श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७१ ] * काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप * ४३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बन्धनसे मुक्त किया। हे देवेश ! आपने उपेन्द्र* (विष्णु)- के समान कार्य किया है, अतः लोकमें आपकी ख्याति 'उपेन्द्र' नामसे होगी' ॥ १४-१५॥ अब हम लोग अपने-अपने पदोंपर भयरहित होकर रहेंगे। स्वाहा, स्वधा और वषट्कार घर-घरमें होंगे ॥ १६॥ ऐसा कहकर उन सबने विनायकदेवको नमस्कारकर उनकी प्रदक्षिणा की और आज्ञा लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानोंको वापस लौट आये ॥ १७॥ देवताओं और मुनियोंने उनका 'हृषीकेश' ऐसा नामकरण किया और उन्हें प्रणामकर हर्षित मनसे अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ १८ ॥ तदनन्तर सभी राजाओंने विनायकका सम्यक् रूपसे पूजनकर और प्रणामकर उनसे कहा- 'हे देव ! आपने दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार किया, इसलिये आप 'धरणीधर' कहे जायँगे।' ऐसा कहकर वे सब उनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने नगरोंको चले गये। तत्पश्चात् काशिराजने विनायकको देखा, वे बालरूप धारण किये थे और सिंहपर आरूढ़ होकर बालकोंके साथ खेल रहे थे ॥ १९-२१ ॥ बालक [-रूपधारी] विनायकने भी उन राजा (काशिराज)-को देखकर परम आदरसे उनका आलिंगन किया। वे दोनों आनन्दसे परिपूर्ण थे और आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा कर रहे थे॥ २२॥ तदनन्तर राजाने विनायकदेवसे कहा- 'मेरा महान् भाग्योदय हुआ है, जो कि ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगम्य सनातन परब्रह्म हैं, उनका मैं नित्य दर्शन कर रहा हूँ। यह मेरे पूर्वजन्मके पुण्योंके फलका उदय है कि जो विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, और स्वयं कारणरहित हैं, जो वेदान्तवेद्य, नित्य, ग्रह-नक्षत्रोंके प्रकाशक और स्वयं प्रकाशरूप हैं, जो अनेक रूपवाले और निराकार हैं, पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और मनोहर स्वरूपवाले हैं, वे ही बालरूपसे मेरे घरमें स्वेच्छानुसार खेल रहे हैं'॥ २३-२५१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- काशिराजद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुति सुनकर विघ्नराजने आँसुओंको पोंछकर कहा- 'मैं आपसे क्षणभरके लिये भी कभी दूर नहीं जाऊँगा।' ॥ २६१/२ ॥ तब देवान्तकके वधसे हर्षित राजाने उनका अनेक प्रकारसे उपचारोंसे पूजन किया और अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि तथा वन्दिजनोंद्वारा गायी गयी स्तुतियोंके साथ सैनिकोंसहित बालरूप विनायककी स्तुति करते हुए अपने नगरको गये ॥ २७-२८१/२ ॥ वहाँ सभी लोगोंको अनेक प्रकारके वस्त्र देकर तथा कुछको पान देकर [राजाने] विदा किया। तत्पश्चात् विनायकको आगे करके हर्षित मनसे उन्होंने अपने रमणीय भवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'पुरप्रवेश' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
इकहत्तरवाँ अध्याय काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना
ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दूसरे दिन जब राजा काशिराज भद्रासनमें बैठे थे, तब उन्होंने अमात्यों, प्रधान वीरों, वृद्धजनों, मित्रों तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नमस्कार करके अपने मनकी बात बतलायी ॥ १ १/२ ॥ राजा बोले- मैंने अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये विनायकको बुलवाया था। उनके यहाँ आनेपर अनेक उत्पात भी उत्पन्न हो गये, जिनका निराकरण उन्होंने कर दिया। विनायककी माता अदितिसे
* भगवान् विष्णु वामनावतारमें इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिसे प्रकट हुए थे, अतः उन्हें 'उपेन्द्र' कहा गया था; वैसे ही विनायक भी अदितिपुत्र और इन्द्रके अनुज हैं, अतः उन्हें भी उपेन्द्र कहते हैं।