श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शोकसे समन्वित होकर इस प्रकार विचार कर ही रहे | विनायक प्रातःकाल होनेपर युद्धके लिये गये ॥ ३८-३९॥ थे, तभी विनायकने आकाशवाणी सुनी ॥ ३३-३५१/२ ॥ | उस दैत्यने भी [रात्रिकालीन] युद्धकी समाप्तिपर आकाशवाणीने कहा— हे देव! यह जान लो | [उषाकालमें] लाल-लाल आँखोंवाले, मुकुटसे सुशोभित कि यह [अदिति] दुष्टबुद्धि दैत्यद्वारा मायासे रची गयी | और उज्ज्वल कुण्डल धारण किये विनायकको अपने है। अतः संयतचित्त होकर अपने शत्रु का वध करो। तब | सम्मुख देखा ॥ ४० ॥ उस अदितिको मायामयी जानकर वे विनायक सावधान | दाँतोंकी कान्तिसे वे अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे, हो गये ॥ ३६-३७ ॥ | मोतियोंकी मालासे विभूषित थे। वे दिव्य वस्त्र धारण किये महाबुद्धिमान् विनायक हर्षित हो गये और दैत्य | हुए थे और अत्यन्त कान्तिमान् थे। उन सर्वव्यापक प्रभुकी देवान्तकको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने | सूँड़ आकाशका स्पर्श कर रही थी। विनायकके [ऐसे] उस वरदानका स्मरण किया, जो भगवान् शंकरने उस | रूपको देखकर देवान्तक भयभीत और अत्यन्त विस्मित दुरात्माको दिया था कि उषाकालके बिना सभी शस्त्रास्त्र | होकर [बोल पड़ा] —अरे! यह आधा मनुष्यका और तुमपर व्यर्थ हो जायँगे। इस प्रकार उसको प्राप्त वरको जानकर | आधा हाथीके जैसे शरीरवाला कौन है? ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥ सत्तरवाँ अध्याय देवान्तक-वध ब्रह्माजी बोले—भयसे भ्रमित बुद्धिवाला वह | लोगोंने इसे [दैवीय] उत्पात माना ॥ ६-७ ॥ देवान्तक जब ऐसा कह रहा था, तभी विनायकदेवने उसे | उस समय युद्ध देख रहे सभी देवताओंके देखते- छोटे बालकके समान उठाकर अपनी गोदमें ले लिया ॥ १ ॥ | देखते दैत्य [देवान्तक]-के शरीरसे निकलकर एक तदनन्तर गणोंके स्वामी विनायकने अपने प्रभावसे | ज्योति विनायकमें प्रवेश कर गयी ॥ ८ ॥ सुन्दर पद्मासनमें बैठकर दैत्यराजसे कहा—'अपने सुन्दर | उसका शरीर तीन योजनके वृक्षसमूहों, पर्वतों और वरदानका स्मरण करो' ॥ २॥ | पौधोंको चूर-चूर करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥ तब वह दैत्य उनके दाँतको दोनों हाथोंसे पकड़कर | उसकी ऐसी गति देखकर उसके सैनिक दसों अपने शरीरको अन्तरिक्षमें बार-बार झुलाने लगा ॥ ३॥ | दिशाओंमें भाग गये। उसके शरीरके गिरनेसे कितने ही तब जैसे ही वह देवान्तक दाँतको तोड़कर भूतलपर | सैनिक मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ गिरा, वैसे ही उन सर्वव्यापक देव विनायकने शीघ्रतासे | अपने-अपने स्थानसे आये हुए देवता [विनायकपर] अपने उस दाँतको पकड़ लिया ॥ ४ ॥ | पुष्पवर्षा करने लगे। राजा (काशिराज)-के नगाड़ोंकी उन्होंने उसी दाँतसे देवान्तकके मस्तकपर प्रहार | ध्वनिके साथ देव-दुन्दुभियोंकी भी ध्वनि होने लगी ॥ ११॥ किया और अत्यन्त उच्च स्वरसे गर्जना की, जिससे | दिशाएँ निर्मल हो गयीं और सुखदायक हवा चलने दिशाएँ-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ५ ॥ | लगी, अग्नि तेजयुक्त हो गयी और लोग प्रसन्न हो गये। सम्पूर्ण पृथ्वी और सभी पाताल विचलित हो गये। | प्रतिकूल बह रही नदियाँ सन्मार्गगामिनी हो गयीं। तब इन्द्रादि उस दन्ताघातसे देवान्तकके शरीरके तत्क्षण सैकड़ों | देवताओं और मुनियोंने उनका पूजन किया ॥ १२-१३॥ टुकड़े हो गये। आकाशसे मेघवृष्टिकी भाँति शीघ्र ही | उन्होंने परम भक्तिभावसे देवाधिदेव विनायकका रक्तकी वर्षा होने लगी। पृथ्वीपर निवास करनेवाले सभी | स्तवन किया और कहा—'हे विभो! आपने हमें देवान्तकके