] देता हुआ जा रहा था ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजनिग्रह' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥
अट््ठावनवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०५८] * काशिराजकी पत्नीका विलाप करना * ४११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट््ठावनवाँ अध्याय काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना ब्रह्माजी बोले- इधर नरान्तक हर्षपूर्वक आधा ही मार्ग तय कर पाया था कि तबतक काशिराजकी पत्नीको यह सूचना प्राप्त हो गयी कि राजाको बन्दी बनाया गया है। राजपत्नी इस बातसे अतिशय शोकाकुल हो गयी और [असुरोंके द्वारा किये गये विनाशसे] जो बच निकले थे, वे नागरिक भी शोकमग्न हो गये। जलहीन सरोवरमें स्थित मछलियोंकी भाँति व्याकुल उन लोगोंने अत्यधिक क्रन्दन किया ॥ १-२ ॥ शत्रुओंके द्वारा पतिको बन्दी बनाये जानेसे व्याकुल हुई महारानी वायुवेगसे गिरे कदलीवृक्षकी भाँति भूतलपर गिर पड़ीं। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनकी कान्ति नष्ट हो गयी। [कुछ समयके पश्चात् जब उन्हें चेतना हुई तो] वे सखियोंके साथ विलाप करने लगीं और रोती हुई बोलीं- ॥ ३१/२ ॥ अम्बा [राजभार्या] बोलीं-जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाले, गजसेनाके संहारक और सिंहके सदृश वीरतापूर्ण चेष्टाओंवाले थे, वे काशिराज कैसे शृगालतुल्य दैत्यके द्वारा बलपूर्वक बन्दी बनाये गये ? दैत्यसमूहके विनाशक एवं मदमत्त हजारों हाथियोंके समान बलशाली मेरे स्वामीका बल कहाँ चला गया ? भगवान् महेश्वर मुझपर किसलिये रुष्ट हो गये ? कब मैं अपने पतिको देख सकूँगी ? ॥ ४-६॥ अब मैं किस देवताका आश्रय लूँ, जो उनको शीघ्र ही मुक्त करा सके ? कश्यपपुत्र विनायकके कारण राजाने प्रबल संग्राम किया। राजाका वह सब (शरणागतरक्षणका भाव) व्यर्थ हो गया। वे [कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें] मोहग्रस्त हो गये और बालककी बातोंमें आकर व्यर्थमें ही प्रबल वैरियाँसे विरोध कर बैठे ॥ ७-८॥ पतिको बन्दी बना लेनेवाले उस महादैत्य नरान्तकको सबके बिना अर्थात् बिना सभी साधनोंसे सम्पन्न हुए कौन जीत सकेगा? आज तो मुझ मन्दभागिनीके लिये यह प्रलयकाल ही आ गया है। मुझको और पृथिवीको [अकारण ही] वैधव्य क्यों प्राप्त हुआ है ? उन (राजा)-के जैसा कोई करुणासागर कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता, जो हमें शरण दे सके ॥ ९-१० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके राजपत्नीके शोकपूर्ण उद्गार सुनकर बलवान् कश्यपपुत्र विनायकने बड़े जोरसे गर्जना की। वह गर्जनघोष ब्रह्माण्डको फाड़ देनेवाला जान पड़ता था ॥ ११ ॥ उनकी गर्जनासे प्रतिध्वनित आकाश और दिशाएँ भी गरज उठीं, जिससे पर्वतों और वनोंकी आधारभूमि सारी पृथ्वी काँप उठी। पक्षीगण गिर पड़े और मरने लगे तथा मनुष्योंमें विह्वलता छा गयी ॥ १२१/२ ॥ तदुपरान्त क्रोधसे विकृत नेत्रोंवाले विनायकने सिद्धि नामक शक्तिकी ओर देखकर कहा- 'अरे ! उस भीषण संग्रामके अवसरपर तू कहाँ चली गयी थी?' तब सिद्धिने विनायकके मनोभावको जानकर विविध प्रकारकी सेनाओंको प्रकट किया ॥ १३-१४॥ [सिद्धिद्वारा] प्रादुर्भूत हुए वे हजारों वीर भयानक मुखोंवाले थे। उनके दाँत हलके समान, जिह्वाएँ सर्प-जैसी और मस्तक पर्वतोंके समान विशाल थे ॥ १५ ॥ वे वीर इस प्रकारसे मुखोंको फैलाये थे, मानो एकाएक भूमण्डलको ही निगलना चाह रहे हों। उन महाबली पुरुषोंके सैकड़ों नेत्र थे और वे मुखसे अग्नि- ज्वालाएँ उगल रहे थे। उनके नथुनोंमें प्रविष्ट होकर बड़े-बड़े हाथी भी ओझल हो जाते थे और जिनके श्वासवेगसे चन्द्रमा और सूर्य भी भूतलपर गिर जाते थे ॥ १६-१७ ॥ जिनकी जटाएँ सम्पूर्ण पृथिवीको बुहार देती थीं और जिनके हाथ हजार योजन लम्बे तथा पैर दो हजार
