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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०६१ ] * भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध * ४१९

[इस युद्धके कारण लीलावश] वे विनायक थकानका अनुभव करने लगे और वह महाबली दैत्य भी थक गया। विनायकदेव अत्यधिक चिन्तित हो उठे और [अमर्षजन्य] तेजसे जलने लगे ॥ १८ ॥ तदुपरान्त उन बलीने ज्वालावलीसे समन्वित परशु उठा लिया और जब वे [भुजारूपी तराजूपर मानो] तौलने लगे तो धरती काँप उठी। तब देवगण विमानोंमें आरूढ़ होकर युद्ध देखने आ पहुँचे और रसातलमें शेषनाग भयभीत होकर काँपने लगे ॥ १९-२० ॥ विनायकने दैत्यराजपर वह परशु छोड़ दिया और उसने तत्काल नरान्तकका मस्तक काट डाला। [सिरके कटते ही] फिरसे मुकुट-कुण्डलादिसे युक्त एक अन्य सुन्दर सिर उत्पन्न हो गया। क्रुद्ध हुए विनायकने उसे पुनः काट डाला। उसके कटते ही फिरसे सिर उत्पन्न हो गया। वे बार-बार मस्तक काटते रहे और नरान्तकके बार-बार मस्तक उत्पन्न होते रहे। इस प्रकार उन विभुने सैकड़ों-हजारों मस्तक काट डाले। [जब सिरोंके उत्पन्न होनेका क्रम नहीं रुका तो] फिर उन्होंने दैत्यकी मृत्युके कारण अर्थात् उपायका अनुसन्धान किया ॥ २१-२३ ॥ [उपाय ज्ञात होते ही] उन्होंने शिवके वरदानसे गर्वित बलशाली उस नरान्तकको सहसा मायासे मोहित कर लिया। तब वह दैत्य अपने और परायेको जान पानेमें असमर्थ हो गया। क्षणभरमें उसे [दिनमें] रात्रि जान पड़ने लगी और दूसरे ही क्षण [रात्रिमें] वह दिन समझने लगा ॥ २४-२५ ॥ वह क्षणभरमें कभी स्वर्ग, कभी पृथ्वीतल और कभी पाताल देखने लगा। उसे क्षण-क्षणमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया (ब्रह्मीभूत पुरुषोंकी सहजावस्था) दशाओंका आभास होने लगा ॥ २६ ॥ वह विनायकदेवको देखकर भ्रमवश निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वे देवता हैं, या मनुष्य हैं, नर हैं या नारी हैं अथवा गुह्यक, सिद्ध, यक्ष या राक्षस हैं। वे अपने हैं या पराये हैं। पिता हैं या माता हैं, सजीव हैं अथवा निर्जीव हैं ॥ २७-२८ ॥ वह गहन चिन्तामें डूब गया और मनमें सोचने लगा कि त्रिशूलधारी शंकरने मुझे कुछ ऐसा ही वर प्रदान किया था [कि जब तुम्हें भ्रमवश विविध विकल्प प्रतीत होने लगें तो समझना कि अब मृत्यु आ चुकी है।] और वह समय उपस्थित है, अतः अब मेरी अवश्य ही मृत्यु हो जायगी ॥ २९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे नरान्तक सोच ही रहा था कि तबतक उसने अपने समक्ष विराट्‌रूपधारी विनायकको देखा। उनका मस्तक ऊपर आकाशको छू रहा था, चरण पातालतक फैले थे, दिशाएँ ही कान थीं और वृक्ष ही उनके रोंये थे। रोमकूपोंमें ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे थे और समुद्र ही उनके स्वेदबिन्दु थे। उनके नखके अग्रभागमें तैंतीस कोटि देवगण विराजमान थे और उनके उदरके एक भागमें चौदह भुवन अवस्थित थे ॥ ३०-३२१/२ ॥ तदुपरान्त [विराड्रूपधारी उन] विनायकने अपने चरणांगुष्ठके नखके अग्रभागसे तत्काल ही दैत्यको वैसे ही मसल दिया, जैसे खटमलको कोई बालक मसल दे। तब अत्यन्त हर्षित देवताओं और मुनियोंने बारम्बार जयघोष करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया और फूल बरसाये ॥ ३३-३४१/२ ॥ जब उन विभुने अपने विराड्रूपको छिपा लिया तो उसके अनन्तर पृथ्वीदेवी उन देवेश्वरके समीप आयीं और प्रणामकर बोलीं- '[आपने] मेरा आधा भार तो दूर कर दिया है। जब समग्र भार नष्ट हो जायगा तो मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी। इसलिये आगे भी [आप मेरा भारहरण] करते रहें' ॥ ३५-३६ ॥ जब [ऐसा कहकर] पृथ्वीदेवी अन्तर्धान हो गयीं तो इसके अनन्तर विनयावनत काशिराजने विनायकदेवकी पूजा की और प्रसन्न मनसे कहने लगे- 'हे विभो ! मैंने अतिशय आश्चर्यजनक [आपके लीलाविलासका] दर्शन किया है, जो न वाणीसे कहा जा सकता है और न ही जिसे मनसे जाना जा सकता है। पृथिवीका भार हरण करनेके लिये आप अवतीर्ण हुए और आपने वह सम्पन्न भी किया है ॥ ३७-३८ ॥ तैंतीस कोटि देवताओंसे भी जो न मारा जा सका,

४२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

उसे आपने [अकेले ही] मार डाला। हे सुरेश्वर! हम लोगोंके पुण्य अत्यधिक थे, इसीलिये हम आपके विराट् स्वरूपको देख सके' ॥ ३९ ॥ ब्रह्माजी बोले—जब काशिराज इस प्रकार कह रहे थे, तभी पुरवासी भी कहने लगे—'हे विभो! आप धन्य हैं। अहो! आप बालकका रूप धारण करके हम सभीको भ्रमित करते रहे। आपने अपनी कीर्तिका विस्तार करनेके लिये ये सभी कृत्य किये हैं।' [ऐसा कहकर] पुरवासियोंने परमभक्तिसे उन विभुका पूजन किया और


[दायाँ स्तम्भ]

इस प्रकार प्रार्थना करने लगे— ॥ ४०-४१ ॥ 'हे देव! हमें आप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये और कभी भी आपका हमसे वियोग न हो—ऐसा कीजिये।' तदुपरान्त उन नागरिकों और काशिराजने ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान किये और उनसे प्रार्थना की कि ऐसे ही हमारी विजय होती रहे। उस समय नगरवासियोंने काशिराजको उपहार अर्पित किये और काशिराजने भी उन्हें उपहारादिसे सन्तुष्ट किया ॥ ४२-४३ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दैत्यदमन एवं विराड्दर्शन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥


बासठवाँ अध्याय

नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका

काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना


[बायाँ स्तम्भ]

ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु विप्रकी भार्या, जिसका नाम शारदा था, वह अपनी सखियोंके साथ कौतूहलपूर्वक वितर्दी (आँगनमें बने चबूतरे)-पर बैठी हुई थी ॥ १ ॥ अचानक उन सबके साथ उसने आँगनमें गिरे हुए नरान्तकके सिरको देखा, जिसके दोनों कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सिरके गिरनेसे वहाँ पर्वतशिखरके गिरनेके सदृश ध्वनि हुई, जिससे वह सम्पूर्ण नगर गूँज उठा। वह सिर उसी प्रकार श्यामल और शोभाहीन हो गया था, जैसे हिमपातसे प्रभावित कमल ॥ ३ ॥ उस आघातसे व्याकुल शारदा और रौद्रकेतु दोनों भयभीत हो गये, तदनन्तर सावधान होनेपर नरान्तकके सिरको देखकर वे दोनों अत्यन्त रुदन करने लगे ॥ ४ ॥ वे दोनों अपनी छाती पीटते हुए धरतीपर लोटने लगे और मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर एक मुहूर्तके बाद जब वे पुनः चेतनायुक्त हुए तो माता शारदा उस सिरको अपने हृदयसे लगाकर अत्यन्त शोकाकुल हो उठी। वह विह्वल होकर वैसे ही करुण क्रन्दन करने लगी, जैसे मृतवत्सा गौ क्रन्दन करती है ॥ ५-६ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

शारदा कहने लगी— [हे पुत्र!] तुम्हारा शरीर वीरोचित शोभासे परिपूर्ण रहता था, तुम सदैव युद्धके लिये उत्सुक रहते थे। [युद्धमें जाते समय] तुमने मुझसे कुछ कहा भी नहीं। अब तो कुछ बोलो ॥ ७ ॥ [हे वत्स!] तुम्हारा पूरा शरीर कहाँ गया ? तुम तो केवल सिरमात्रसे ही आये हो। तुम अकेले क्यों आये हो ? तुम्हारी महान् सेना कहाँ है ? तुम्हारे साथ जल लेकर चलनेवाले और छत्र तथा चँवर धारण करनेवाले कहाँ गये ? जिसे देखकर श्रेष्ठ सुन्दरियाँ विरहरूपी अग्निसे [संतप्त होकर] म्लान हो जाया करती थीं; तुम्हारा वह रूप अस्ताचलगामी सूर्यकी भाँति म्लान कैसे हो गया ? ॥ ८-९ १/२ ॥ मेरे द्वारा अथवा तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताद्वारा तुम्हारा क्या अपराध किया गया है ? रुदन करते हुए हम दोनोंके आँसुओंको पोंछकर तुम हमसे क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १० १/२ ॥ हे पुत्र! तुम [कभी तो] अत्यन्त मूल्यवान् बिस्तरसे युक्त पलंगपर शयन करते थे और इस समय कहाँ सो रहे हो—यह देखकर मेरा मन अत्यन्त खिन्न

क्री०ख०-अ०६२ ] * नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना * ४२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हो रहा है। तुम्हारे बिना हम दोनों किसीको मुँह दिखानेयोग्य भी नहीं रह गये हैं ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले-शारदाके शोकपूर्ण वचनोंको सुनकर रौद्रकेतु भी शोकाकुल हो उठे और कहने लगे- 'हे प्रिय पुत्र ! तुम अपने विषयमें कुछ बताये बिना कहाँ चले गये ? ॥ १३ ॥ प्रतिदिन जो होता था और जो भविष्यकी योजना होती थी-उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको तथा अपने स्थानके विषयमें हमें तुम बताया करते थे; इस समय क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १४॥ यदि तुम युद्धमें [शत्रुके] सम्मुख लड़ते हुए रक्त- धाराओंसे पवित्र होकर स्वर्गलोकको चले गये हो तो बिना मुझसे पूछे और मुझे त्यागकर क्यों चले गये ? तुम्हारा तो अपने माता-पिताके प्रति पुत्रभाव था, उसे शत्रुतामें कैसे परिणत कर दिया ? ॥ १५१/२ ॥ जब तुम सेवकके हाथसे अपने हाथमें तलवार ग्रहण करते थे, तो पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वी और स्वर्ग काँपने लगते थे; ऐसे तुमको किसने [पृथ्वीपर] गिरा दिया, कालकी इस विपरीत गतिको हम नहीं जानते ॥ १६-१७ ॥ लोकमें प्रारब्ध ही बलवान् है, पुरुषार्थ निरर्थक है। मेरे वंश और इस लोकका आभूषणरूप नरान्तक न जाने कहाँ चला गया ? जो कालके लिये भी काल, शत्रुरूपी हाथीके लिये सिंह और राजाओंरूपी रूईका दाह करनेके लिये अग्निके समान था; जिसका प्रताप सूर्यके समान था-ऐसे तुम दात्र (लकड़ी काटनेका उपकरण)-से काटे गये वृक्षकी भाँति दो खण्डोंमें कैसे विभक्त हो गये ?' ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस तरह अनेक प्रकारसे शोक करके रौद्रकेतु और शारदा नरान्तकके सिरको लेकर देवान्तकके पास गये ॥ २०१/२ ॥ उन दोनों (माता-पिता)-को उस स्थितिमें देखकर देवान्तक त्वरापूर्वक भद्रासनसे उठकर उनके गले लगकर छोटे भाईकी मृत्युपर रुदन करने लगा। तब उसके परिवारके जो काल और यमके समान [दुर्धर्ष] दैत्य थे, वे भी नरान्तकके सिरको देखकर उच्च स्वरसे विलाप करने लगे ॥ २१-२२१/२ ॥ देवान्तक माताके हाथसे नरान्तकका सिर लेकर उसे अपने हृदयसे लगाकर भ्रातृस्नेहसे दुखी होकर कुररी पक्षीके समान क्रन्दन करने लगा ॥ २३१/२ ॥ देवान्तक कहने लगा-हम दोनों साथ-साथ भोजन करते थे, एक साथ जल पीते थे, साथ-साथ खेलते थे और एक साथ सोते तथा एक साथ उठते थे। हम दोनोंने साथ-साथ तप किया, साथ-साथ जप किया, [अब] तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ २४१/२ ॥ जिस तुम्हें देखकर मनुष्य और देवता दसों दिशाओंमें पलायन कर जाते थे, वही तुम किस बलवान् दुष्टद्वारा मार डाले गये ? मैंने तो पृथ्वी और रसातलका ही राज्य तुम्हें निवेदित किया था, तो भी हे भ्रातृवत्सल (भाईके प्रति प्रेम रखनेवाले) ! तुम मुझे छोड़कर स्वर्ग कैसे चले गये ? ॥ २५-२६१/२ ॥ जिसके धनुषके टंकारकी ध्वनिसे सम्पूर्ण जड़- चेतन काँपने लगते थे, असंख्य राजागण जिसके भवनके द्वारदेशमें [किंकरोंकी भाँति] शोभा पाते थे; वही तुम माता-पिता और सुन्दर स्त्रीको छोड़कर कैसे चले गये ? ॥ २७-२८ ॥ देवान्तकका इस प्रकारका क्रन्दन श्रवणकर वीर लोग वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बलपूर्वक उसका हाथ पकड़कर तर्कोंद्वारा समझाते हुए उसे क्रन्दन करनेसे रोका ॥ २९ ॥ लोगोंने कहा-हे राजन् ! किसी वीरके युद्धमें मारे जानेपर वीर लोग शोक नहीं करते हैं, अपितु वह जिसके द्वारा मारा गया है, उसके पास जाकर उसका बलपूर्वक वध करते हैं ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके देहधारणके साथ ही उनकी मृत्यु भी प्रादुर्भूत होती है। हे राजन् ! वह मृत्यु आज हो या सौ वर्ष बाद; अपनी हो या दूसरेकी, परन्तु होगी अवश्य, इसमें सन्देह नहीं है। फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है ? ॥ ३११/२ ॥ तब वह धर्मज्ञ असुर देवान्तक उन लोगोंके

