भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 420

४१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- फोड़ती उसके पिताके दरवाजेपर। [भुजाओंको काट देनेके बाद] विनायकने दैत्यके दो और भुजाएँ देखीं। फिर वह दैत्य मुँहको फैलाये हुए कालकी भाँति [उनकी ओर] दौड़ा। उसने हाथों और पैरोंसे बहुत सारे वृक्ष विनायकपर फेंके और बादमें तो वह घनघोर वृक्षवर्षा ही करने लगा ॥ ५१-५३ ॥ उस समय सघन अन्धकार छा गया, जिसके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था। तब दैत्यराजकी ऐसी शक्ति देख विनायक उससे कहने लगे ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विनायक और नरान्तकके युद्धका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ इकसठवाँ अध्याय भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध विनायक बोले- [अहो दैत्य!] मैंने इससे पहले इतना बलवान् योद्धा नहीं देखा, तुम तो परम पराक्रमी हो। इस समय मुझ बालकके पराक्रमपूर्ण युद्धव्यापारका अवलोकन करो ॥ १ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने तरकससे एक बाण निकाला और कानतक धनुष खींचकर उस बाणको नरान्तकपर छोड़ दिया। वह बाण आकाशमण्डलको उद्भासित, [ब्रह्माण्डको] कम्पित तथा [पृथ्वीके] वृक्षोंको गिराता हुआ वैसे ही नरान्तकके पास आ पहुँचा, जैसे [ग्रहणकालमें] सूर्य-चन्द्रमाके निकट [राहु] जा पहुँचता है ॥ २-३ ॥ उस बाणने नरान्तकके पैरोंको काट दिया, जिससे वह गिर पड़ा। जब कटे हुए आधे शरीरवाला नरान्तक गिरा तो विनायक गरजने लगे। नरान्तकके पैर आकाशमार्गसे जाते और बहुत सारे लोगोंको कुचलते हुए देवान्तकके विशाल भवनमें जा गिरे ॥ ४-५ ॥ आधे शरीरवाला वह दैत्यराज भयानक रूपसे मुख फैलाकर बलपूर्वक विनायककी ओर दौड़ा। वह ऐसा प्रतीत होता था, मानो तीनों लोकोंको ही निगल लेगा। तदुपरान्त मायाके प्रभावसे दैत्यराजके चरण पूर्ववत् हो गये और तब वह विनायकके निकट आकर कहने लगा - ॥ ६-७ ॥ तुमने मेरे शरीर (हाथ-पैर)-को काटकर जैसा पुरुषार्थ दिखलाया है, मैं भी वैसे ही तुम्हारे अंगोंको काटने जा रहा हूँ, अब तुम मेरा पुरुषार्थ देखो ॥ ८ ॥ उसकी बात सुनकर उन विनायकने फिर गर्जना की और दैत्यराजपर वे प्रचण्ड बाणवर्षा करने लगे ॥ ९ ॥ महाबली दैत्यराज उन असंख्य बाणोंको भी निगल गया तो विनायकने एक विशाल बाणको अभिमन्त्रित किया तथा कानतक [धनुषकी] प्रत्यंचाको खींचकर अग्निसे युक्त अग्रभागवाले, सोनेके पंखोंवाले और गरजते हुए उस भयानक बाणको दैत्यके मस्तकको लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण वृक्षोंको गिराता, पक्षियोंको मारता और पर्वतोंको विदीर्ण-सा करता हुआ वायुवेगसे चल पड़ा ॥ १०-१२॥ उसके घोषको सुनकर सेना दसों दिशाओंमें पलायित हो गयी। वह दैत्यके कण्ठमें वैसे ही गिरा, जैसे पर्वतशिखरपर वज्र गिरता है। उसके आघातसे नरान्तकका भयानक मस्तक [कटकर] पक्षीकी भाँति आकाशमें उड़-सा गया और चीत्कार करता हुआ उसके पिताके घरमें जा गिरा ॥ १३-१४॥ इसके पश्चात् नरान्तकके [कबन्धमें] पहलेके सिरकी भाँति एक अन्य सिर उत्पन्न हो गया और ऐसा प्रतीत होता था कि सिर कभी कटा ही नहीं। तदुपरान्त दैत्यराजने भी क्रोधपूर्वक उच्च स्वरसे गर्जना की। उससे पक्षिगण, सभी मनुष्य और देवता भयभीत हो उठे ॥ १५ १/२ ॥ नरान्तक पुनः विनायकपर पर्वतोंकी भयानक वर्षा करने लगा, किन्तु विनायकने बड़ी सहजतासे बाणवर्षा करके उस समस्त पर्वत-वर्षाको मध्यमें ही निरस्त कर दिया। पर्वतों और बाणोंका यह अभिनव संग्राम एक दिन-रात चलता रहा ॥ १६-१७॥