भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 656 में से

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पृष्ठ 408

४०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 छप्पनवाँ अध्याय नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त वे दोनों दूत रौद्रपुर | नामक असुर बालकको मारनेके लिये खड़े थे, बालकने नामक नगरमें स्थित नरान्तकके सभाभवनमें जा पहुँचे। | उन दोनोंको [वहाँ] भूतलपर पीस डाला॥ १०॥ वह मनोहर सभाभवन मणि-मुक्ता आदिसे विभूषित और | तदुपरान्त विशाल हाथीका रूप धारण करके हजारों स्तम्भोंसे शोभायमान था। उसकी लम्बाई-चौड़ाई | कुण्डिन्य (कुण्ड) नामक असुर वहाँ रास्ता रोककर खड़ा सौ-सौ योजनकी थी। उस नाना आश्चर्योंसे परिपूर्ण | हो गया तो उस बलशाली कुमारने कुण्डासुरका गण्डस्थल रमणीक सभाभवनमें अनेक शूर-वीर बैठे थे॥ १-२॥ | विदीर्णकर उसे क्षणभरमें मार डाला॥ ११ १/२ ॥ वहाँ विविध प्रकारकी मणियोंसे जटित सुन्दर | इसके बाद [विनायकको] मारनेके लिये जृम्भिणी आसनपर वह नरान्तक बैठा था और उसीके समीप उत्तम | (नामक राक्षसी) धर्मदत्तके घर पहुँची, वहाँ (स्थित) आसनोंपर उसके दो मन्त्री बैठे थे। जो कि बलवानोंमें | विनायकने उसके सिरपर नारियलसे प्रहार किया, तो वह श्रेष्ठ और [शरीरकी विशालताके कारण] गगनचुम्बी | भी मर गयी। फिर ज्वालासुर, व्याघ्रतुण्डासुर और तीसरा मस्तकोंवाले थे। तभी वे शूर और चपल नामक दूत | विदारणासुर—ये तीनों बालकको मारनेके लिये आये। नरान्तक [-के निकट गये और उस]-को प्रणामकर | तब पहले असुर ज्वालने उस पुरीको जलाना आरम्भ [उसके] बहुत-से गुणोंका वर्णन करने लगे॥ ३-४॥ | किया और तीसरा असुर विदारण वायुरूप धारणकर दूतोंने कहा—[हे महाराज!] दूतको चाहिये कि | ज्वालासुरकी सहायता करने लगा॥ १२-१४॥ वह जो कुछ भी अच्छा-बुरा विवरण हो, उसे बतलाये, | [उन तीनोंमें दूसरा जो] व्याघ्रतुण्ड था, वह सभी ऐसा न करनेपर वह अपराधी होता है और उसे स्वामीके | प्राणियोंका भक्षण करनेको उद्यत था। तब अनन्त दारुण कोपका भाजन बनना पड़ता है। दूतकी बातको | मायाओंवाले उस बालकने तीनोंको मार डाला॥ १५॥ सुनकर स्वामीको विचारपूर्वक अपना परम हित सिद्ध | तदुपरान्त ज्योतिषीके रूपमें मेघनाद नामक असुर करना चाहिये॥ ५ १/२ ॥ | आया तो विनायकने उसको अंगूठीसे प्रहार करके मार हम लोग [आपके आदेशानुसार] विनायकका | डाला। यह बड़े आश्चर्यकी बात थी। फिर कूप और अपकार करनेके लिये उस नगरमें गये और अत्यन्त गुप्त | कन्दर नामवाले दो मायावी असुर भी बलपूर्वक मारे रीतिसे बालक विनायक [-का वध करनेहेतु अवसर]- | गये। तत्पश्चात् बालकको मारनेके लिये अम्भ, अन्धक की प्रतीक्षा करते हुए रहने लगे॥ ६ १/२ ॥ | तथा तुंग नामक असुर आ पहुँचे। एक (अन्धक)-ने तब सर्वप्रथम विघण्ट और दन्तुर, जो बालकके | अँधेरा फैला दिया, दूसरा (अम्भ) मूसलाधार वर्षा करने रूपमें थे तथा विनायकको मारना चाह रहे थे; उन्होंने | लगा और तीसरा (तुंग) ऊँची चोटीवाला पहाड़ बनकर विनायकका आलिंगन किया तो उसने दोनोंको भस्म कर | बालकके ऊपर कूद पड़ा॥ १६-१८॥ दिया। तदुपरान्त बालकको उड़ाकर मारनेके उद्देश्यसे | तब विशाल पक्षीका रूप धारण करके [उस पतंग और विधूल वायुरूप धारणकर जा पहुँचे, तो | विनायकने] तीनोंको ही बहुत दूर फेंक दिया। फिर उन विनायकने उनका मस्तक फोड़कर वध कर दिया। तब | असुरोंका बदला लेनेके लिये भ्रमरा नामकी एक राक्षसी शिलाके रूपमें प्रबलासुर आया तो विनायकने उसके | सुन्दर युवतीके रूपमें आयी। वह बालकको खाना सैकड़ों टुकड़े कर डाले॥ ७-९॥ | चाहती थी। तब उस विघ्नराजने राक्षसीके वक्षपर आरूढ़ मार्गमें गधेका रूप धारणकर काम और क्रोध | होकर उसके प्राण हर लिये॥ १९-२०॥