४२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके] वचन सुनकर सावधानचित्त होकर माता- पितासे बोला- 'आप दोनों शोक न करें। मैं अपने उस शत्रुको ग्रास बनानेके लिये जा रहा हूँ। बताओ, जिसने मेरे भाईको मारा है, वह कहाँ रहता है? या तो मैं उसको मारकर सुखका अनुभव करूँगा अथवा स्वयं मरकर भाईके पास चला जाऊँगा ॥ ३२-३४ ॥ हे माता ! हे पिता ! मेरी भौंहोंके टेढ़े होनेमात्रसे त्रिभुवन कम्पायमान हो जाता है, फिर मेरे क्रोधित हो जानेपर तीनों लोकोंकी रक्षा कौन कर सकता है?' ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब देवान्तककी बात सुनकर वे दोनों (शारदा और रौद्रकेतु) आश्वस्त हो गये। शोकसागरमें डूबे हुए उन दोनोंका उसके वचनोंसे उद्धार हो गया ॥ ३६ ॥ ज्येष्ठ पुत्रके पूछनेपर रौद्रकेतुने विस्तारपूर्वक सारी बात कही-काशिराज नामसे विख्यात एक परम धार्मिक राजा है। उसके घरमें विवाह-सम्बन्धी महान् उत्सवका आयोजन था। उसमें सभी लोगोंके साथ 'विनायक' नामसे विख्यात कश्यपजीका पुत्र भी आमन्त्रित था। वह बालक होते हुए भी अत्यन्त बलवान् माना जाता है। हे पुत्र ! उसने रास्तेमें ही मेरे भाई धूम्राक्षको मार डाला। उसका बदला लेनेके लिये मैंने पाँच सौ निशाचर वीरोंको भेजा था, वे सब दौड़ते हुए वहाँ गये, परंतु उस सप्त- वर्षीय मुनिपुत्र [विनायक]-द्वारा वे सभी मार डाले गये। उनका प्रतिशोध लेनेके लिये नरान्तक स्वयं गया। उसके साथ अनेक शस्त्रोंसे युक्त चतुरंगिणी सेना थी; किंतु उनमेंसे एक भी वापस नहीं लौटा। अकस्मात् यह नरान्तकका [कटा हुआ] सिर दिखायी दिया, तो हम लोग शोकाकुल होकर उसके सिरको लेकर तुम्हारे सम्मुख आये हैं ॥ ३७-४२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-रौद्रकेतुका इस प्रकारका वचन सुनकर देवान्तक [क्रोधसे] काँपने लगा, उसके नेत्र लाल हो गये। वह [अपने आसनसे] उठ खड़ा हुआ। उस समय ऐसा लगता था, मानो वह तीनों लोकोंको निगल जायगा। अहंकार और अज्ञानके वशवर्ती होकर वह अपने पितासे कहने लगा- 'मैं सबको मारनेवाले कालको भी मार डालूँगा, पृथ्वीको उलटकर अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे क्षणभरमें ब्रह्माण्डको भस्म कर डालूँगा' ॥ ४३-४५ ॥ इस प्रकार अपने क्रोधपूर्ण वचनोंसे पृथिवीको कम्पित-सा करते हुए उसने उन सभी दैत्योंको बुलाया, जो देवताओंके अधिकारोंपर प्रतिष्ठित थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर देवान्तकने माता-पिताको प्रणामकर कहा- 'अब मैं शीघ्र ही उस मुनिकुमार [विनायक]-को लाऊँगा और उसके साथ ही [नरान्तकके इस] सिरका अग्नि-संस्कार करूँगा' ॥ ४७१/२ ॥ ऐसा कहकर देवान्तक तथा उसके साथी असंख्य दैत्योंने शीघ्रगामी पक्षियोंकी भाँति बलपूर्वक उड़कर और काशिराजकी नगरीमें पहुँचकर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४८-४९ ॥ उस समय [काशीपुरीमें] महान् कोलाहल होने लगा और दिशाएँ धूलसे भर गयीं; [जिससे] सूर्यका प्रकाश भी वहाँ नहीं आ पा रहा था। [यह देखकर] पुरवासी अत्यधिक चीत्कार करने लगे ॥ ५० ॥ [वे कहने लगे-] नरान्तकको मरे तो अभी दो- तीन दिन भी नहीं हुए, तो फिर यह जनसंहारकारी प्रलय पुनः कैसे आ गया ? ॥ ५१ ॥ यह देखनेमें अत्यन्त कठिन भयंकर शरीरवाला कौन आ गया, यह तो कालको भी कवलित और तीनों लोकोंको भक्षण कर जानेमें समर्थ है ॥ ५२ ॥ इससे पहले भेजे गये दैत्यवीरोंका तो उस विनायकने वध कर डाला था, परंतु अब पुनः दैत्योंकी एक परिखा (खाईं)-सी बन गयी है, जिसके कारण अब बाहर जानेका मार्ग भी नहीं है ॥ ५३ ॥ जब पुरजन इस प्रकार कह रहे थे, तभी देवान्तकके आने (आक्रमण)-का समाचार काशिराजको बतलाने उसके दूत आ गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नगरीनिरोध' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥

तिरसठवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०६३ ] * अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध * ४२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरसठवाँ अध्याय अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध दूतोंने कहा—हे राजन्! कालको भी भयभीत | विनायकने सिद्धिसे कहा कि [इस सेनापर विजय पाना] कर देनेवाले तथा नभःस्पर्शी मस्तकवाले अनेक प्रकारके | अकेलेके लिये साध्य नहीं है, अतः इस दैत्यपर विजय असंख्य भयंकर दैत्योंसे घिरे हुए महाभयंकर दैत्य | पानेके लिये तुम मेरी आज्ञासे अनेक प्रकारकी अपनी देवान्तकने आपकी नगरीको घेर लिया है। उसे देखकर | सेनाका निर्माण करो ॥ १११/२ ॥ हम लोग घबराकर आपके पास चले आये हैं। अब | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] तब सिद्धिने आपको जो करना हो, वह करें ॥ १-२ ॥ | परमात्मा विनायकके चरणकमलोंमें नमस्कार करके ब्रह्माजी कहते हैं—[हे मुने!] दूतके मुखसे | देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया और ऐसी [नरान्तकके आक्रमणका] सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर राजा | गर्जना की, जिसकी अनुगूँज सम्पूर्ण प्राणियों और काँपने लगे। वे अत्यन्त म्लान होकर शिशुओंके मध्य | दैत्योंके लिये भयदायिनी थी ॥ १२-१३ ॥ खेल रहे बालक विनायकके पास गये और उनसे सारा | उसके उस गर्जनकी महान् ध्वनि और उसके वृत्तान्त कहा— ॥ ३१/२ ॥ | प्रत्येक शब्दकी अनेक प्रतिध्वनियोंसे पर्वत और वृक्ष- राजा बोले—लीलापूर्वक मनुष्य शरीर धारण | समूहोंसहित [पृथ्वीको धारण करनेवाले] शेषनाग तथा करनेवाले हे परमात्मन्! आपको नमस्कार है। अनेक | द्युलोक भी चलायमान हो गये ॥ १४ ॥ प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हे जड़-चेतनात्मक जगत्के | तदनन्तर सिद्धिने अष्ट सिद्धियोंका स्मरण किया, गुरु! आपको नमस्कार है। बालस्वरूप धारण किये हुए | वे सब भी वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आ गयीं। सबसे पहले आपके द्वारा हम सबकी अनेक बार रक्षा हुई है; हे प्रभो! | अणिमा [नामक सिद्धि] आयी, तदनन्तर गरिमा और इस समय भी आप हमारी इस देवान्तकसे रक्षा | उसके बाद महिमा एवं लघिमा [सिद्धियाँ] भी वहाँ कीजिये ॥ ४-५१/२ ॥ | आयीं। तत्पश्चात् प्राप्ति, प्राकाम्य और वशित्व सिद्धियाँ ब्रह्माजी कहते हैं—काशिराजद्वारा इस प्रकार | भी वहाँ आयीं। उसके बाद ईशित्व [नामक सिद्धि] प्रार्थना किये जानेपर बालक [विनायक]-ने विशाल | वहाँ आयी, तदनन्तर हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके स्वरूप बनाकर हाथमें धनुष लेकर सिद्धि-बुद्धिसहित | अनेक यूथों (समूहों)-से युक्त उनकी [विशाल] सेना सिंहपर आरूढ़ होकर गर्जना की, जिससे पर्वतोंकी | वहाँ प्रकट हो गयी ॥ १५-१७ ॥ गुफाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ६-७ ॥ | जिस प्रकार वर्षाकालमें नदियाँ सभी ओरसे [बहती अपने तेजसे सूर्यको तिरोभूत करते हुए तथा मुखसे | हुई] समुद्रमें जाती हैं, उसी प्रकार युद्धकी लालसावाली अग्निकणोंका वमन करते हुए उन्होंने अपने हाथोंमें | वह सेना दसों दिशाओंसे वहाँ आ रही थी ॥ १८ ॥ बाण, खड्ग, परशु और धनुषको धारण किया ॥ ८ ॥ | वह सेना अगणित [रण-] वाद्योंकी ध्वनि और तदनन्तर वे [बालकरूपधारी भगवान्] विनायक | वीरोंकी गर्जनासे अत्यन्त गुंजायमान हो रही थी। आकाशमार्गसे नगरके बाहर आये और उन्होंने अपने | भूमण्डलको ग्रास बना लेनेके लिये उत्सुक कालसदृश सिंहनादसे दैत्योंके मनको परिकम्पित कर दिया ॥ ९ ॥ | उन वीरोंको युद्धके लिये आया देखकर देवान्तकने अपने वहाँ उन्होंने दुर्धर्ष [दैत्य] देवान्तकको तथा उस | मनमें विचार किया कि मैं तो यह सोच करके आया था दुष्टकी सेनाको देखा। उस समय वहाँपर टिड्डियोंकी | कि क्षणमात्रमें इस बालकको पकड़ ले जाऊँगा, परंतु भाँति असंख्य दैत्य भ्रमण कर रहे थे ॥ १० ॥ | अचानक यह इस प्रकारकी सेना कहाँसे निकल आयी! उस अनेक प्रकारकी सेनाको देखकर विघ्नराज | मैं इसकी अद्भुत सामर्थ्य देख रहा हूँ। [अवश्य ही] इस

