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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 656 में से

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पृष्ठ 409

क्री०ख०-अ०५६ ] * नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान * ४०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् विद्युत्-रूप धारणकर हम दोनों बालकको मारनेकी इच्छासे उसके पास गये तो उस बलिष्ठने अपने हाथोंसे हमें पकड़ लिया। फिर सारी कार्ययोजनाको पूछकर उस दयालुने हमें छोड़ दिया। उसको सारा वृत्तान्त बताकर हमलोग स्वामी (आप)-के समीप उपस्थित हुए हैं॥ २१-२२॥ एक बार उस नगरमें सभी लोगोंने अकेले विनायकको भोजनके लिये [एक ही साथ] निमन्त्रित किया और उसी समय निर्धन शुक्लने भी निमन्त्रण दिया। तब सर्वप्रथम उन विभुने द्रवीभूत वह भात तेल मिलाकर खा लिया और फिर वे अनन्त स्वरूप बनाकर सबके घरोंमें भोजन करने गये ॥ २३-२४॥ वे प्रत्येक घरमें काशिराजके साथ भोजन करते रहे, परंतु मोहवश काशिराज उनकी लीलाको समझ नहीं सके। हे स्वामिन्! इस प्रकारकी सामर्थ्य तो न कहीं देखी गयी है और न सुनी ही गयी है। अतः इस समय जो आपके लिये हितकर हो, उसीको भलीभाँति सम्पन्न किया जाय। हमको तो यही जान पड़ता है कि विनायकको जीतनेवाला [कोई] पुरुष तीनों लोकोंमें है ही नहीं ॥ २५-२६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन दोनोंकी ऐसी बातें सुनकर नरान्तक [क्रोधके कारण] जलने लगा। संसारको मानो खा जानेके लिये फैलाये हुए अपने मुखसे वह आग उगलने लगा और भयानक भृकुटिको टेढ़ी करके नरान्तक बोला—बन्दर कितना ही उछल-कूद करता हो, पर वह सिंहका कभी अनिष्ट नहीं कर पाता। अजगरमें निगलनेकी शक्ति तो होती है, परंतु वह भूमिको नहीं निगल सकता ॥ २७-२९॥ हमें तो आपकी बातें सुनकर मनमें आश्चर्य-सा हो रहा है। जुगनू तभीतक चमकता है, जबतक कि चन्द्रमा नहीं दीखता और चन्द्रमा भी तभीतक प्रकाशित होता है, जबतक सूर्य नहीं दृष्टिगत होता। सूर्यका तेज भी तभीतक ही है, जबतक कि राहु नहीं दीख पड़ता ॥ ३०-३१॥ [वैसे ही] यह बालक भी तभीतक महान् है, जबतक कालरूप मुझको वह नहीं देख लेता। अब तुम

[दायाँ स्तम्भ] लोग काशिराजके साथ उस बालकको मरा हुआ ही जानो। वह वहीं जानेवाला है, जहाँ उसके द्वारा मारे गये दैत्य गये हैं॥ ३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशाओंको गुँजाते हुए गरजने लगा॥ ३३॥ नरान्तकके गर्जनकी ध्वनिसे पूरित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसके बाद उसने सभी वीरोंको आज्ञा दी कि 'तैयार हो जाओ। कवच धारण करके [मैं स्वयं भी] काशिराजकी नगरी जा रहा हूँ।' उसके इस प्रकार कहते ही [लड़नेके लिये] तैयार सेना आ गयी ॥ ३४-३५॥ वह चतुरंगिणी सेना अत्यन्त भीषण, ध्वजोंसे समन्वित तथा [शत्रुओंका] सर्वविध [पराक्रम] शमन करनेवाली थी। उस समय सेनाके [प्रयाणसे उठी हुई] धूलसे सारा दिग्-दिगन्त आच्छादित-सा हो गया ॥ ३६॥ सूर्यके [धूलसे] ढँक जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। सिन्दूर लगानेसे रक्ताभ ललाटवाले, संख्यातीत पैदल सैनिक उछल-उछलकर दौड़ते हुए युद्धाभ्यास कर रहे थे। खुले हुए बालोंवाले कुछ दूसरे सैनिक हाथोंमें खड्ग तथा भुशुण्डी लिये हुए थे। [विनायकके हाथों] मारे गये दैत्योंका प्रिय करनेकी इच्छावाले कुछ दैत्य हाथोंमें भिन्दिपाल तथा मुसल लिये थे। कुछ सैनिक हाथोंमें ढाल, शिलाखण्ड, वृक्ष, खट्वांग, शक्ति तथा पाश लिये हुए [चल रहे] थे॥ ३७-३९ १/२ ॥ [पैदल सैनिकोंके पीछे-पीछे] उस समय घण्टा- ध्वनिसे शोभायमान गजसेना चल रही थी। [हाथियोंका वह समूह] सिन्दूरसे अरुणिम गण्डस्थलवाला तथा दाँतों और झूल आदिके आवरणसे युक्त होनेके कारण शोभायमान था। वह चलता हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो भाँति-भाँतिकी धातुओं (गेरू, शिलाजतु आदि)-से समन्वित पर्वतोंका समूह जा रहा हो ॥ ४०-४१॥ चिंग्घाड़ते और अपने दाँतोंको बजाते हुए वे हाथी मानो पहाड़ोंको छिन्न-भिन्न-सा करना चाह रहे थे। यदि [उनको नियन्त्रित करनेवाले] महावत न रहते तो वे सबका विध्वंस ही कर डालते। उस समय