भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 656 में से

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पृष्ठ 421

क्री०ख०-अ०६१ ] * भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध * ४१९

[इस युद्धके कारण लीलावश] वे विनायक थकानका अनुभव करने लगे और वह महाबली दैत्य भी थक गया। विनायकदेव अत्यधिक चिन्तित हो उठे और [अमर्षजन्य] तेजसे जलने लगे ॥ १८ ॥ तदुपरान्त उन बलीने ज्वालावलीसे समन्वित परशु उठा लिया और जब वे [भुजारूपी तराजूपर मानो] तौलने लगे तो धरती काँप उठी। तब देवगण विमानोंमें आरूढ़ होकर युद्ध देखने आ पहुँचे और रसातलमें शेषनाग भयभीत होकर काँपने लगे ॥ १९-२० ॥ विनायकने दैत्यराजपर वह परशु छोड़ दिया और उसने तत्काल नरान्तकका मस्तक काट डाला। [सिरके कटते ही] फिरसे मुकुट-कुण्डलादिसे युक्त एक अन्य सुन्दर सिर उत्पन्न हो गया। क्रुद्ध हुए विनायकने उसे पुनः काट डाला। उसके कटते ही फिरसे सिर उत्पन्न हो गया। वे बार-बार मस्तक काटते रहे और नरान्तकके बार-बार मस्तक उत्पन्न होते रहे। इस प्रकार उन विभुने सैकड़ों-हजारों मस्तक काट डाले। [जब सिरोंके उत्पन्न होनेका क्रम नहीं रुका तो] फिर उन्होंने दैत्यकी मृत्युके कारण अर्थात् उपायका अनुसन्धान किया ॥ २१-२३ ॥ [उपाय ज्ञात होते ही] उन्होंने शिवके वरदानसे गर्वित बलशाली उस नरान्तकको सहसा मायासे मोहित कर लिया। तब वह दैत्य अपने और परायेको जान पानेमें असमर्थ हो गया। क्षणभरमें उसे [दिनमें] रात्रि जान पड़ने लगी और दूसरे ही क्षण [रात्रिमें] वह दिन समझने लगा ॥ २४-२५ ॥ वह क्षणभरमें कभी स्वर्ग, कभी पृथ्वीतल और कभी पाताल देखने लगा। उसे क्षण-क्षणमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया (ब्रह्मीभूत पुरुषोंकी सहजावस्था) दशाओंका आभास होने लगा ॥ २६ ॥ वह विनायकदेवको देखकर भ्रमवश निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वे देवता हैं, या मनुष्य हैं, नर हैं या नारी हैं अथवा गुह्यक, सिद्ध, यक्ष या राक्षस हैं। वे अपने हैं या पराये हैं। पिता हैं या माता हैं, सजीव हैं अथवा निर्जीव हैं ॥ २७-२८ ॥ वह गहन चिन्तामें डूब गया और मनमें सोचने लगा कि त्रिशूलधारी शंकरने मुझे कुछ ऐसा ही वर प्रदान किया था [कि जब तुम्हें भ्रमवश विविध विकल्प प्रतीत होने लगें तो समझना कि अब मृत्यु आ चुकी है।] और वह समय उपस्थित है, अतः अब मेरी अवश्य ही मृत्यु हो जायगी ॥ २९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे नरान्तक सोच ही रहा था कि तबतक उसने अपने समक्ष विराट्‌रूपधारी विनायकको देखा। उनका मस्तक ऊपर आकाशको छू रहा था, चरण पातालतक फैले थे, दिशाएँ ही कान थीं और वृक्ष ही उनके रोंये थे। रोमकूपोंमें ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे थे और समुद्र ही उनके स्वेदबिन्दु थे। उनके नखके अग्रभागमें तैंतीस कोटि देवगण विराजमान थे और उनके उदरके एक भागमें चौदह भुवन अवस्थित थे ॥ ३०-३२१/२ ॥ तदुपरान्त [विराड्रूपधारी उन] विनायकने अपने चरणांगुष्ठके नखके अग्रभागसे तत्काल ही दैत्यको वैसे ही मसल दिया, जैसे खटमलको कोई बालक मसल दे। तब अत्यन्त हर्षित देवताओं और मुनियोंने बारम्बार जयघोष करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया और फूल बरसाये ॥ ३३-३४१/२ ॥ जब उन विभुने अपने विराड्रूपको छिपा लिया तो उसके अनन्तर पृथ्वीदेवी उन देवेश्वरके समीप आयीं और प्रणामकर बोलीं- '[आपने] मेरा आधा भार तो दूर कर दिया है। जब समग्र भार नष्ट हो जायगा तो मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी। इसलिये आगे भी [आप मेरा भारहरण] करते रहें' ॥ ३५-३६ ॥ जब [ऐसा कहकर] पृथ्वीदेवी अन्तर्धान हो गयीं तो इसके अनन्तर विनयावनत काशिराजने विनायकदेवकी पूजा की और प्रसन्न मनसे कहने लगे- 'हे विभो ! मैंने अतिशय आश्चर्यजनक [आपके लीलाविलासका] दर्शन किया है, जो न वाणीसे कहा जा सकता है और न ही जिसे मनसे जाना जा सकता है। पृथिवीका भार हरण करनेके लिये आप अवतीर्ण हुए और आपने वह सम्पन्न भी किया है ॥ ३७-३८ ॥ तैंतीस कोटि देवताओंसे भी जो न मारा जा सका,