४२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बालकने मायासे यह सब किया है ॥ १९-२१ ॥ 'अब मैं या तो स्वयं मर जाऊँगा या इसे मार डालूँगा; क्योंकि जीवनका त्याग तो किया जा सकता है, परंतु यशका नहीं।' दैत्येन्द्रके इस प्रकार कहनेपर उसके सेनापतियोंने कहा- 'हम लोग सेनाके अग्रभागमें रहकर युद्ध करेंगे, आप सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करें, विजय हमारी ही होगी।' तब उनके वचनरूपी अमृतका पानकर हर्षित हुए देवान्तकने कहा- 'हे महावीरो! आप लोगोंने उचित बात कही है। [अब] आप लोग युद्धके लिये प्रस्थान करें, मैं भी आता हूँ। मेरा आशीर्वाद है कि आप सब पुण्य कर्म करनेवालोंकी विजय होगी' ॥ २२-२४ ॥ [तदनन्तर] देवान्तकसे आशीष ग्रहणकर और उसे नमस्कारकर कर्दम नामक दैत्य रथकी आकृतिवाले व्यूहका भेदन करनेके लिये गया। गरिमा [नामक सिद्धि]-के प्रधान वीरोंद्वारा निर्मित, वीरोंको मोहित करनेवाले अत्यन्त दुर्भेद्य चक्रव्यूहका भेदन करनेके लिये दीर्घदन्त [नामक दैत्य] गया ॥ २५-२६ ॥ प्रथिमाद्वारा रक्षित व्यूहका भेदन करनेके लिये तालजंघ [नामक दैत्य] प्रसन्नतापूर्वक गया। महिमाद्वारा निर्मित व्यूहके भेदनके लिये यक्ष्मा नामका दैत्य गया। प्राप्तिद्वारा विरचित व्यूहके भेदनहेतु महान् [दैत्य] घण्टासुर गया और बलशाली रक्तकेश प्राकाम्यरचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २७-२८ ॥ वशितारचित श्रेष्ठ व्यूहका भेदन करनेके लिये कालान्तक गया और दुर्जय नामक बलवान् दैत्य ईशिताद्वारा रचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २९ ॥ इन सबकी सामर्थ्यका वाणीसे वर्णन करना सम्भव नहीं है। वे आठों महाबलवान् दैत्य आठों सिद्धियोंद्वारा निर्मित [सैन्य] व्यूहोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३० ॥ [उस समय] दोनों ओरके सैनिक दूसरे पक्षको अत्यन्त दुर्जय मानते हुए परस्पर एक-दूसरेको मार रहे थे। वे इस प्रकार बाणवर्षा कर रहे थे, जैसे बादल मूसलाधार वर्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ वीरगण अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे शत्रुओंके सिर काट रहे थे। उस समय वहाँ मारे गये हाथियों, घोड़ों और वीरोंकी कटी हुई जंघाओं, घुटनों, हाथोंके कारण पृथ्वी [चलनेमें] अत्यन्त दुर्गम हो गयी थी। कुछ वीर ढालको आगे करके शत्रुओंके पैर तोड़ दे रहे थे ॥ ३२-३३ ॥ कुछ वीर उछलकर पर्वतकी भाँति शत्रुओंपर गिरकर उन्हें चूर्ण कर डालते थे। धूलसे इतना अन्धकार छा गया था कि अपने ही पक्षके सैनिक परस्पर अपनोंको नहीं जान पा रहे थे। तभी अचानक देवताओंद्वारा मारे गये बहुत-से दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े और वैसे ही दैत्योंके द्वारा मारे गये देवगण भयानक चीत्कार करते हुए गिर पड़े ॥ ३४-३५ ॥ वहाँ (उस रणभूमिमें) शिरविहीन धड़ युद्ध कर रहे थे, जिसे देखकर अप्सराएँ प्रसन्न हो रहीं थीं। शस्त्रप्रहारसे रक्तस्राव होनेके कारण वीर योद्धा पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३६ ॥ शुक्राचार्य मरे हुए दैत्योंको अपनी [संजीवनी] विद्यासे पुनः जीवित कर दे रहे थे, इससे आठों व्यूहोंके बलवान् देवसैनिक चिन्तित हो उठे। तदनन्तर शुक्राचार्यकी इस चेष्टाको उन सबने ईशितासे कहा। तब उसके क्रोधावेशित होनेपर उसके मुखसे एक कृत्या निकलकर उसके सामने आ खड़ी हुई। ईशिताने उसे आँखके संकेतसे आज्ञा दी, तब वह कृत्या भार्गव शुक्राचार्यको अपने गुह्यांगमें रखकर अन्तर्धान हो गयी और उन्हें ले जाकर बर्बरदेशमें छोड़ दिया। इसीलिये मनीषी लोग उन्हें बर्बरदेशीय कहते हैं ॥ ३७-३९१/२ ॥ तदनन्तर (शुक्राचार्यके रणक्षेत्रसे दूर चले जानेपर) देवता प्रसन्न हो गये और बलान्वित होकर (उत्साहपूर्वक) युद्ध करने लगे। तब उनके द्वारा मारे जाते हुए दितिपूत्र (दैत्यगण) भागने लगे। उनमेंसे कुछ दैत्य उनकी शरणमें चले गये और कुछ अणिमादि सिद्धियोंद्वारा प्रादुर्भूत देवताओं एवं गन्धर्वोंसे 'रक्षा करो, रक्षा करो'- ऐसा कहने लगे ॥ ४०-४११/२ ॥ उस युद्धमें कभी दैत्यगण विजयी होते थे और कभी देवताओंकी विजय होती थी। एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे वे युद्धमें संलग्न थे। तदनन्तर अस्त्र- शस्त्रोंके युद्धसे उपरत होकर उनमें भयंकर मल्लयुद्ध होने लगा ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'शुक्रत्याग' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥

चौंसठवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०६४ ] * देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय * ४२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंसठवाँ अध्याय देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय ब्रह्माजी कहते हैं— [हे मुने!] कालान्तक दैत्य | मुष्टिकाका कठोर प्रहार किया, जिससे वे भी भूमिपर और प्राकाम्यका परस्पर युद्ध हो रहा था और जब | गिर गये और सैकड़ों खण्डोंमें विभक्त होकर चूर-चूर कालान्तक प्राकाम्यपर विजय पाने ही वाला था, तभी | हो गये॥ १२-१३॥ वशित्वने वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर प्राकाम्यकी सहायता | तब वे सभी अपनी शक्तिसे विजय प्राप्त करके की और अपने हाथकी फुर्तीसे कालान्तकके मस्तकपर | गर्जना करने लगीं। 'विनायक विजयी हुए'—ऐसा वे एक पर्वत-शिखरसे प्रहार किया। उस [प्रहार]-से | सब कहने लगीं। अन्य अल्प बलवाले भी बहुतसे कालान्तक सहसा भूमिपर गिर पड़ा॥ १-२१/२॥ | दैत्य उनके द्वारा विनष्ट कर दिये गये, तब पुनः तब कालान्तकको रक्तसे लथपथ और दो भागोंमें | सभी श्रेष्ठ दैत्यवीर एकत्र होकर सिद्धिसेनाका विनाश विभाजित देखकर दैत्यसेनामें महान् हाहाकार फैल | करने लगे॥ १४-१५॥ गया। तदनन्तर मुसल नामक दैत्यपति और भल्ल नामका | उस समय दोनों सेनाओंमें मारो, मार डालो, बाँध एक अन्य असुर प्राकाम्य [नामक सिद्धि] एवं महिमा | लो, सावधान हो जाओ—इस प्रकारका महान् कोलाहल नामवाली सिद्धि—ये चारों उत्साहपूर्वक युद्धहेतु उद्यत | होने लगा। तदनन्तर शस्त्रोंके आपसमें टकरानेसे अग्नि हो गये। उस समय शस्त्रसे प्रहार करनेवाले अनेक दैत्य | उत्पन्न गयी। योद्धा शस्त्रोंके टूट जानेपर क्रोधित होकर प्राकाम्यसे युद्ध करने लगे॥ ३-५॥ | मल्लयुद्ध करने लगे॥ १६-१७॥ उस युद्धमें असंख्य देवता मरकर टूटे हुए वृक्षकी | पुनः एक-दूसरेका विनाश करनेवाला, अनियन्त्रित भाँति गिर पड़े। रक्तरूपी जलको प्रवाहित करनेवाली | और भयंकर युद्ध होने लगा। तभी सूर्य अस्त हो गये। वहाँ सहस्रों नदियाँ बहने लगीं॥ ६॥ | महान् अन्धकारसे चारों ओर सभी दिशाएँ व्याप्त हो तब ईशिता, वशिता और विभूति [नामक सिद्धियाँ] | गयीं, तब [अग्निगर्भा] दिव्य [प्रकाशमान] औषधियोंको वहाँ आ गयीं और युद्धमें उस प्राकाम्यकी सहायता करने | हाथमें ग्रहणकर वे परस्पर प्रहार करने लगे॥ १८-१९॥ लगीं। उन सिद्धियोंने उन चारों दैत्योंपर चार पर्वत | वह भयंकर युद्ध तीन दिन-रात लगातार चलता गिराये, जिससे वे चूर-चूर हो गये और उन्होंने अत्यन्त | रहा। उस समय दसों दिशाओंमें वीरोंको बहा ले दुर्लभ स्वर्गको प्राप्त किया॥ ७-८॥ | जानेवाली रक्तकी नदियाँ बहने लगीं॥ २०॥ युद्धमें अणिमाने बलपूर्वक कर्दमकी चोटी पकड़कर | वे नदियाँ ढालरूपी कछुओं, खड्गरूपी मछलियों, सहसा उसे पटक दिया, जिससे वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त | हाथीरूपी मगरमच्छों, शवरूपी काष्ठों, शिररूपी कमलों होकर चूर-चूर हो गया। उसके मुखसे रक्तका स्राव होने | और केशरूपी शैवालोंसे सुशोभित हो रही थीं। वे लगा तथा उसने भूमिपर लुढ़कते हुए प्राण त्याग दिये। | कायरोंको भय देनेवाली और वीरोंके महान् हर्षको तदनन्तर महिमा, लघिमा और गरिमाने यक्षमासुर, तालजंघ | विशेषरूपसे बढ़ानेवाली थीं॥ २११/२॥ तथा दीर्घदन्तपर वृक्षसमूहोंसे प्रहार किया॥ ९-१०१/२॥ | तब बलवान् देवताओंके सदा विजयी होनेपर तब घण्टासुर, रक्तकेश और दुर्जय नामवाले | देवान्तक चिन्ता करते हुए अपने मनमें विचार करने लगा महाबलशाली दैत्य लम्बी साँस लेते हुए अपनी सम्पूर्ण | कि मैंने अपने पराक्रमसे समस्त देवसमूहोंपर विजय प्राप्त सेनाओंके साथ आये॥ १११/२॥ | की, फिर इस बालककी जन-सामान्यको मोहित करनेवाली उन [दैत्यों]-के द्वारा अपनी सेनाको मारा जाता | तुच्छ माया मेरे समक्ष क्या है? मैं अभी अष्टसिद्धियों देखकर वशिता आदि सिद्धियोंने उनके मस्तकपर अपनी | और उनकी सम्पूर्ण सेनाका नाश कर डालूँगा और इस

