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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 656 में से

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पृष्ठ 440

४३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैंने कहा था कि शीघ्र ही मैं आपके पुत्रको वापस ले | आरूढ़ होकर वाद्योंकी ध्वनिके साथ महर्षि कश्यपजीके आऊँगा, किंतु बहुत-से दिन जल्दी ही बीत गये। अब | श्रेष्ठ आश्रमके लिये प्रस्थान किया ॥ १३-१४ १/२ ॥ सारा लोक स्वस्थ हो गया है, अतः पुत्रके विवाहके | उस समय नगरके सभी लोग अपने-अपने कार्योंको विषयमें आपको विचार करना चाहिये ॥ २-४ ॥ | छोड़कर बाहर निकल आये। उन्होंने भोजन करना, अमात्य बोले— हे महाराज ! आपने ठीक ही कहा | पढ़ना, निद्रा, व्यासंग (नानाविध कर्मोंमें आसक्ति) आदिका है, विघ्नोंके द्वारा विवाह-कार्यमें विलम्ब हो गया है, अब | परित्याग कर दिया और अपनी वेष-भूषाको पहने बिना सब विघ्न दूर हो गये हैं, अतः विवाह-कार्य प्रारम्भ करना | ही वे शीघ्रतासे पुरीसे बाहर निकल आये ॥ १५-१६ ॥ चाहिये। विनायकके कृपा-प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ | उस समय हजारों बालकोंने उन विनायकको जाकर एवं निर्भय हो गया है, अतः अब दूर देशोंमें स्थित | रोक दिया और वे कहने लगे—'आप हमको छोड़कर मित्रजनोंको विवाहकी लग्नपत्रिका भेजनी चाहिये और | क्यों जा रहे हैं, क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं ? आपने विवाहकी सभी सामग्री एकत्रित करनेके लिये दूतोंको | किसी बातचीतके प्रसंगमें पहले हमें कभी नहीं बताया था गाँव-गाँवमें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ | कि 'मैं वापस जाऊँगा', हमारे घरमें भोजन किये बिना ब्रह्माजी बोले— मन्त्रियोंद्वारा कही गयी इस | आप अपने आश्रमको क्यों जा रहे हैं?' ॥ १७-१८ ॥ प्रकारकी बातोंको सुनकर सभी लोग तथा सभामें बैठे | किसी बालकने रोते-रोते उनके चरणकमलको हुए सभासद् कहने लगे—आप लोगोंने बहुत अच्छी बात | पकड़ लिया तो किसीने प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन करके कही है। यह सुनकर राजाको अत्यन्त हर्ष हुआ। उसी | उनके करकमलोंको पकड़ लिया ॥ १९ ॥ दिन उन्होंने ज्योतिषियोंसे विवाहका लग्न दिन निश्चित | नगरीकी स्त्रियाँ, बालिकाएँ तथा युवावस्थाको करवा लिया ॥ ७-८ ॥ | प्राप्त सभी मुग्धा युवतियाँ अस्त-व्यस्त वेषमें ही उन्हें तदनन्तर राजाने मित्रजनोंको बुलवानेके लिये | देखनेके लिये वैसे ही आ पड़ीं, जैसे कि वर्षार्ऋतुमें मांगलिक दूतोंको भेजा और उचित रीतिसे विश्वस्त | समुद्रकी ओर जानेवाली सभी नदियाँ समुद्रकी ओर दूतोंके द्वारा विवाह-सामग्रीको एकत्रित करवाया। तदनन्तर | प्रवाहित होने लगती हैं, जैसे हंस मोतियोंकी राशिकी मगध देशके राजा भी अपनी पुत्रीको लेकर उस नगरीमें | ओर दौड़ पड़ते हैं, और जैसे मरुद्गण देवराज इन्द्रकी आये और सभी मित्र तथा सम्बन्धी भी नाना दिशाओंसे | ओर चल पड़ते हैं ॥ २०-२१ ॥ वहाँ उपस्थित हुए ॥ ९-१० ॥ | वे स्त्रियाँ अत्यन्त प्रीतिसे समन्वित होकर कहने उन्होंने परस्पर एक-दूसरेको अनेकों उपहार प्रदान | लगीं—'हे विनायक ! आप अकस्मात् स्नेहका परित्यागकर किये। काशिराज तथा मगधके राजाने देवताओंकी स्थापना | क्यों जा रहे हैं? आज आप इतने निष्ठुर कैसे हो गये की और बड़े-बड़े महोत्संवोंका आयोजन किया। उन्होंने | हैं?' ॥ २२ ॥ बड़े ही प्रयत्नपूर्वक विवाहकी समस्त विधियोंका सांगोपांग | ब्रह्माजी बोले—थके हुए, दौड़ते हुए, फिसलते सम्पादन किया और धन आदिके प्रदानके द्वारा ब्राह्मणों | हुए तथा गिरते हुए उन सभी जनोंको देखकर राजासहित तथा अन्य लोगोंको सन्तुष्ट किया ॥ ११-१२ ॥ | विनायक रथसे उतर पड़े ॥ २३ ॥ तदनन्तर काशिराजने सभी मित्रगणोंको विदा करके | राजाके साथ नगरसे शीघ्र ही बाहर आये वे उबटनका अनुलेपन एवं स्नान कराकर विविध प्रकारके | विनायक एक मुहूर्त वहीं ठहरकर उन सभीसे बोले— श्रेष्ठ आभूषणों तथा वस्त्रोंसे विनायकको सुसज्जित किया | 'इस समय मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ऊपर और अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उन्हें भोजन कराया। | कृपा करना न छोड़ें, आप लोगोंके घर आकर वहाँ जो इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ काशिराजने विनायकके साथ रथमें | अपराध मुझसे हुए हैं, उन्हें आप क्षमा कर दें। यदि आप

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