श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
बार-बार यही कहता हूँ कि विनायकके बिना मैं आपके घर भोजनके लिये कैसे चल सकता हूँ?' ॥ ३५१/२ ॥ राजाने अपने घरमें कश्यपपुत्र विनायकके साथ भोजन किया और [रहस्य जाननेके अभिप्रायसे] बीचमें ही उठकर, भोजन करते विनायकको छोड़कर बाहर जब आकर देखने लगे तो उन्होंने विनायकको बाहर भी बैठा हुआ देखा ॥ ३६१/२ ॥ [राजाने देखा कि] जहाँ-तहाँ अत्यन्त विस्मित लोग इस बातकी चर्चा कर रहे थे कि 'विभु विनायकने काशिराजके साथ जाकर अनेक घरोंमें भोजन किया है!' उनकी बातें सुनकर हँसते हुए वे काशिराज लोगोंसे कहने लगे- 'मेरे बिना विनायक किस प्रकार विभिन्न घरोंमें भोजन करने चला गया?' तदुपरान्त राजाने दो- तीन घरोंमें जाकर देखा कि कश्यपपुत्र और वे स्वयं भी प्रत्येक घरमें भोजन कर रहे हैं - ॥ ३७-३९१/२ ॥ इसी बीच [एक अन्य अद्भुत वृत्तान्त काशीमें घटित हुआ-] सनक और सनन्दन ये दोनों मुनिश्रेष्ठ स्नानादिसे निवृत्त होकर भोजनार्थ भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि [सारी काशीमें] महान् उल्लास छाया हुआ है और वह सुन्दर [नगरी] विनायकमयी हो गयी है। वे जिस-जिस घरमें प्रवेश करते, उन्हें वहाँ-वहाँ विनायक ही दीखते। तब वे [आश्चर्यचकित-से होकर] बाहर आ जाते ॥ ४०-४२ ॥ उन मुनियोंने विनायकको कहीं भोजन करते हुए, कहीं भोजन किये हुए, कहीं सोते हुए, कहीं खेलते हुए, कहीं जप करते हुए, कहीं पढ़ते हुए तो कहीं पढ़ाते हुए देखा। प्रत्येक स्थानपर ऐसी ही स्थितिको देखकर वे आपसमें कहने लगे कि 'यहाँ तो भोजनके लिये कोई उपयुक्त स्थल दीखता नहीं है, अतः हमलोग शुक्लके घर चलते हैं, वही आदरपूर्वक हमारा विविध प्रकारसे आतिथ्य करेगा' ॥ ४३-४४१/२ ॥ इस प्रकारसे [आपसमें] निश्चय करके वे शुक्लके घर जा पहुँचे तो उनको वहाँ भी कश्यपपुत्र विनायक दिखायी पड़े। तब क्षुधापीड़ित वे लोग मुँह लटकाये हुए नगरसे बाहर चले गये। उन्होंने वहाँ भी भगवान् विनायकके
परम मनोहर स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा ॥ ४५-४६ ॥ यह देख उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये तो उन्हें अन्तःकरणमें विनायक दीखने लगे, जब मुनियोंने फिर आँखें खोलीं तो उनको बाहर भी विनायकके ही दर्शन हुए। उन मुनियोंने ऊपर-नीचे, मध्यमें तथा दिशाओं-विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-में विनायकको ही देखा ॥ ४७ ॥ तदुपरान्त वे मुनि नेत्र बन्दकर ध्यानमग्न हो गये और कुछ क्षणोंके बाद जब उन्होंने नेत्र खोले तो दोनों एक-दूसरेको विनायकरूपमें देखने लगे। सनकको सनन्दन और सनन्दनको सनक विनायकके रूपमें दीखने लगे। वे जिस-जिस देवताका ध्यान करते, उस-उस देवताके रूपमें उनको विनायकका ही दर्शन हुआ ॥ ४८-४९ ॥ तदुपरान्त उन मुनियोंके समक्ष सर्वव्यापक, सर्वरूप भगवान् विनायक प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उन मुनियोंने दश भुजाओंसे युक्त, सिद्धि और बुद्धिदेवीसे समन्वित, सिंहपर आरूढ़, देदीप्यमान मुकुट-कुण्डल एवं बाजूबन्द (आदि अलंकारों)-से विभूषित, दिव्य गन्ध, दिव्य माल्य, नाग, अर्धचन्द्र, कस्तूरीका तिलक और अग्निसदृश कान्तिमय वस्त्रोंको धारण किये हुए और दुष्टोंके लिये दुःसह तथा सत्पुरुषोंके लिये सौम्य, तेजस्वितासे युक्त भगवान् विनायकको देखा ॥ ५०-५२ ॥ तब निर्भ्रान्त हुए तत्त्ववेत्ता परम बुद्धिमान् मुनियोंने उन विनायकदेवको प्रणाम किया और बड़ी ही भक्तिसे हाथ जोड़कर उन पंचभूतस्वरूप विभु गणेशका स्तवन करने लगे ॥ ५३१/२ ॥ वे बोले-जो परब्रह्म नित्य, अद्वैत, अद्वय, सनातन, चराचरात्मा एवं सर्वरूप है और जिसके [एक-एक] रोममें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड भ्रमण करते रहते हैं। उपनिषद्वाक्य भी जिसका प्रतिपादन कर पानेमें समर्थ नहीं होते, उसका स्तवन करना कैसे सम्भव हो सकता है? हे देव! आपने हमारी मनोकामना जानकर उसे पूर्ण कर दिया ॥ ५४-५६ ॥ बालरूपको धारण करनेवाले आपकी महिमाको हम समझ नहीं सके, आपने पृथ्वीके भारका हरण