४२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बालक विनायकको पकड़कर अपने भवन चला जाऊँगा ॥ २२-२४१/२ ॥ ऐसा कहकर हाथमें खड्ग लिये वह अपनी गर्जनासे दिशाओंको गुंजायमान करता हुआ तथा सम्पूर्ण शत्रुसेनाको खड्ग-प्रहारसे मारता हुआ वहाँ आया। [उस समय] देवता उसके भयसे मूर्च्छित होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंने भगवान् विनायकका स्मरण करते हुए प्राण त्याग दिये। कुछ रक्तप्रवाहिनी नदियोंमें बह गये और कुछ देवता स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २७ ॥ कुछ देवताओंने उस दैत्यको देखते ही अपने प्राण त्याग दिये। तब तितर-बितर हुई वह देवसेना दसों दिशाओंमें भाग गयी। उस दैत्यने भी हाथमें खड्ग लेकर [भागती हुई] देवसेनापर पीछेसे प्रहारकर उसे मार डाला। यह देखकर गरिमाने वृक्षोंसहित एक पर्वतको उस दैत्यके शरीरपर फेंका, [परंतु] उसने उसे अपनी तलवारसे सैकड़ों टुकड़ोंमें काट डाला ॥ २८-२९१/२ ॥ तब आठों सिद्धियोंने क्षुभित होकर उसपर बहुत-से पर्वतोंसे प्रहार किया, [परंतु] उसने अपने खड्ग-प्रहारसे कुशलतापूर्वक उन्हें शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् महिमा [नामक सिद्धि] उछलकर उसके कन्धेपर सवार हो गयी और उस दैत्यके हाथसे शीघ्र ही खड्गको छीनकर अन्तर्धान हो गयी। तदनन्तर उसने बलपूर्वक उस दैत्यके मस्तकपर उसी खड्गसे प्रहार किया, परंतु यह आश्चर्यकी बात थी कि उस प्रहारसे मस्तक तो अप्रभावित रहा, जबकि खड्ग सैकड़ों टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ! ॥ ३०-३२१/२ ॥ तब खड्गके भग्न हो जानेपर वह दैत्य (देवान्तक) बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसने एक-एक सिद्धिको बत्तीस-बत्तीस बाणोंसे मारकर व्याकुल कर दिया। तदनन्तर वे भूमिपर गिर पड़ीं। आठों सिद्धियोंके [रणभूमिमें] गिर जानेपर देवता [देवान्तकसे] युद्ध करने लगे। उधर वे सिद्धियाँ भी एक मुहूर्तमें सावधान हो गयीं और भगवान् विनायकके पास गयीं ॥ ३३-३५ ॥ तब उस [युद्ध-सम्बन्धी] सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर बुद्धिने [भगवान्] विनायकसे कहा- 'उसका विचार कैसे उचित हो सकता है, जिसके पास बुद्धि ही न हो। आपकी सिद्धियाँ पराजित हो चुकी हैं, इसलिये आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं उस दैत्यसे युद्ध करनेके लिये जाऊँगी और उसका पराक्रम देखूँगी' ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'सिद्धिसेनाकी पराजयका वर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥ पैंसठवाँ अध्याय विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना, बुद्धिद्वारा एक भयंकर शक्तिका प्राकट्य और उस शक्तिद्वारा देवान्तककी सेनाका संहार ब्रह्माजी कहते हैं- बुद्धिद्वारा कहे गये वचनको सुनकर भगवान् विनायक हर्षित होकर उससे बोले- भगवान् [विनायक ] बोले- [हे बुद्धि!] तुम जाओ, उस दैत्यसे युद्ध करो और उसे मारकर यशकी प्राप्ति करो ॥ १ ॥ ऐसा कहकर विनायकने उसे सुन्दर वस्त्र प्रदान किये। तब उसने उन देवाधिदेवको सिर झुकाकर उस दैत्य देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥ उस समय उसके द्वारा की गयी सिंहगर्जनासे तीनों लोक कम्पित हो उठे। उसके मुखसे एक श्रेष्ठ शक्ति निकली; जो जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली और संसारका भक्षण करनेके लिये उद्यत थी। वह अपने दोनों विशाल नेत्रोंसे ज्वालासमूहोंका उत्सर्जन कर रही थी ॥ ३-४॥ वह (शक्ति) दैत्यसेनाका दहन करती जा रही थी, जिससे [भयभीत] वह (दैत्यसेना) पलायन कर गयी। उस (शक्ति)-के दर्शनमात्रसे कुछ दैत्य प्राणहीन होकर गिर गये और अन्य दैत्य यह विचार करने लगे कि आज हमें कहाँ जाना चाहिये, कहाँ हम सुखसे रह सकेंगे?

क्री०ख०-अ०६५ ] * विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना * ४२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनमेंसे कुछ दैत्य कहने लगे—हे देवान्तक! दौड़ो- दौड़ो; हम मरे जा रहे हैं ॥ ५-६ ॥ इस प्रकारका कोलाहल सुनकर देवान्तक उस शक्तिके सम्मुख गया और शीघ्र ही अपने धनुषपर डोरी चढ़ाकर अपना हस्तलाघव दिखाते हुए उस शक्तिके अंगोंपर सर्पसदृश विषैले बाणोंसे प्रहार करने लगा। उसके द्वारा शक्तिकी ओर चलाये गये बाणसमूहोंसे सूर्य आच्छादित-से हो गये। तब उस शक्तिने अपने विशाल मुखको फैलाकर उन बाणोंको कमलनालकी भाँति निगल लिया ॥ ७-८ १/२ ॥ उस समय उस दैत्यके सारे तरकस खाली हो गये, परंतु उस शक्तिकी तृप्ति वैसे ही नहीं हुई, जैसे राक्षसोंकी मनुष्योंसे तृप्ति नहीं होती ॥ ९ १/२ ॥ देवान्तकको क्षीण शक्तिवाला देखकर वह शक्ति दैत्यसेनाके पास गयी। उसने उनमेंसे कुछ दैत्योंका भक्षण कर लिया और कुछ दैत्योंको अपने हाथके प्रहारसे नीचे गिरा दिया। कुछको अपने मुखमें डाल लिया और कुछको पटककर चूर्ण कर डाला ॥ १०-११ ॥ उसने असंख्य दैत्यसमूहोंका भक्षण कर लिया, उन्हें चूर-चूर कर डाला और उन्हें मार डाला। कुछ दैत्योंको अपने चरणोंके प्रहारसे चूर-चूर करती हुई वह देवान्तकके पास गयी और उससे कहा—'तुम मेरे गर्भाशयमें प्रविष्ट हो जाओ, जहाँ तुम्हारे दैत्य माताके गर्भमें स्थित [शिशु]-की भाँति शयन कर रहे हैं। जिन दैत्योंका मेरे द्वारा भक्षण कर लिया गया, वे मर गये और मेरे उदरमें जाकर पच गये हैं' ॥ १२-१३ १/२ ॥ तब मल-मूत्रकी गन्धसे व्याकुल वह देवान्तक उस शक्तिसे भयभीत होकर शीघ्र ही पलायन कर गया, [परंतु] जहाँ-जहाँ वह जाकर छिपता, वहाँ- वहाँ वह शक्ति पहुँच जाती थी। इस प्रकार वह स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकों, पातालादि अधोलोकों और दसों दिशाओंमें भ्रमण करता रहा ॥ १४-१५ ॥ तभी उस शक्तिने उसकी शिखा पकड़कर उसे अपने गर्भाशयमें रख लिया। तदनन्तर उस शक्तिके साथ बुद्धि विनायकके पास गयी ॥ १६ ॥ स्तनोंके आघातसे दोनों ओरके वृक्षोंको गिराती हुई और मदके प्रभावसे घूमती हुई आँखोंवाली उस शक्तिको आगे करके बुद्धिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया ॥ १७ ॥ जिस प्रकार बादल जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार स्वेदवर्षा करती हुई उस मन्दगामिनी विकराल शक्तिको देखकर भगवान् विनायकने उसे वहाँसे दूर हटाया। जब उसे वहाँसे हटाया गया तो वह दैत्य देवान्तक उसके गर्भाशयसे भूमिपर गिर पड़ा। उस समय वह अत्यधिक दुर्गन्धयुक्त हो गया था, अतः दूतोंने उसको बाहर निकाल दिया ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर चेतना प्राप्त करके देवान्तक स्नानकर, चुपचाप घर चला गया। उस समय वह लज्जाके कारण नीचे मुख किये, चिन्तित, उदास और अत्यन्त दुखी था। बुद्धिके द्वारा निवेदन किये जानेपर उस शक्तिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया। उसे देखकर कुछ लोग हँसने लगे, कुछ भयभीत हो गये, कुछ कान्तिहीन हो गये और कुछ गिर पड़े ॥ २०-२१ ॥ तब उस (शक्ति)-ने उन (भगवान् विनायक)-से कहा—मैंने शीघ्रतापूर्वक दैत्यवाहिनीका भक्षण कर लिया और वह पापी देवान्तक भी मेरे द्वारा [गर्भाशयमें] स्थित कर लिया गया। हे देव ! हे दयानिधे ! अब आप मेरे निवासहेतु [कोई] स्थान प्रदान करें ॥ २२ १/२ ॥ भगवान् विनायकने कहा—हे दैत्यनाशिनि ! तुम्हें धोखा देकर वह दैत्य देवान्तक अपने घर चला गया है। मैंने यह जान लिया है कि तुम्हारा पराक्रम इन्द्रादि देवताओंसे भी बढ़कर है। तुम मेरे मुखमें प्रवेश कर जाओ और वहीं विश्राम करो। मैं उस (देवान्तक)- का नियमन करूँगा, तुम्हें इस विषयमें चिन्ता करना उचित नहीं है ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—भगवान् विनायकके इस प्रकारके वचन सुनकर वह शक्ति उनके मुखको देखकर उसमें प्रवेश कर गयी और सभी लोकोंके निवास-स्थान देवाधिदेव विनायकके उदरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वैसे ही सो गयी, जैसे माताकी गोदमें शिशु सो जाता है ॥ २५-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'बुद्धिविजयवर्णन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_15_1_Front

छाछठवाँ अध्याय

४२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

छाछठवाँ अध्याय देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना और उसपर आरूढ़ हो रणक्षेत्रमें जाना तथा सिद्धियोंकी सम्पूर्ण सेनाका संहार कर डालना

ब्रह्माजी कहते हैं—शारदा और रौद्रकेतुने अपने पुत्र देवान्तकको रातमें अकेले [लौटा हुआ] देखकर उसका आलिंगनकर उससे बातें की ॥ १ ॥ उस समय वह अपना मुख ढक ले रहा था तथा लज्जासे युक्त एवं अत्यन्त विह्वल था। वह कुछ भी बोल नहीं रहा था और प्रबल वायुके झोंकेसे कम्पायमान वृक्षकी भाँति काँप रहा था ॥ २ ॥ [देवान्तकके] पिताने कहा—तुम अपने विषयमें क्यों नहीं बता रहे हो? मूककी भाँति क्यों चुप हो ? तुम्हारी अभिलषित वस्तु यदि तीनों लोकोंके लिये दुर्लभ हो, तो उसे भी मैं अपने प्रयत्नसे उपलब्ध करा दूँगा ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—पिताकी वाणीरूपा सुधाका पानकर पुत्र देवान्तकने सावधानचित्त होकर माताके निकट स्थित पितासे निःशंक होकर कहा ॥ ४ ॥ पुत्र (देवान्तक)-ने कहा—मैं आपकी आज्ञा लेकर ही विनायकसे युद्ध करने गया था। वहाँ मैंने अपने सर्पतुल्य असंख्य विषैले बाणोंसे बहुत-से देवताओंको नष्ट कर दिया और कश्यपपुत्र विनायककी सेनाको मारकर रक्तकी नदियाँ बहा दीं। तभी देवसेनाके रक्षणार्थ एक महान् कृत्या मेरे निकट आ गयी। उसका मुख गुफाके सदृश था और [ऊँचाईमें] वह आकाशका स्पर्श कर रही थी। उसके केश बड़े भयंकर थे और पातालतक व्याप्त चरणोंवाली उस कृत्याके स्तन पर्वतके समान [विशाल] थे ॥ ५-७॥ हे तात ! [मेरे द्वारा] खड्गका प्रहार किये जानेपर भी उसे तनिक भी व्यथा नहीं हुई और उसने मेरी सम्पूर्ण सेनाको अपने गुफासदृश गर्भाशयमें रख लिया ॥ ८॥ उसने मेरे सम्पूर्ण शस्त्रों और बाणसमूहोंका भक्षण कर लिया और मुझे [भी] अपने गर्भाशयमें रख विनायकदेवके पास चली गयी ॥ ९ ॥