४१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- योजनकी दीर्घतावाले थे ॥ १८ ॥ उन वीरोंका स्वामी क्रूर विनायकके समीप आकर पूछने लगा- 'हे प्रभो ! मेरे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो ! मैं भूखा हूँ, अतः सर्वप्रथम आप मुझे तृप्ति देनेवाला भक्ष्य प्रदान कीजिये।' इस प्रकारसे निवेदन करते हुए उस वीरपुरुषसे विनायकने कहा- ॥ १९-२० ॥ 'नरान्तकके द्वारा भलीभाँति संरक्षित इस विशाल सेनाका तुम भक्षण करो और उस नरान्तकको मारकर शीघ्र ही उसका मस्तक मेरे पास ले आओ। अगर तुम उसकी सेनाको खाकर तृप्त न हो सके तो तुमको खानेके लिये कुछ और दूँगा।' कश्यपात्मज विनायकसे इस प्रकारकी आज्ञा प्राप्त करके [उसने] उनको प्रणाम किया और घोर गर्जन करके नरान्तकके समीप जा पहुँचा ॥ २१-२२१/२ ॥ उसकी घोर गर्जना और वैसे [भयावह] रूपके कारण नरान्तक तथा उसके सैनिक भयभीत हो गये और वे दसों दिशाओंमें भागने लगे। [तब वह क्रूर] उन सभी सैनिकोंको हाथमें ले-लेकर मुखमें डालने लगा। उस समय भूतलसे उठती धूलके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था। उस घनघोर अँधेरेमें नरान्तकके सैनिक मशालोंके सहारे कुछ देख पा रहे थे ॥ २३-२५ ॥ उस भयानक पुरुषको देखकर कुछ सैनिकोंने प्राण त्याग दिये। जो मर चुके थे और जो जीवित थे, उन सभीको वह वेगपूर्वक खाता जा रहा था ॥ २६ ॥ इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश होते देख नरान्तक अपने मनमें सोचने लगा कि' [अरे !] यह तो कालका भी काल आया हुआ है। अब मुझे क्या करना चाहिये, यह तो बड़ा ही बलवान् जान पड़ता है।' ऐसा कहते हुए उसने देखा कि आधी सेना तो खायी जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥ [नरान्तक सोचने लगा कि अरे !] 'यह तो प्रलयाग्निके समान सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें लगा है। [यदि इसे रोका न गया तो] यह इस (सेना)-को वैसे ही निश्शेष कर देगा, जैसे महर्षि अगस्त्यने समुद्रको किया था' ॥ २९ ॥ उस समय सभी दैत्य सैनिक भयानक चीत्कार कर रहे थे। कुछ योद्धा खा लिये गये थे और कुछ चरणोंके आघातसे पीस डाले गये थे। कुछ उसकी श्वासवायुके आघातसे मर गये, तो कुछने केवल उसके भयसे ही प्राण त्याग दिये। [भागते हुए] सैनिक एक-दूसरेपर गिरते जा रहे थे ॥ ३०-३१॥ वे उस नरान्तकको चीखते हुए बुला रहे थे कि 'आइये, यहाँ आइये और हमें बचा लीजिये।' उधर वह (विनायकका गण) हाथके प्रहारसे सैनिकोंको मार- मारकर तत्काल ही उनको खाता जा रहा था ॥ ३२ ॥ असंख्य सैनिकोंको खा लेनेपर भी उसकी जठराग्नि शान्त नहीं हो पा रही थी। हे मुने ! उस गणने [इस प्रकारसे] अश्वारोहियों, गजारोहियों, रथारोहियों और पैदल सैनिकोंको खाया तथा हाथी आदि बहुतसे वाहक पशुओंको मार डाला ॥ ३३१/२ ॥ तब इस प्रकारके कोलाहलको सुनकर उस नरान्तकने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी और भूतलपर अपने घुटने टेक करके दोनों [कन्धोंमें बँधे तरकसों]-से बाण निकालकर धनुषको खींचा तथा बाणवर्षा करने लगा ॥ ३४-३५ ॥ तब बाणवर्षाके कारण अँधेरा छा गया और [आकाशमें उड़ते] पक्षी तथा बहुत-से राजसैनिक भूतलपर गिरने लगे। दैत्यराज नरान्तकके द्वारा छोड़े गये बाणोंको वह पुरुष (विनायकका गण) निगलता जा रहा था। उसके रोमकूपोंमें असंख्य बाण प्रविष्ट होते जा रहे थे और उन (रोमकूपों)-से रुधिर बह रहा था। इसपर भी उसे अणुमात्र वेदना नहीं हो रही थी। तदुपरान्त नरान्तकने अपने सामर्थ्यसे [बहुत-सारे] अस्त्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३६-३८ ॥ तब उस गणने उन सभी अस्त्रोंको वैसे ही निगल लिया, जैसे आजगरी (मादा अजगर) अण्डे निगल लेती है। नरान्तकके अस्त्र कुण्ठित हो गये, शस्त्र नष्ट हो गये और उसका बाणसंग्रह भी समाप्त हो चुका था। तब वह बलहीन दैत्यराज भाग निकला। उसके पीछे-पीछे वह कालपुरुष भी दौड़ने लगा ॥ ३९-४० ॥ भूतलपर दौड़ते-भटकते उस दैत्यने जब पीछा करते
