श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[पूर्वार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] वमन कर रहा था। उसके भयसे भूलोक और देवलोकके प्राणी दसों दिशाओंमें पलायन कर गये ॥ ४७-४९ ॥ उस समय विनायककी सेनामें महान् कोलाहल होने लगा। उस बाणके गिरनेपर उसमेंसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। ऐसा लगता था, मानो वह अपने भयंकर मुखसे तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा। वह [सिरपर] जटा धारण किये बड़े-बड़े हाथ-पैरोंवाला और विशाल पेटवाला था ॥ ५०-५१ ॥ उसका नीचेका ओष्ठ पृथ्वीको और ऊपरका ओष्ठ आकाशको स्पर्श कर रहा था, उसकी जिह्वा पर्वत-जैसी थी। उस भयंकर पुरुषने क्षणभरमें वज्रास्त्रका भक्षण कर लिया। तदनन्तर विशाल शरीरवाला वह पुरुष क्षणभरमें विनायकके वधकी इच्छासे उनके समीप पहुँच गया। तब [भगवान्] विनायकने तत्क्षण ही ब्रह्मास्त्रका
[पूर्वार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] सन्धान किया ॥ ५२-५३ ॥ उन देवाधिदेव विनायकने शताक्षरी मन्त्रसे एक तीव्रगामी बाणको अभिमन्त्रितकर उसे [धनुषपर चढ़ाकर और] कानतक खींचकर सहसा छोड़ दिया ॥ ५४ ॥ उस बाणसे उत्पन्न कर्कश ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। उससे निकले अग्निकणोंसे सभी दिशाएँ दग्ध हो उठीं। उस समय कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था। उस ब्रह्मास्त्रसे भी वैसा ही एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त भयंकर था। वे दोनों पुरुष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए आकाशमें चले गये ॥ ५५-५६ ॥ उन दोनों महाबलशालियोंने [वहाँ] अनेक प्रकारसे मल्लयुद्ध किया, तदुपरान्त क्षणभरमें वे दोनों अन्तर्धान हो गये और फिर कहीं भी नहीं दिखायी दिये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्ध' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन
[उत्तरार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी कहते हैं—तब देवान्तक अत्यन्त विस्मित होकर अपने मनमें विचार करने लगा कि इस विनायकका निवारण करनेके लिये मैं जैसे-जैसे मायाका प्रयोग कर रहा हूँ, वैसे-वैसे ही यह बालक भी अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन कर रहा है। कब यह मृत्युको प्राप्त होगा और कब मैं विगतश्रम होकर सो सकूँगा ? ॥ १-२ ॥ इस प्रकार चिन्तित उस देवान्तकने अपने धनुषको प्रत्यंचायुक्त किया और एक भयंकर बाणको अभिमन्त्रित करके विनायकपर छोड़ दिया ॥ ३ ॥ उस अभिमन्त्रित बाणने सर्वव्यापक [परमात्मा] विनायकपर असंख्य बाणोंकी वर्षा की। [तदनन्तर] देवान्तकने एक भयंकर शक्तिका निर्माण किया, जो त्रिलोकीको ग्रास बनानेके लिये उद्यत थी ॥ ४ ॥ विघ्नराज विनायकने उस शक्तिको और उसकी गोदमें बैठे दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकको देखा, जो बहुत-से तीक्ष्ण बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहा था ॥ ५ ॥ तब अष्ट सिद्धियाँ शीघ्र उड़कर गयीं और उस
[उत्तरार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] शक्तिको बलपूर्वक पकड़कर उसे विनायकके पास लाने लगीं। जब वे उसे ला रही थीं, तभी वह उनके हाथसे निकलकर भाग गयी। तब वे सब क्रुद्ध होकर दैत्यपति देवान्तकको ही उसके सिरके बाल पकड़कर विनायकके पास ले आयीं ॥ ६-७ ॥ तब उस दैत्यने अणिमापर दृढ़तापूर्वक मुष्टिका- प्रहार किया, उस मुष्टिकाघातसे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। तब लघिमा, गरिमा और वशिमाने उसपर तबतक लातोंसे प्रहार किया, जबतक कि उसने शीघ्रतापूर्वक उन सबके चरणोंको पृथक्-पृथक् पकड़ नहीं लिया। तदनन्तर वह दैत्य जबतक उन्हें पृथ्वीपर पटकता, उससे पहले ही वे निकल गयीं ॥ ८-१० ॥ तब प्राकाम्य और भूतिने उसे बलपूर्वक मारा तो वह दैत्य मुखसे अग्निवमन करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर क्षणभरमें चेतना प्राप्त करके वह एक शक्तिशाली घोड़ेपर सवार हो गया। उसने शस्त्र हाथमें लेकर वायुवेगसे विनायकपर प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