उसके गर्भाशयकी स्निग्धताके कारण मैं वहाँसे स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा। महान् अन्धकार होनेके कारण किसीको ज्ञात न हो सका और मैं वहाँसे भागकर नदीके जलमें स्नानकर घर आ गया। हे तात ! इसीलिये मैं लज्जित और नीचे मुख किये हुए हूँ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पुत्रके इस प्रकारके वचन सुनकर रौद्रकेतुने उससे कहा—'तुम चिन्ता न करो, मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ' ॥ १११/२ ॥ तदनन्तर [शुभ] मुहूर्त देखकर उसने उसको बीजसहित अघोर महामन्त्र प्रदान किया। उसके बाद पिता रौद्रकेतुने उससे पुनः कहा—' [हे पुत्र!] शिवका ध्यानकर और उनका सम्यक् रूपसे पूजनकर उत्तम अनुष्ठान करो। जपका दशांश हवन, हवनका दशांश तर्पण और तर्पणका दशांश ब्राह्मण-भोजन कराओ। इससे शिवके प्रसन्न होनेसे हवनकुण्डसे एक अश्व निकलेगा। उस अश्वपर आरूढ़ होकर तुम युद्धके लिये जाओ तो तुम्हें निश्चय ही विजयकी प्राप्ति होगी' ॥ १२-१४१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पिताके इस प्रकारके वचनको सुनकर पुत्र देवान्तकने प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा— [हे तात !] आपने [शिवजीके मन्त्रका] सम्यक् रूपसे उपदेश दिया, अब आप [उसको सिद्ध करनेकी] विधि भी मुझे बतलाइये ॥ १५१/२ ॥ तब लोगोंको हटाकर वे दोनों घरके मध्य भागमें चले गये। वहाँ उन दोनोंने लाल रंगके वस्त्र धारण किये और लाल चन्दन लगाया। तत्पश्चात् लाल रंगके पुष्प लाकर उनसे शिवकी पूजा की ॥ १६-१७॥ इस प्रकार उन दोनोंने बहुत दिनोंतक अत्यन्त आदरपूर्वक [मन्त्रका] अनुष्ठान किया। अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर उन्होंने आदरपूर्वक कुण्डका निर्माण किया। वह कुण्ड सभी लक्षणोंसे युक्त, मेखला और योनिसे

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क्री०ख०-अ०६६ ] * देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना * ४२९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सड़सठवाँ अध्याय

४३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकका युद्ध

ब्रह्माजी कहते हैं—उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर विनायक अपने मनमें महान् आश्चर्य करने लगे। तब वे क्रोधित तथा युद्धके लिये उद्यत होकर सिंहपर सवार हुए। तदनन्तर उन्होंने अपने गर्जनसे आकाश और दिशाओंको ध्वनित करते हुए सभी लोगोंके मनको और पर्वतोंको भी कम्पायमान कर दिया॥ १-२॥ वे बड़े वेगसे देवान्तकके समीप गये। तब वह दैत्य देवान्तक उनसे हँसकर कहने लगा—॥ ३॥ दैत्य बोला—शुष्क तालुवाले हे बालक ! तुम तो अभी मक्खन खानेमें ही समर्थ हो, कैसे तुम युद्धके लिये चले आये? तुम यहाँ मत रुको, जाओ और माताका स्तनपान करो। हे बालक ! तुम तो अदिति [-के गर्भ]- से कश्यपद्वारा उत्पन्न हो, फिर इस प्रकारकी मूर्खताको कैसे प्राप्त हो रहे हो, जो आज देवान्तकसे युद्ध करनेकी इच्छा कर रहे हो? मुझे देखकर तो काल भी भयभीत हो जाता है, तुम व्यर्थ ही मरनेकी इच्छा कर रहे हो। तुम्हारा शरीर अत्यन्त कोमल है, अतः तुम तो मेरे लिये एक ग्रासमात्र होओगे॥ ४-६॥ ब्रह्माजी कहते हैं—दैत्य [देवान्तक]-के इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधसे अरुण नेत्रोंवाले विनायकने मुखसे अग्निका-सा वमन करते हुए हँसकर कहा—॥ ७॥ भगवान् [विनायक] बोले—तुम मद्यपानके कारण उन्मत्त और सन्निपातसे ग्रस्त हो, इसीलिये मूर्खतावश असम्बद्ध, युक्तिहीन प्रलाप कर रहे हो ॥ ८॥ अग्निकी छोटी-सी चिनगारी भी वायुसे प्रेरित होकर सब कुछ जला डालती है। अरे दैत्याधम ! तुम्हारे वाक्यसे प्रेरित होकर ही मैं तुम्हें मार डालूँगा, तुम मुझे नहीं जानते हो। अब तुम ऐसी बुद्धिका त्याग कर दो कि मेरा अन्त करनेवाला कोई नहीं है। मैं सनातन ब्रह्म हूँ और तुम्हारे वधके लिये ही अवतीर्ण हुआ हूँ॥ ९-१०॥ शिवजीद्वारा प्राप्त वरदानके अहंकारसे तुमने सबको पीड़ित किया है। उस वरदानकी अवधि आ गयी है। बुद्धिहीन होनेके कारण तुम इसे समझ नहीं पा रहे हो। हे दुर्मते ! त्रैलोक्यको पीड़ा देनेसे तुम्हारे द्वारा जो पाप हुआ है, उसे कहना व्यर्थ है, अब तुम अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन करो॥ ११-१२॥ शक्तिके गुह्यांगसे निकलनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त कौन ऐसा होगा, जो अपना मुख दिखलायेगा ! यदि तुम युद्ध करनेकी इच्छा रखते हो तो मुझपर प्रहार करो और मेरे प्रहारको सहन करो। तुम अपनी मूर्खताके वशमें होकर कल होनेवाली अपनी मृत्युकी आज ही इच्छा कर रहे हो॥ १३ १/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—उस दैत्यसे इस प्रकार कहकर भगवान् विनायकने [अपने] धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी॥ १४॥ भगवान् विनायकने उस [देवान्तक]-को नरान्तककी गति अर्थात् मृत्यु देनेकी इच्छासे अपने धनुषकी टंकार की, जिससे तीनों लोक कम्पित हो उठे॥ १५॥ उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको कानतक खींचकर उस दैत्यपर बाण छोड़ा, परंतु दैत्यद्वारा सैकड़ों टुकड़े कर दिये जानेपर वह बाण भूमिपर गिर पड़ा॥ १६॥ तदनन्तर दैत्यने धनुषको प्रत्यंचायुक्त करके बहुत- से बाणोंका प्रहार किया, उसके धनुषकी टंकारसे पर्वत और दिशाएँ गूँज उठीं। तब विघ्नराज विनायकने हुंकार- मात्रसे उन बाणोंको गिरा दिया और पुनः उस दैत्याधिपतिपर बहुत-से बाणोंसे प्रहार किया॥ १७-१८॥ उन देवाधिदेवने एक बाणसे उसका मुकुट और दो बाणोंसे दोनों कानोंके कुण्डल भूमिपर गिरा दिये तथा दो बाणोंसे उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥ १९॥ उन्होंने एक बाणसे उसके ललाटपर प्रहार किया, तब वह दैत्य क्रोधान्वित होकर दाँतोंको चबाने लगा। उसने अपनी आँखें फैलाकर विनायकपर और भी बहुत- से बाण छोड़े, जिनसे आकाश और दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ २० १/२ ॥ उन बाणोंको भगवान् विनायकने आकाशमें ही एक ही बाणसे काट डाला और क्षणमात्रमें स्वयं एक बाणमय मण्डपका निर्माण किया। उस समय घोर

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क्री०ख०-अ०६८ ] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३१

क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अन्धकार छा जानेपर भी वे दोनों परस्पर युद्ध करते | गण्डस्थलको फाड़ डाला ॥ २९-३० ॥ रहे ॥ २१-२२ ॥ | सिंहोंके गर्जन, हाथियोंके चिंघाड़ और दैत्योंके क्रोधित होकर उन दोनोंने एक-दूसरेकी बाणवृष्टिको | अनेक प्रकारके शब्दोंसे तीनों लोक काँपने लगे तथा अपनी शरवर्षाद्वारा काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंने | सभी देवता आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३१ ॥ सैकड़ों बार एक-दूसरेकी बाणवृष्टिका निवारण किया। | वे सिंह उछल-उछलकर हाथियोंके कुम्भस्थलपर तदनन्तर उस दैत्य देवान्तकने एक सौ आठ बार | गिर रहे थे। इस प्रकार सिंहसमूहोंके द्वारा वे सभी हाथी महामन्त्र (अघोरमन्त्र)-का जप करके शीघ्र ही एक | मार डाले गये। [सिंहोंद्वारा मारे गये वे हाथी] इन्द्रद्वारा बाणको वारणास्त्रसे अभिमन्त्रित किया ॥ २३-२४ ॥ | वज्र-प्रहारसे गिराये गये पर्वतोंकी भाँति सुशोभित हो रहे उसे छोड़नेपर करोड़ोंकी संख्यामें हाथी उत्पन्न हो | थे। तदनन्तर वे सिंह दसों दिशाओंमें जाकर दैत्योंका गये, जो चार दाँतोंवाले, पर्वतके समान [विशाल] एवं | भक्षण करने लगे ॥ ३२-३३ ॥ मेरु और मन्दराचलको भी चूर्ण कर देनेवाले थे ॥ २५ ॥ | तब सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर देवान्तक चिन्तित जिनके मदके प्रवाहसे चारों ओर नदियाँ प्रवाहित | हो उठा। 'यह कश्यपका पुत्र बालक होते हुए भी होने लगीं तथा जिनके चिंघाड़मात्रसे तीनों लोक वैसे | बलवान् दिखायी दे रहा है, अतः अब मैं इसे निश्चित ही निनादित हो रहे थे, जैसे कि वर्षाकालमें बादलोंके | ही यमलोकका दर्शन कराऊँगा'—ऐसा कहकर दैत्यराजने गरजनेसे ॥ २६१/२ ॥ | पुनः एक बाणको अभिमन्त्रित किया ॥ ३४-३५ ॥ हे महामुने ! वे हाथी देवताओंकी सेनाको निरन्तर | तदनन्तर शार्दूलोंको उत्पन्न करनेवाले उस बाणको नष्ट कर रहे थे। वे दसों दिशाओंमें भाग रहे देवसैनिकोंका | धनुषपर चढ़ाकर उसने कानतक धनुषको खींचकर उसे पीछा कर रहे थे। वे पैरोंसे कुचलकर, सूँडके द्वारा और | देवताओंकी सेनापर छोड़ दिया। आकाश और दिशाओंको दाँतोंके अग्रभागसे वीरोंको मार डाल रहे थे ॥ २७-२८ ॥ | निनादित करता हुआ वह बाण शीघ्र ही [देवसेनामें] सेनाको इस प्रकारसे नष्ट होता हुआ देखकर | गया। उसके पंखकी वायुसे टूटकर वृक्षसमूह गिर पड़े। भगवान् विनायकने सिंहास्त्रका प्रयोग किया, तब सैकड़ों- | तब [उस बाणसे] अनेक शार्दूलसमूह प्रकट हो गये। हजारोंकी संख्यामें सिंह उत्पन्न हो गये। उनके सिंहनादसे | उन शार्दूलोंने सिंहोंका भक्षण कर डाला। तदनन्तर वे हाथी पृथ्वीपर गिर पड़े। तब उन सिंहोंने हाथियोंके | सब शार्दूल अन्तर्हित हो गये ॥ ३६-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्धका वर्णन' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ अड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर दैत्य देवान्तकने दो | तब भगवान् विनायकने अपने समक्ष ताल और बाणोंको आदरपूर्वक अभिमन्त्रित किया। उसने एक | मृदंग [बजाकर] गान करते हुए गन्धर्वों और अनेक बाणको निद्रास्त्रसे तथा दूसरेको गन्धर्वास्त्रसे अभिमन्त्रित | प्रकारके विचित्र नृत्य करती हुई अप्सराओंको देखा। किया ॥ १ ॥ | उस समय उनके हाथोंसे शस्त्र गिर गये और उन्हें इसका उसने बायें घुटनेको आगेकर और धनुषकी डोरीको | पता भी न चला ॥ ३-४ ॥ खींचकर उन दोनों बाणोंको छोड़ दिया। उनके शब्दसे | वे [गायन और वादनकी] मनोहर ध्वनिसे मोहित सहसा तीनों लोक काँपने लगे। उनमेंसे एक बाण सेनामें | हो गये थे और उन्हें अपने कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। और दूसरा देवाधिदेव विनायकके निकट गिरा ॥ २१/२ ॥ | निद्रास्त्रसे विमोहित होकर सभी सैनिक भी सो गये ॥ ५ ॥

