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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 656 में से

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पृष्ठ 437

क्री०ख०-अ०६९] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तलवारके दृढ़ आघातसे देव विनायक कुछ मूर्च्छित- से हो गये, परंतु पलक झपकनेमात्रमें सावधान होकर वे उस दैत्यराजके प्रति इस प्रकार दौड़े, जैसे हिरण्य- कशिपुका वध करनेके लिये विष्णु और वृत्रासुरका वध करनेके लिये शचीपति इन्द्र दौड़े थे ॥ १३ १/२ ॥ वे अपने चारों हाथोंमें बाण, कमल, पाश और अंकुश धारण किये थे और वीरोचित शोभासे अत्यन्त प्रकाशमान होकर सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने मेघसदृश गर्जना करके अपने चारों आयुधोंसे उस दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकपर वेगपूर्वक प्रहार किया, परंतु फिर भी वह विचलित नहीं हुआ। तब अपने शस्त्रोंको व्यर्थ हुआ देखकर विनायक अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए और माना कि इस दैत्यका शरीर वज्रके सारभागसे बना हुआ है ॥ १४-१६ १/२ ॥ तदनन्तर देवाधिदेव विनायकने उस महान् अस्त्रको ग्रहण किया, जो वज्रको भी चूर्ण कर सकता था और जिसे [विनायकके द्वारा पूर्वमें मारे गये] धूम्राक्षने [सूर्योपासनाके फलस्वरूप] सूर्यमण्डलसे प्राप्त किया था। उन्होंने दैत्य देवान्तकपर उसी अस्त्रसे प्रहार किया, किंतु [देवान्तककी शारीरिक दृढ़ताके कारण] उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ १७-१८ ॥ उससे उसका एक रोम भी विचलित नहीं हुआ— यह एक महान् आश्चर्यकी बात थी ! तदनन्तर उन दोनोंने अनेक शस्त्रोंसे एक-दूसरेके सिर, पीठ, हृदय और भुजाओंपर प्रहार किया। तब उन शस्त्रोंके प्रहारसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीको जलाने लगी, परंतु वे दोनों [उससे] भयभीत नहीं हुए और युद्ध करते रहे। आधी रात हो जाने और अँधेरा फैल जानेपर भी उन्होंने युद्ध बन्द नहीं किया ॥ १९-२१ ॥ तदनन्तर वे दोनों कृत्रिम प्रकाशमें परस्पर युद्ध करने लगे। तब रौद्रकेतुने देवताओंको विमोहित करनेवाली मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥ उसने सुन्दर स्वरूपवाली अदितिकी रचनाकर उसे दैत्य देवान्तकके हाथमें दे दिया। वह कमलनयनी पीन पयोधरोंवाली और भालदेशपर रक्तवर्णके कुंकुमका आलेप किये हुए थी। उसके गलेमें मुक्ताहार, हाथोंमें सुन्दर

[दायाँ स्तम्भ] कंगन और शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभायमान थे। स्वर्णाभूषणोंसे विभूषित और दिव्य कंचुकी धारण किये वह सौन्दर्यलहरीके समान थी ॥ २३-२४ ॥ दैत्यके हाथमें पड़ी वह विनायकको देखकर रुदन करने लगी और उनसे बोली—'दौड़ो-दौड़ो, मैं संकटमें हूँ, तुम देख क्या रहे हो?' ॥ २५ ॥ वह ऐसा कह ही रही थी कि उस दैत्यने बलात् उसकी कंचुकी फाड़ डाली तथा उस मदोन्मत्त चित्तवाले दैत्यने उसके वस्त्रोंको भी खींच लिया। तब उस [मायारचित] अदितिने उच्च स्वरमें विनायकदेवसे कहा— 'तुम्हारा पुरुषार्थ कहाँ चला गया? अरे निष्ठुर ! लोकलब्जाके भयसे तुम शीघ्र मुझे [इस दैत्यसे] छुड़ाओ' ॥ २६-२७ ॥ अदितिको ऐसी अवस्थामें देखकर आँसुओंसे विनायकका कण्ठ भर आया, वे क्रोधित हो उठे, उन्हें कुछ भी स्मरण नहीं रहा और न वे कुछ विचार ही कर सके, शस्त्र उनके हाथोंसे गिर गये ॥ २८ ॥ वे सोचने लगे कि यह मेरी माता इसके हाथमें कैसे आ गयी ? उस पुत्रके जन्मको धिक्कार है, जिसकी जननी इस प्रकारकी दुरावस्थाको प्राप्त हो ॥ २९ ॥ देवताओंकी जननी होते हुए भी वह कैसे इस दुष्टके चंगुलमें पड़ गयी ? गणनायकको इस प्रकार शोक करते देखकर स्वयं काशिराज भी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और साथ ही नगरमें स्थित लोग भी। तब उस देवान्तकने विनायकदेवकी बहुत प्रकारसे निन्दा की— 'अरे ! तेरे जन्मको धिक्कार है, आज तेरा पौरुष कहाँ गया ? तू प्राण क्यों नहीं त्याग देता ? तू तो निर्लज्ज है, जो इस समय भी संसारमें अपना मुख दिखा रहा है। अरे दुष्ट ! मैं तेरे समक्ष ही इसके शरीरसे इसका सिर काटकर इसे मार डालता हूँ' ॥ ३०-३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं— देवान्तकके इस प्रकारके निष्ठुर वचनोंको सुनकर [विनायकदेवने] मनमें विचार किया कि यह सत्य ही कह रहा है, अब मुझे प्राणत्यागके लिये क्या करना चाहिये—'विषपान या पाशबन्धन ? अथवा मृत्युकी प्राप्तिके लिये मुझे उदरमें शस्त्राघात कर लेना चाहिये ?' जब वे दुःख और