क्री०ख०-अ०५९] * काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति * ४१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उस कालपुरुषको देखा, तो उसके भयवश त्वरित गतिसे नरान्तक स्वर्ग जा पहुँचा। जब वहाँ भी उसने अपने पीछे आते हुए [उस] कालपुरुषको देखा तो वह धरातलपर कूद पड़ा और पातालमें प्रविष्ट हो गया। पातालमें जाते हुए नरान्तकको उस कालपुरुषने बाल पकड़कर वैसे ही खींच लिया, जैसे बिलमें प्रवेश करते हुए अतीव बलवान् सर्पको गरुड़ खींच लेते हैं ॥ ४१-४३ ॥ तदुपरान्त उस बलशाली कालपुरुषने नरान्तकसे कहा—'नरान्तक! कहाँ जाओगे, तुम तो मेरे सामने ही दीख रहे हो। अरे महापापी! तूने शिवके वरदानसे मदमत्त होकर देवताओं और ऋषियोंको सताया है तथा इतने मनुष्योंका संहार किया है, जिसकी कोई संख्या नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अरे दुष्ट! तेरा ही संहार करनेके लिये विनायकदेव अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये समग्र अभिमानका त्यागकर उनकी शरणमें चला जा। उनके चरणकमलका अवलोकन करते ही तेरे सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे' ॥ ४६ १/२ ॥ ऐसा कहकर वह कालपुरुष दैत्यराज नरान्तकको बलपूर्वक विनायकके समीप ले आया और फिर स्वामी विनायकदेवको प्रणाम करके कहने लगा— ॥ ४७-४८ ॥ 'हे विनायक! हे विभो! आपके आदेशानुसार मैंने विशाल दैत्यसेनाका पूर्णरूपसे भक्षण कर लिया है। इस नरान्तकने भी मुझे अत्यधिक पीड़ा पहुँचायी है, मैं इसे पकड़कर आपके पास ले आया हूँ। अब मुझे थकावट दूर करनेके लिये कोई शयनयोग्य स्थान प्रदान कीजिये और सबको सुखी करनेके लिये इसको मोक्ष दीजिये' ॥ ४९-५० ॥ कालपुरुषके ऐसे कथनको सुनकर उससे विभु विनायकने कहा—'तुम मेरे मुखके भीतर प्रविष्ट हो जाओ और इच्छानुरूप निद्रासुख प्राप्त करो।' विनायकके मुखसे निकली इस प्रकारकी उत्तम बात सुनकर वह पुरुष उनके मुखमें प्रविष्ट हुआ और उन्हींके स्वरूपमें विलीन हो गया। जैसे पृथिवीसे उद्भूत गन्ध उसीमें लीन हो जाती है, वैसे ही विनायकसे समुत्पन्न वह पुरुष उन्हींमें लीन हो गया ॥ ५१-५३ ॥ जो मनुष्य इस आदरणीय उत्तम आख्यानका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह निश्चय ही कामनाओंको सिद्ध करके अन्तमें मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकनिग्रह' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ उनसठवाँ अध्याय काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति मुनि बोले—बालरूपधारी विनायकने उस पुरुषको कैसे उत्पन्न किया था, जिसने नरान्तककी सेनाका भक्षण किया और जो नरान्तकको [विनायकके समीप] ले आया था। यह बात मुझे स्पष्ट रूपसे बतलाइये, इस विषयमें मुझे अत्यधिक सन्देह हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—जो परब्रह्म गुणोंसे परे है, वही ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक विनायकके रूपमें सगुण-साकार होकर भास रहा है। वे विनायकदेव पृथ्वीका भार हरने, दुष्टोंका विनाश करने और स्वधर्म अर्थात् वेदानुमोदित धर्ममर्यादाके रक्षणके लिये अनन्तानन्त रूपोंको धारण करते हैं ॥ २-३ १/२ ॥ वे ही अपनी शक्तिसे विश्वकी रचना करते हैं, पालन करते हैं और संहार करते हैं। वे [यद्यपि स्वतन्त्र हैं, तथापि] लोक [-व्यवहारकी सिद्धि]-के लिये [उत्पत्ति- विनाशादिकी] निमित्तभूता पराशक्ति नियतिका अनुवर्तन करते हैं। इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि वे विभु अनेकानेक मायाओंके आश्रय हैं ॥ ४-५ ॥ उनकी ही इच्छासे इस जगत्की सर्वविध प्रवृत्तियाँ होती हैं। अब मैं उनकी मायाका तुमसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा ॥ ६ ॥ नरान्तकके द्वारा बन्दी बनाये गये मन्त्रिपुत्र और काशिराज जबतक राजधानी पहुँचते, उतने समयतक वह कालपुरुष दैत्यराजके द्वारा संरक्षित उस सेनाका भक्षण करता रहा। तदुपरान्त जब विनायकने उस कालपुरुषको