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४३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रात्रिका आरम्भ होते ही जैसे बालक अस्त-व्यस्त | षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन किया और उसके रूपसे सो जाते हैं, वैसे ही वे सिद्धियाँ भी वहाँ | सम्मुख साष्टांग प्रणाम किया ॥ १५१/२ ॥ लज्जारहित होकर सो गयी थीं ॥ ६ ॥ | तदनन्तर दिव्य वस्त्र धारण किये हुए और अनेक देवान्तकने जब [विनायक और देवसेनाकी] यह | प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित देवान्तकने उस देवीकी स्थिति देखी तो उसने हर्ष प्रकट करते हुए गर्जना की। | गोदमें बैठकर भयंकर गर्जना की। वह देवी भी उसके तदनन्तर उस बलशालीने महान् देवसेनाके चारों ओर | साथ उड़कर आकाशमें स्थित हो गयी ॥ १६-१७ ॥ वीर सैनिकोंसे युक्त बहुत-से गुल्मों* (सैनिक टुकड़ियों)- | वह देवी (शक्ति) अनेक प्रकारके शस्त्र धारण की को स्थापित कर दिया ॥ ७१/२ ॥ | हुई थी और वह देवान्तक भी धनुष-बाण धारण किये [तदुपरान्त] उसने भूमिका संस्कार करके एक त्रिकोण | हुए था। उस समय उस रौद्रकेतुपुत्र देवान्तकने परम कुण्डका निर्माण किया। तत्पश्चात् रक्तसे भरे हुए सौ कलशोंको | प्रसन्न होकर उस शक्तिसे कहा—'यह कश्यपका पुत्र प्रयत्नपूर्वक मँगवाया और स्नानकर अनेक प्रेतोंसे युक्त | बालक होते हुए भी पहलेसे ही बहुत बलवान् है; अब आसनपर पद्मासन लगाकर आदरपूर्वक बैठ गया ॥ ८-९ ॥ | इस समय मेरा उस दुष्टके प्रति क्या कर्तव्य हो सकता उसने सैकड़ों दैत्योंको मारकर विशाल मांसराशि | है?' ॥ १८-१९ ॥ एकत्र की और विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके उस दैत्य | [तब उस शक्तिने कहा—] 'मैं अभी तुम्हारे देवान्तकने अभिचार-कर्म करना प्रारम्भ किया ॥ १० ॥ | सामने ही [उसकी] सम्पूर्ण सेनाका नाश किये देती हूँ।' उसने दिगम्बर (वस्त्रहीन) होकर मन्त्र पढ़ते हुए | जब वह दैत्येन्द्रसे इस प्रकार कह रही थी, तभी मांसकी आहुतियाँ देना प्रारम्भ किया। एक हजार आहुतियाँ | काशिराजने उसके वचनोंको सुन लिया ॥ २० ॥ देनेके अनन्तर उसने बलिदान देकर पूर्णाहुति की। तब | तदनन्तर राजाने विनायकके पास जाकर उन्हें उसने कुण्डके मध्य भागमें एक शक्तिको देखा, जो क्षुधातुर | आदरपूर्वक बोधित करते हुए कहा— ॥ २०१/२ ॥ थी। उसने उसे खानेके लिये नरमांस और पीनेके लिये उन | काशिराज बोले—[हे प्रभो!] आप तो भूत, [रक्तसे भरे हुए सौ] कलशोंको दिया ॥ ११-१२ ॥ | वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता हैं, फिर भी आप उस तब भी अतृप्त जानकर उसने उसे अन्य प्रेतोंको | दैत्यरचित गान्धर्वी मायाको क्यों नहीं जान पा रहे हैं? अर्पित किया, तब वह भयंकर शक्ति [उस कुण्डसे] | और आप उसमें आसक्त क्यों हो जा रहे हैं? देवान्तकने बाहर आयी। उसके बाल आकाशका स्पर्श कर रहे थे | अभिचार-कर्मके द्वारा राक्षसी-सदृश इस मायाका निर्माण और नेत्र विशाल गड्ढोंके समान थे। रक्तवर्ण और | किया है। वह आपकी सेनाका नाश कर डालेगी, अतः अतीव भयंकर मुखवाली उस शक्तिने दसों दिशाओंको | आप सावधानचित्त हो जाइये ॥ २१-२२१/२ ॥ प्रतिध्वनित करते हुए अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा— | ब्रह्माजी कहते हैं—तब काशिराजके इस प्रकारके 'रक्त-मांससे मैं तृप्त हो गयी हूँ, अब तुम्हें कोई भय | वचन सुनकर सावधान हुए चित्तवाले सर्वव्यापक भगवान् नहीं है' ॥ १३-१४१/२ ॥ | विनायकने ज्ञानदृष्टिसे देखकर जान लिया कि यह सब तब उस दैत्यने भी उसे प्रणामकर भक्तिभावसे | मायाद्वारा रचित है। तब उन्होंने [अपने तरकससे] दो


  • महाभारत (आदिपर्व २।१९-२०)-में गुल्मकी परिभाषा इस प्रकार दी गयी है— एको रथो गजश्चैको नरः पञ्च पदातयः। त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्याभिधीयते ॥ पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः। त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ अर्थात् एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े—इन्हींको सेनाके मर्मज्ञ विद्वानोंने 'पत्ति' कहा है। इसी पत्तिकी तिगुनी संख्याको विद्वान् पुरुष 'सेनामुख' कहते हैं और तीन सेनामुखोंको एक 'गुल्म' कहा जाता है। इस प्रकार एक गुल्ममें ९ हाथी, ९ रथ, २६ घुड़सवार और ४५ पैदल सैनिक होते हैं।

क्री०ख०-अ०६८ ] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३३

क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३३ बाण निकालकर उन्हें घण्टास्त्र और खगास्त्रके मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके धनुषको कानतक खींचकर छोड़ दिया। अत्यन्त वेगवाले और सुनहरे पंखोंवाले वे दोनों बाण मेघके समान गर्जना करते हुए वायुवेगसे चले और उन्होंने सहसा सूर्यमण्डलको आच्छादित कर दिया ॥ २३-२६ ॥ [उस समय] घण्टास्त्रसे महान् घण्टानाद होने लगा, जो सबको विमोहित कर देनेवाला था। तब उस घण्टा- नादको सुनकर सभी सैनिक उठकर खड़े हो गये ॥ २७॥ तब [निद्रास्त्रके प्रभावसे मुक्त] सिद्धियाँ और सभी वीर हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्ध करने लगे। भगवान् विनायकने दूसरा बाण देवान्तककी सेनाको लक्ष्य करके छोड़ा। तब उस खगास्त्र [नामक बाण]-से महान् बलसम्पन्न अनेक प्रकारके रूपोंवाले पक्षी प्रकट हो गये। हे मुने ! उनके पंखोंकी वायुके वेगसे वह गन्धर्वास्त्र वैसे ही नष्ट हो गया, जैसे सूर्यके सारथी अरुणके उदय (अरुणोदय) होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है। तदनन्तर उन पक्षियोंने सभी दैत्य सैनिकोंका भक्षण कर लिया ॥ २८-३०॥ कुछ दैत्य उन पक्षियोंके पंखोंके आघातसे मर गये, तो कुछ उनकी चोंचोंके अग्रभागसे क्षत-विक्षत हो गये तथा कुछ दैत्य भयसे प्राण त्यागकर गिर गये ॥ ३१ ॥ उस समय दैत्यसेनाओंमें सब ओर महान् हाहाकार होने लगा। तब देवान्तकने क्रोधित होकर खड्गास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३२ ॥ उसकी ध्वनि सुनकर सागर-जैसी विशाल सेना और दिशाओंको धारण करनेवाले हाथी क्षुब्ध हो उठे। उस अस्त्रसे असंख्य खड्ग निकल आये ॥ ३३ ॥ उस समय दोनों सेनाओंके टकरानेसे वे खड्ग अग्निके समान दाहक हो उठे। तब उस अग्निसे जलकर देवता धरतीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥ [उस अस्त्रके प्रभावसे] कुछ पक्षी मारे गये और कुछ अग्निदग्ध हो गये तथा अन्य पक्षी अन्तर्धान हो गये। उस समय उन असंख्य खड्गोंकी प्रभासे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, और उस (प्रभा)-ने सैनिकोंके नेत्रोंकी ज्योतिका हरण कर लिया। [उस समय] खड्गोंकी वृष्टिसे मारे गये देवता पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंकी भुजाएँ कट गयी थीं, तो कुछके मस्तक और कुछके हाथ कट गये थे। अन्य देवता पेट, घुटने और पीठपर खड्गके प्रहारसे आहत होकर मर गये और देवताओंके मृत शरीरोंपर गिर पड़े। इस प्रकार अष्टसिद्धियोंद्वारा निर्मित सम्पूर्ण सेना [उस अस्त्रद्वारा] विनष्ट हो गयी ॥ ३७-३८ ॥ उस समय दसों दिशाओंमें रक्तकी नदियाँ बहने लगीं और उनमें शव बहने लगे। तब विनायकने उस दैत्यके अद्भुत पराक्रमको देखकर [अपने तरकससे] एक सुदृढ़ बाणको निकालकर उसे वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और महान् गर्जना करते हुए उसे दैत्यसेनामें छोड़ दिया ॥ ३९-४० ॥ उस बाणके शब्दसे पर्वत और वृक्ष [टूटकर] पृथ्वीपर गिर पड़े। उस अस्त्रसे निकली अग्निके संयोगसे दिशाएँ जलने लगीं। उस अस्त्रने अपने तेजसे सूर्यमण्डलको आच्छादित कर लिया। उसके तेजसे कुछ पक्षी दग्ध होकर मर गये ॥ ४१-४२ ॥ उस वज्रास्त्रसे खड्गास्त्र सहसा हजारों टुकड़ोंमें टूट गया। तदनन्तर उस वज्रास्त्रने अनेक वज्रोंके द्वारा दैत्यसेनाको जला डाला ॥ ४३ ॥ वज्रकी धार [-के स्पर्शमात्र]-से हजारों दैत्य मर जा रहे थे। दैत्यगण जहाँ-जहाँ [भागकर] जाते थे, वहाँ-वहाँ वह वज्रास्त्र जाकर उनपर गिरता था ॥ ४४ ॥ उसने दैत्योंके मस्तकों, पैरों, हाथों, कन्धों और जंघाओंको चूर-चूर कर डाला। पृथ्वीका भेदनकर जो दैत्य [पातालमें] चले गये थे, उनको भी उस वज्रास्त्रने मार डाला। इस प्रकार तीक्ष्ण [धारवाले] सहस्रों वज्रोंद्वारा सभी दैत्य मार डाले गये। तदनन्तर वे सभी वज्र सब ओरसे देवान्तककी ओर चले ॥ ४५-४६ ॥ तब उसने भी एक बाण लेकर उसे प्रयत्नपूर्वक रौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे धनुषपर चढ़ाकर तथा [कानतक] खींचकर शत्रुसेनापर छोड़ दिया। [भगवान्] शिवके मंगलमय नामसे अंकित उस बाणने आकाश और दिशाओं-विदिशाओंको भी निनादित कर दिया। प्रलयकालीन अग्निके सदृश वह बाण अग्निकणोंका

