भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 656 में से

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पृष्ठ 405

क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०३ करनेके लिये इस उत्तम कश्यपात्मजरूपको अंगीकार किया है॥ ५७॥ ब्रह्माजी बोले-उन मुनियोंके स्तवन करते- करते उनके समक्ष [आविर्भूत हुआ] वह रूप अन्तर्धान हो गया। उन निर्भ्रान्त मुनियोंने जब स्वरूपको अन्तर्हित जाना तो एक विशाल प्रासाद बनवाकर भगवान् विनायककी एक सुन्दर मूर्ति, जैसी कि उन्होंने देखी थी, उस प्रासादमें वेदघोष तथा मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ शुभ मुहूर्तमें स्थापित कर दी और उसका नाम 'वरदविनायक' रखा। वहींपर उन मुनियोंने एक उत्तम सरोवरका भी निर्माण कराया, जो गणेशतीर्थके नामसे विख्यात हुआ ॥ ५८-६०१/२॥ इस तीर्थमें स्नान, दान और उन गणपतिदेवका पूजन करनेसे मनुष्य अपने पूर्वकृत पापोंसे मुक्त होकर समस्त मनोवांछितोंको प्राप्त कर लेता है। [वरद- विनायककी स्थापना होनेके बाद] वहाँ मुनिगण तथा दिक्पालोंसहित सभी देवगण उपस्थित हुए और समर्चित हुए विनायकदेवका दर्शन, स्तवन तथा वन्दन करके पुनः लौट गये। इस प्रकार बालरूप विनायकके प्रभावकी परीक्षा करनेके लिये आये हुए सनक और सनन्दन उनके प्रभावको देखकर सन्तोषपूर्वक अपने परमलोकको चले गये ॥ ६१-६३१/२॥ जो इन बालरूप विनायकके इस मंगलमय चरित्रका भक्ति-भावसे श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह देहावसानके बाद ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। [इस अरिष्टनाशक चरित्रका पाठ-श्रवण करनेसे] बालग्रहजनित पीड़ा नहीं होती और सर्वत्र विजयकी प्राप्ति होती है ॥ ६४-६५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'काशीमें वरदविनायकमूर्तिकी स्थापनाका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥ पचपनवाँ अध्याय भगवान् विनायकका अपने भक्त ब्राह्मण शुक्लको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना ब्रह्माजी बोले-उन (सनक और सनन्दन)-के चले जानेके अनन्तर जब काशिराजने विनायकको नहीं देखा तो उन नृपश्रेष्ठको बड़ा मोह हुआ। [उसी दशामें] वे अश्वारूढ़ हो घर-घर भटकने लगे और कहने लगे विनायक कहाँ भोजन करने गया है, वह मुझे छोड़कर अकेला ही मिठाई खाने क्यों चला गया ? ॥ १-२ ॥ वे घर-घर जाकर पूछने लगे कि विनायक कहाँ चला गया, अभी-अभी तो भोजन करके वह बाहर आया था और खेलना चाह रहा था। तब [पुरवासियोंने उनसे कहा कि] आप व्यर्थमें क्यों पूछ रहे हैं? वह तो आपके ही साथ था। सभी नागरिकोंके द्वारा ऐसा उत्तर दिये जानेपर वे वैसे ही विह्वल हो उठे, जैसे परिवारवाला निर्धन गृहस्थ ॥ ३-४१/२॥ [तभी राजासे] कुछ लोगोंने कहा कि वह विनायक तो शुक्लके घरमें खेल रहा है। तब राजा प्रसन्नतापूर्वक शुक्लके घर जा पहुँचे, वहाँ उन्होंने बालरूपधारी विभु विनायकको उसके घरके आँगनमें वृषभपर आरूढ़ देखा ॥ ५-६॥ दूसरे शिवके समान प्रतीत होनेवाले वृषभारूढ़ उन विनायकको देखकर राजाने बड़े ही भक्तिभावसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहने लगे- ॥ ७॥ राजा बोले- [यह उचित ही कहा गया है कि] बालकमें न साधुता होती है और न ज्ञान अथवा स्नेह ही होता है। मुझे छोड़कर [अकेले-अकेले] तुमने विविध प्रकारके मिष्टान्न क्यों खाये ? ॥ ८॥ ब्रह्माजी बोले-राजाकी इस बातको सुनकर विनायक कहने लगे- [हे राजन्!] जहाँ-जहाँ मैंने भोजन किया, वहाँ-वहाँ तुमने भी भोजन किया है। हे