भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 656 में से

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पृष्ठ 407

क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करना चाहिये' ॥ २९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इसके बाद (-का एक अन्य वृत्तान्त है।) नरान्तकके द्वारा प्रेरित शूर तथा चपल नामक दूत उस नगरमें बहुत समयसे छिपकर रह रहे थे। जिनके प्रचण्ड गर्जनसे तीनों लोक पीपलके पत्तेके समान काँप उठते थे और जिनके सिर हिला देनेमात्रसे इन्द्रसहित सभी देवगण काँपने लगते थे। बल, पराक्रम और गर्जनमें जिनकी बराबरी करनेवाला त्रिलोकीमें कोई भी नहीं था ॥ ३०-३१ १/२ ॥ [पालकीमें बैठे विनायकदेवको देखकर] वे दोनों परस्पर कहने लगे कि डोलीमें बैठा हुआ यह मुनिकुमार तो मार डालनेयोग्य है; क्योंकि इसने पूर्वमें आये हुए बलशाली दैत्योंका वध किया है। हमें उनका बदला लेना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥ [ऐसा निश्चय करके उन दैत्योंने] विद्युत्-रूप धारण किया और उच्च स्वरसे गरजने लगे। उनके तेजके कारण [पालकीकी रक्षामें नियुक्त] सैनिकोंके नेत्र चौंधिया- से गये और वे अत्यन्त व्याकुल होकर 'यह क्या, यह क्या' इस प्रकार चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ३४ १/२ ॥ इसी बीचमें वे दोनों दैत्य पालकीके समीप आ पहुँचे। [उन्हें देखकर] पालकी ढोनेवाले [भयवश] उन विनायकको छोड़कर भाग निकले। तब उन बलवान् दैत्योंको विनायकने बलपूर्वक अपने हाथोंसे पकड़ लिया और धरतीपरसे उन्हें उखाड़ फेंकनेके लिये वे बलपूर्वक दोनोंको घुमाने लगे, फिर सहसा करुणावश दैत्योंको पुनः भूतलपर खड़ा कर दिया ॥ ३५-३७ ॥ [विनायकदेवने उनसे कहा कि] मनुष्यको उसीका वध करना चाहिये, जो अपनेसे अधिक पराक्रमी हो। मच्छरको मार डालनेसे व्यक्तिका कौन-सा पौरुष प्रकट होगा? ॥ ३८ ॥ तदुपरान्त विनायकने दैत्योंसे पूछा-'बताओ, तुम लोग किसके दूत हो ? [तुम्हें अपराधबोध नहीं होना चाहिये, क्योंकि] अपनी शक्तिभर प्रयत्न करनेसे भी [सफलता न मिलनेपर] व्यक्तिको दोष नहीं लगता' ॥ ३९ ॥ विनायककी इन बातोंको सुनकर उनके समक्ष स्थित दैत्योंने कहा कि आप दयासिन्धु कहे गये हैं, दीनपालक ! आप तो हमारे साक्षात् पिता ही हैं ॥ ४० ॥ गर्भाधान करनेवाला, उपनयन करनेवाला, विद्या देनेवाला, रक्षक और भरण-पोषण करनेवाला- इन पाँच लोगोंको तीनों लोकोंमें पिता कहा जाता है ॥ ४१ ॥ हे देव! हमलोग नरान्तकके द्वारा भेजे गये दूत हैं। हमने [अपने वास्तविक] स्वरूपको छिपा रखा है। हम तो आपका अपकार कर रहे थे, पर आपने कृपापूर्वक हमें बचा लिया ॥ ४२ ॥ हे सर्वज्ञ ! आप अतीत, वर्तमान तथा भविष्य - सबको जानते हैं। जो-जो लोग वैरवश आपके समीप आये, वे सभी क्षणभरमें आपके द्वारा मार डाले गये ॥ ४३ ॥ इसी बीच पुरवासी जन विनायकसे कहने लगे- 'देव! ये दोनों दुष्ट तो संसारको भय देनेवाले हैं, आपने इनकी क्यों रक्षा की, इनपर किया गया उपकार तो हानि ही करेगा, क्योंकि साँपको दिया गया दूध तो जहर ही बनता है' ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब विनायकदेवने पुरवासियोंसे कहा- 'मैं पहले ही इन्हें अभयदान दे चुका हूँ, अब इसके विपरीत व्यवहार कैसे किया जा सकता है ? ॥ ४६ ॥ यह कहकर विनायकने उन दोनोंको मुक्त कर दिया, तब काशिराजने कहा [हे प्रभो! आपने] असंख्य अपराधोंको क्षमा करके उन शत्रुओंको मुक्त कर दिया। [वास्तवमें कोई] प्राणी जीवित रहेगा या मृत्युको प्राप्त करेगा, इसमें आपकी इच्छा ही कारण है। यह कहकर विनायकके साथ काशिराज राजभवन आ गये ॥ ४७-४८ ॥ तदुपरान्त विनायक और काशिराजको प्रणाम करके और राजा तथा विविध रूपोंवाले विनायककी प्रशंसा करते हुए सभी लोग अपने-अपने घर चले आये ॥ ४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दूतोंकी मुक्तिका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