४३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[पूर्वार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] वमन कर रहा था। उसके भयसे भूलोक और देवलोकके प्राणी दसों दिशाओंमें पलायन कर गये ॥ ४७-४९ ॥ उस समय विनायककी सेनामें महान् कोलाहल होने लगा। उस बाणके गिरनेपर उसमेंसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। ऐसा लगता था, मानो वह अपने भयंकर मुखसे तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा। वह [सिरपर] जटा धारण किये बड़े-बड़े हाथ-पैरोंवाला और विशाल पेटवाला था ॥ ५०-५१ ॥ उसका नीचेका ओष्ठ पृथ्वीको और ऊपरका ओष्ठ आकाशको स्पर्श कर रहा था, उसकी जिह्वा पर्वत-जैसी थी। उस भयंकर पुरुषने क्षणभरमें वज्रास्त्रका भक्षण कर लिया। तदनन्तर विशाल शरीरवाला वह पुरुष क्षणभरमें विनायकके वधकी इच्छासे उनके समीप पहुँच गया। तब [भगवान्] विनायकने तत्क्षण ही ब्रह्मास्त्रका

[पूर्वार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] सन्धान किया ॥ ५२-५३ ॥ उन देवाधिदेव विनायकने शताक्षरी मन्त्रसे एक तीव्रगामी बाणको अभिमन्त्रितकर उसे [धनुषपर चढ़ाकर और] कानतक खींचकर सहसा छोड़ दिया ॥ ५४ ॥ उस बाणसे उत्पन्न कर्कश ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। उससे निकले अग्निकणोंसे सभी दिशाएँ दग्ध हो उठीं। उस समय कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था। उस ब्रह्मास्त्रसे भी वैसा ही एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त भयंकर था। वे दोनों पुरुष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए आकाशमें चले गये ॥ ५५-५६ ॥ उन दोनों महाबलशालियोंने [वहाँ] अनेक प्रकारसे मल्लयुद्ध किया, तदुपरान्त क्षणभरमें वे दोनों अन्तर्धान हो गये और फिर कहीं भी नहीं दिखायी दिये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्ध' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥


उनहत्तरवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन


[उत्तरार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी कहते हैं—तब देवान्तक अत्यन्त विस्मित होकर अपने मनमें विचार करने लगा कि इस विनायकका निवारण करनेके लिये मैं जैसे-जैसे मायाका प्रयोग कर रहा हूँ, वैसे-वैसे ही यह बालक भी अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन कर रहा है। कब यह मृत्युको प्राप्त होगा और कब मैं विगतश्रम होकर सो सकूँगा ? ॥ १-२ ॥ इस प्रकार चिन्तित उस देवान्तकने अपने धनुषको प्रत्यंचायुक्त किया और एक भयंकर बाणको अभिमन्त्रित करके विनायकपर छोड़ दिया ॥ ३ ॥ उस अभिमन्त्रित बाणने सर्वव्यापक [परमात्मा] विनायकपर असंख्य बाणोंकी वर्षा की। [तदनन्तर] देवान्तकने एक भयंकर शक्तिका निर्माण किया, जो त्रिलोकीको ग्रास बनानेके लिये उद्यत थी ॥ ४ ॥ विघ्नराज विनायकने उस शक्तिको और उसकी गोदमें बैठे दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकको देखा, जो बहुत-से तीक्ष्ण बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहा था ॥ ५ ॥ तब अष्ट सिद्धियाँ शीघ्र उड़कर गयीं और उस

[उत्तरार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] शक्तिको बलपूर्वक पकड़कर उसे विनायकके पास लाने लगीं। जब वे उसे ला रही थीं, तभी वह उनके हाथसे निकलकर भाग गयी। तब वे सब क्रुद्ध होकर दैत्यपति देवान्तकको ही उसके सिरके बाल पकड़कर विनायकके पास ले आयीं ॥ ६-७ ॥ तब उस दैत्यने अणिमापर दृढ़तापूर्वक मुष्टिका- प्रहार किया, उस मुष्टिकाघातसे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। तब लघिमा, गरिमा और वशिमाने उसपर तबतक लातोंसे प्रहार किया, जबतक कि उसने शीघ्रतापूर्वक उन सबके चरणोंको पृथक्-पृथक् पकड़ नहीं लिया। तदनन्तर वह दैत्य जबतक उन्हें पृथ्वीपर पटकता, उससे पहले ही वे निकल गयीं ॥ ८-१० ॥ तब प्राकाम्य और भूतिने उसे बलपूर्वक मारा तो वह दैत्य मुखसे अग्निवमन करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर क्षणभरमें चेतना प्राप्त करके वह एक शक्तिशाली घोड़ेपर सवार हो गया। उसने शस्त्र हाथमें लेकर वायुवेगसे विनायकपर प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥

क्री०ख०-अ०६९] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३५

क्री०ख०-अ०६९] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तलवारके दृढ़ आघातसे देव विनायक कुछ मूर्च्छित- से हो गये, परंतु पलक झपकनेमात्रमें सावधान होकर वे उस दैत्यराजके प्रति इस प्रकार दौड़े, जैसे हिरण्य- कशिपुका वध करनेके लिये विष्णु और वृत्रासुरका वध करनेके लिये शचीपति इन्द्र दौड़े थे ॥ १३ १/२ ॥ वे अपने चारों हाथोंमें बाण, कमल, पाश और अंकुश धारण किये थे और वीरोचित शोभासे अत्यन्त प्रकाशमान होकर सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने मेघसदृश गर्जना करके अपने चारों आयुधोंसे उस दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकपर वेगपूर्वक प्रहार किया, परंतु फिर भी वह विचलित नहीं हुआ। तब अपने शस्त्रोंको व्यर्थ हुआ देखकर विनायक अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए और माना कि इस दैत्यका शरीर वज्रके सारभागसे बना हुआ है ॥ १४-१६ १/२ ॥ तदनन्तर देवाधिदेव विनायकने उस महान् अस्त्रको ग्रहण किया, जो वज्रको भी चूर्ण कर सकता था और जिसे [विनायकके द्वारा पूर्वमें मारे गये] धूम्राक्षने [सूर्योपासनाके फलस्वरूप] सूर्यमण्डलसे प्राप्त किया था। उन्होंने दैत्य देवान्तकपर उसी अस्त्रसे प्रहार किया, किंतु [देवान्तककी शारीरिक दृढ़ताके कारण] उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ १७-१८ ॥ उससे उसका एक रोम भी विचलित नहीं हुआ— यह एक महान् आश्चर्यकी बात थी ! तदनन्तर उन दोनोंने अनेक शस्त्रोंसे एक-दूसरेके सिर, पीठ, हृदय और भुजाओंपर प्रहार किया। तब उन शस्त्रोंके प्रहारसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीको जलाने लगी, परंतु वे दोनों [उससे] भयभीत नहीं हुए और युद्ध करते रहे। आधी रात हो जाने और अँधेरा फैल जानेपर भी उन्होंने युद्ध बन्द नहीं किया ॥ १९-२१ ॥ तदनन्तर वे दोनों कृत्रिम प्रकाशमें परस्पर युद्ध करने लगे। तब रौद्रकेतुने देवताओंको विमोहित करनेवाली मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥ उसने सुन्दर स्वरूपवाली अदितिकी रचनाकर उसे दैत्य देवान्तकके हाथमें दे दिया। वह कमलनयनी पीन पयोधरोंवाली और भालदेशपर रक्तवर्णके कुंकुमका आलेप किये हुए थी। उसके गलेमें मुक्ताहार, हाथोंमें सुन्दर

[दायाँ स्तम्भ] कंगन और शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभायमान थे। स्वर्णाभूषणोंसे विभूषित और दिव्य कंचुकी धारण किये वह सौन्दर्यलहरीके समान थी ॥ २३-२४ ॥ दैत्यके हाथमें पड़ी वह विनायकको देखकर रुदन करने लगी और उनसे बोली—'दौड़ो-दौड़ो, मैं संकटमें हूँ, तुम देख क्या रहे हो?' ॥ २५ ॥ वह ऐसा कह ही रही थी कि उस दैत्यने बलात् उसकी कंचुकी फाड़ डाली तथा उस मदोन्मत्त चित्तवाले दैत्यने उसके वस्त्रोंको भी खींच लिया। तब उस [मायारचित] अदितिने उच्च स्वरमें विनायकदेवसे कहा— 'तुम्हारा पुरुषार्थ कहाँ चला गया? अरे निष्ठुर ! लोकलब्जाके भयसे तुम शीघ्र मुझे [इस दैत्यसे] छुड़ाओ' ॥ २६-२७ ॥ अदितिको ऐसी अवस्थामें देखकर आँसुओंसे विनायकका कण्ठ भर आया, वे क्रोधित हो उठे, उन्हें कुछ भी स्मरण नहीं रहा और न वे कुछ विचार ही कर सके, शस्त्र उनके हाथोंसे गिर गये ॥ २८ ॥ वे सोचने लगे कि यह मेरी माता इसके हाथमें कैसे आ गयी ? उस पुत्रके जन्मको धिक्कार है, जिसकी जननी इस प्रकारकी दुरावस्थाको प्राप्त हो ॥ २९ ॥ देवताओंकी जननी होते हुए भी वह कैसे इस दुष्टके चंगुलमें पड़ गयी ? गणनायकको इस प्रकार शोक करते देखकर स्वयं काशिराज भी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और साथ ही नगरमें स्थित लोग भी। तब उस देवान्तकने विनायकदेवकी बहुत प्रकारसे निन्दा की— 'अरे ! तेरे जन्मको धिक्कार है, आज तेरा पौरुष कहाँ गया ? तू प्राण क्यों नहीं त्याग देता ? तू तो निर्लज्ज है, जो इस समय भी संसारमें अपना मुख दिखा रहा है। अरे दुष्ट ! मैं तेरे समक्ष ही इसके शरीरसे इसका सिर काटकर इसे मार डालता हूँ' ॥ ३०-३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं— देवान्तकके इस प्रकारके निष्ठुर वचनोंको सुनकर [विनायकदेवने] मनमें विचार किया कि यह सत्य ही कह रहा है, अब मुझे प्राणत्यागके लिये क्या करना चाहिये—'विषपान या पाशबन्धन ? अथवा मृत्युकी प्राप्तिके लिये मुझे उदरमें शस्त्राघात कर लेना चाहिये ?' जब वे दुःख और

४३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शोकसे समन्वित होकर इस प्रकार विचार कर ही रहे | विनायक प्रातःकाल होनेपर युद्धके लिये गये ॥ ३८-३९॥ थे, तभी विनायकने आकाशवाणी सुनी ॥ ३३-३५१/२ ॥ | उस दैत्यने भी [रात्रिकालीन] युद्धकी समाप्तिपर आकाशवाणीने कहा— हे देव! यह जान लो | [उषाकालमें] लाल-लाल आँखोंवाले, मुकुटसे सुशोभित कि यह [अदिति] दुष्टबुद्धि दैत्यद्वारा मायासे रची गयी | और उज्ज्वल कुण्डल धारण किये विनायकको अपने है। अतः संयतचित्त होकर अपने शत्रु का वध करो। तब | सम्मुख देखा ॥ ४० ॥ उस अदितिको मायामयी जानकर वे विनायक सावधान | दाँतोंकी कान्तिसे वे अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे, हो गये ॥ ३६-३७ ॥ | मोतियोंकी मालासे विभूषित थे। वे दिव्य वस्त्र धारण किये महाबुद्धिमान् विनायक हर्षित हो गये और दैत्य | हुए थे और अत्यन्त कान्तिमान् थे। उन सर्वव्यापक प्रभुकी देवान्तकको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने | सूँड़ आकाशका स्पर्श कर रही थी। विनायकके [ऐसे] उस वरदानका स्मरण किया, जो भगवान् शंकरने उस | रूपको देखकर देवान्तक भयभीत और अत्यन्त विस्मित दुरात्माको दिया था कि उषाकालके बिना सभी शस्त्रास्त्र | होकर [बोल पड़ा] —अरे! यह आधा मनुष्यका और तुमपर व्यर्थ हो जायँगे। इस प्रकार उसको प्राप्त वरको जानकर | आधा हाथीके जैसे शरीरवाला कौन है? ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥ सत्तरवाँ अध्याय देवान्तक-वध ब्रह्माजी बोले—भयसे भ्रमित बुद्धिवाला वह | लोगोंने इसे [दैवीय] उत्पात माना ॥ ६-७ ॥ देवान्तक जब ऐसा कह रहा था, तभी विनायकदेवने उसे | उस समय युद्ध देख रहे सभी देवताओंके देखते- छोटे बालकके समान उठाकर अपनी गोदमें ले लिया ॥ १ ॥ | देखते दैत्य [देवान्तक]-के शरीरसे निकलकर एक तदनन्तर गणोंके स्वामी विनायकने अपने प्रभावसे | ज्योति विनायकमें प्रवेश कर गयी ॥ ८ ॥ सुन्दर पद्मासनमें बैठकर दैत्यराजसे कहा—'अपने सुन्दर | उसका शरीर तीन योजनके वृक्षसमूहों, पर्वतों और वरदानका स्मरण करो' ॥ २॥ | पौधोंको चूर-चूर करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥ तब वह दैत्य उनके दाँतको दोनों हाथोंसे पकड़कर | उसकी ऐसी गति देखकर उसके सैनिक दसों अपने शरीरको अन्तरिक्षमें बार-बार झुलाने लगा ॥ ३॥ | दिशाओंमें भाग गये। उसके शरीरके गिरनेसे कितने ही तब जैसे ही वह देवान्तक दाँतको तोड़कर भूतलपर | सैनिक मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ गिरा, वैसे ही उन सर्वव्यापक देव विनायकने शीघ्रतासे | अपने-अपने स्थानसे आये हुए देवता [विनायकपर] अपने उस दाँतको पकड़ लिया ॥ ४ ॥ | पुष्पवर्षा करने लगे। राजा (काशिराज)-के नगाड़ोंकी उन्होंने उसी दाँतसे देवान्तकके मस्तकपर प्रहार | ध्वनिके साथ देव-दुन्दुभियोंकी भी ध्वनि होने लगी ॥ ११॥ किया और अत्यन्त उच्च स्वरसे गर्जना की, जिससे | दिशाएँ निर्मल हो गयीं और सुखदायक हवा चलने दिशाएँ-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ५ ॥ | लगी, अग्नि तेजयुक्त हो गयी और लोग प्रसन्न हो गये। सम्पूर्ण पृथ्वी और सभी पाताल विचलित हो गये। | प्रतिकूल बह रही नदियाँ सन्मार्गगामिनी हो गयीं। तब इन्द्रादि उस दन्ताघातसे देवान्तकके शरीरके तत्क्षण सैकड़ों | देवताओं और मुनियोंने उनका पूजन किया ॥ १२-१३॥ टुकड़े हो गये। आकाशसे मेघवृष्टिकी भाँति शीघ्र ही | उन्होंने परम भक्तिभावसे देवाधिदेव विनायकका रक्तकी वर्षा होने लगी। पृथ्वीपर निवास करनेवाले सभी | स्तवन किया और कहा—'हे विभो! आपने हमें देवान्तकके

क्री०ख०-अ०७१ ] * काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप * ४३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बन्धनसे मुक्त किया। हे देवेश ! आपने उपेन्द्र* (विष्णु)- के समान कार्य किया है, अतः लोकमें आपकी ख्याति 'उपेन्द्र' नामसे होगी' ॥ १४-१५॥ अब हम लोग अपने-अपने पदोंपर भयरहित होकर रहेंगे। स्वाहा, स्वधा और वषट्कार घर-घरमें होंगे ॥ १६॥ ऐसा कहकर उन सबने विनायकदेवको नमस्कारकर उनकी प्रदक्षिणा की और आज्ञा लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानोंको वापस लौट आये ॥ १७॥ देवताओं और मुनियोंने उनका 'हृषीकेश' ऐसा नामकरण किया और उन्हें प्रणामकर हर्षित मनसे अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ १८ ॥ तदनन्तर सभी राजाओंने विनायकका सम्यक् रूपसे पूजनकर और प्रणामकर उनसे कहा- 'हे देव ! आपने दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार किया, इसलिये आप 'धरणीधर' कहे जायँगे।' ऐसा कहकर वे सब उनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने नगरोंको चले गये। तत्पश्चात् काशिराजने विनायकको देखा, वे बालरूप धारण किये थे और सिंहपर आरूढ़ होकर बालकोंके साथ खेल रहे थे ॥ १९-२१ ॥ बालक [-रूपधारी] विनायकने भी उन राजा (काशिराज)-को देखकर परम आदरसे उनका आलिंगन किया। वे दोनों आनन्दसे परिपूर्ण थे और आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा कर रहे थे॥ २२॥ तदनन्तर राजाने विनायकदेवसे कहा- 'मेरा महान् भाग्योदय हुआ है, जो कि ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगम्य सनातन परब्रह्म हैं, उनका मैं नित्य दर्शन कर रहा हूँ। यह मेरे पूर्वजन्मके पुण्योंके फलका उदय है कि जो विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, और स्वयं कारणरहित हैं, जो वेदान्तवेद्य, नित्य, ग्रह-नक्षत्रोंके प्रकाशक और स्वयं प्रकाशरूप हैं, जो अनेक रूपवाले और निराकार हैं, पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और मनोहर स्वरूपवाले हैं, वे ही बालरूपसे मेरे घरमें स्वेच्छानुसार खेल रहे हैं'॥ २३-२५१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- काशिराजद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुति सुनकर विघ्नराजने आँसुओंको पोंछकर कहा- 'मैं आपसे क्षणभरके लिये भी कभी दूर नहीं जाऊँगा।' ॥ २६१/२ ॥ तब देवान्तकके वधसे हर्षित राजाने उनका अनेक प्रकारसे उपचारोंसे पूजन किया और अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि तथा वन्दिजनोंद्वारा गायी गयी स्तुतियोंके साथ सैनिकोंसहित बालरूप विनायककी स्तुति करते हुए अपने नगरको गये ॥ २७-२८१/२ ॥ वहाँ सभी लोगोंको अनेक प्रकारके वस्त्र देकर तथा कुछको पान देकर [राजाने] विदा किया। तत्पश्चात् विनायकको आगे करके हर्षित मनसे उन्होंने अपने रमणीय भवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'पुरप्रवेश' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥

इकहत्तरवाँ अध्याय काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना

ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दूसरे दिन जब राजा काशिराज भद्रासनमें बैठे थे, तब उन्होंने अमात्यों, प्रधान वीरों, वृद्धजनों, मित्रों तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नमस्कार करके अपने मनकी बात बतलायी ॥ १ १/२ ॥ राजा बोले- मैंने अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये विनायकको बुलवाया था। उनके यहाँ आनेपर अनेक उत्पात भी उत्पन्न हो गये, जिनका निराकरण उन्होंने कर दिया। विनायककी माता अदितिसे

* भगवान् विष्णु वामनावतारमें इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिसे प्रकट हुए थे, अतः उन्हें 'उपेन्द्र' कहा गया था; वैसे ही विनायक भी अदितिपुत्र और इन्द्रके अनुज हैं, अतः उन्हें भी उपेन्द्र कहते हैं।

४३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैंने कहा था कि शीघ्र ही मैं आपके पुत्रको वापस ले | आरूढ़ होकर वाद्योंकी ध्वनिके साथ महर्षि कश्यपजीके आऊँगा, किंतु बहुत-से दिन जल्दी ही बीत गये। अब | श्रेष्ठ आश्रमके लिये प्रस्थान किया ॥ १३-१४ १/२ ॥ सारा लोक स्वस्थ हो गया है, अतः पुत्रके विवाहके | उस समय नगरके सभी लोग अपने-अपने कार्योंको विषयमें आपको विचार करना चाहिये ॥ २-४ ॥ | छोड़कर बाहर निकल आये। उन्होंने भोजन करना, अमात्य बोले— हे महाराज ! आपने ठीक ही कहा | पढ़ना, निद्रा, व्यासंग (नानाविध कर्मोंमें आसक्ति) आदिका है, विघ्नोंके द्वारा विवाह-कार्यमें विलम्ब हो गया है, अब | परित्याग कर दिया और अपनी वेष-भूषाको पहने बिना सब विघ्न दूर हो गये हैं, अतः विवाह-कार्य प्रारम्भ करना | ही वे शीघ्रतासे पुरीसे बाहर निकल आये ॥ १५-१६ ॥ चाहिये। विनायकके कृपा-प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ | उस समय हजारों बालकोंने उन विनायकको जाकर एवं निर्भय हो गया है, अतः अब दूर देशोंमें स्थित | रोक दिया और वे कहने लगे—'आप हमको छोड़कर मित्रजनोंको विवाहकी लग्नपत्रिका भेजनी चाहिये और | क्यों जा रहे हैं, क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं ? आपने विवाहकी सभी सामग्री एकत्रित करनेके लिये दूतोंको | किसी बातचीतके प्रसंगमें पहले हमें कभी नहीं बताया था गाँव-गाँवमें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ | कि 'मैं वापस जाऊँगा', हमारे घरमें भोजन किये बिना ब्रह्माजी बोले— मन्त्रियोंद्वारा कही गयी इस | आप अपने आश्रमको क्यों जा रहे हैं?' ॥ १७-१८ ॥ प्रकारकी बातोंको सुनकर सभी लोग तथा सभामें बैठे | किसी बालकने रोते-रोते उनके चरणकमलको हुए सभासद् कहने लगे—आप लोगोंने बहुत अच्छी बात | पकड़ लिया तो किसीने प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन करके कही है। यह सुनकर राजाको अत्यन्त हर्ष हुआ। उसी | उनके करकमलोंको पकड़ लिया ॥ १९ ॥ दिन उन्होंने ज्योतिषियोंसे विवाहका लग्न दिन निश्चित | नगरीकी स्त्रियाँ, बालिकाएँ तथा युवावस्थाको करवा लिया ॥ ७-८ ॥ | प्राप्त सभी मुग्धा युवतियाँ अस्त-व्यस्त वेषमें ही उन्हें तदनन्तर राजाने मित्रजनोंको बुलवानेके लिये | देखनेके लिये वैसे ही आ पड़ीं, जैसे कि वर्षार्ऋतुमें मांगलिक दूतोंको भेजा और उचित रीतिसे विश्वस्त | समुद्रकी ओर जानेवाली सभी नदियाँ समुद्रकी ओर दूतोंके द्वारा विवाह-सामग्रीको एकत्रित करवाया। तदनन्तर | प्रवाहित होने लगती हैं, जैसे हंस मोतियोंकी राशिकी मगध देशके राजा भी अपनी पुत्रीको लेकर उस नगरीमें | ओर दौड़ पड़ते हैं, और जैसे मरुद्गण देवराज इन्द्रकी आये और सभी मित्र तथा सम्बन्धी भी नाना दिशाओंसे | ओर चल पड़ते हैं ॥ २०-२१ ॥ वहाँ उपस्थित हुए ॥ ९-१० ॥ | वे स्त्रियाँ अत्यन्त प्रीतिसे समन्वित होकर कहने उन्होंने परस्पर एक-दूसरेको अनेकों उपहार प्रदान | लगीं—'हे विनायक ! आप अकस्मात् स्नेहका परित्यागकर किये। काशिराज तथा मगधके राजाने देवताओंकी स्थापना | क्यों जा रहे हैं? आज आप इतने निष्ठुर कैसे हो गये की और बड़े-बड़े महोत्संवोंका आयोजन किया। उन्होंने | हैं?' ॥ २२ ॥ बड़े ही प्रयत्नपूर्वक विवाहकी समस्त विधियोंका सांगोपांग | ब्रह्माजी बोले—थके हुए, दौड़ते हुए, फिसलते सम्पादन किया और धन आदिके प्रदानके द्वारा ब्राह्मणों | हुए तथा गिरते हुए उन सभी जनोंको देखकर राजासहित तथा अन्य लोगोंको सन्तुष्ट किया ॥ ११-१२ ॥ | विनायक रथसे उतर पड़े ॥ २३ ॥ तदनन्तर काशिराजने सभी मित्रगणोंको विदा करके | राजाके साथ नगरसे शीघ्र ही बाहर आये वे उबटनका अनुलेपन एवं स्नान कराकर विविध प्रकारके | विनायक एक मुहूर्त वहीं ठहरकर उन सभीसे बोले— श्रेष्ठ आभूषणों तथा वस्त्रोंसे विनायकको सुसज्जित किया | 'इस समय मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ऊपर और अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उन्हें भोजन कराया। | कृपा करना न छोड़ें, आप लोगोंके घर आकर वहाँ जो इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ काशिराजने विनायकके साथ रथमें | अपराध मुझसे हुए हैं, उन्हें आप क्षमा कर दें। यदि आप