श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 656 में से
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क्री०ख०-अ०७२ ] * विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन * ४३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] लोगोंका पुनः दर्शन होगा, तो आप मुझे पहचाननेमें भूल न करें।' उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शोकमें निमग्न समस्त पुरवासियोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे ॥ २४-२६१/२ ॥ लोग बोले—'आप समस्त जगत्के पिता हैं, सबपर दया दिखानेवाले हैं, किंतु हमपर आपकी कुछ भी ममता नहीं है। बालक कितने भी अपराध करनेवाले क्यों न हों, पिता कभी भी उनका परित्याग नहीं करते। चन्द्रमा कभी उष्ण नहीं होता और सुवर्ण कभी नीला नहीं हो जाता, फिर क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं और क्यों जानेके लिये इतनी उतावली कर रहे हैं? यदि पहले आप यहाँ आये ही नहीं होते तो आज हमें जो विरहजन्य शोक हो रहा है, वह नहीं होता ॥ २७-२९ ॥ हम सभीके मनको चुराकर आप चले क्यों जा रहे हैं, हमारे मनको [आपके द्वारा] ले लिये जानेपर हम सब मनके बिना कैसे कार्य करेंगे? जलके विनष्ट हो जानेपर जलचर जीव कैसे जीयेंगे, यह आप हमें बताइये, प्राण चले जानेपर हमारे शरीरका क्या प्रयोजन है? यदि ईखसे विष निकलने लगे तो फिर उसका क्या प्रतिकार है? इसलिये आप हम किंकरोंको भी अपने साथ वहीं ले चलें, जहाँ आप जा रहे हैं' ॥ ३०-३२ ॥ उनके वचनोंको सुनकर वे विनायक अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए उन सभी स्त्रियों, वृद्धों एवं बालकोंसे गद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३३ ॥
[दायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] **विनायकदेव बोले—**आपको कभी भी दुखी नहीं होना चाहिये। आपलोगोंको मेरा वियोग कभी नहीं होगा; क्योंकि मैं सबकी अन्तर्आत्मामें निवास करनेवाला हूँ, विनाशरहित हूँ और आनन्दस्वरूप हूँ। मुझ निराकारका केवल चिन्तनमात्र करनेसे आपके मनका समाधान नहीं होगा, अतः आप लोग अपने-अपने घरमें मेरी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करें। हे सज्जनो! आप लोग जब संकटमें पड़ें, तब आप मेरा स्मरण करें, मैं आप लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और आप लोगोंके संकटका विनाश करूँगा ॥ ३४-३६ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**उनका वचन सुनकर सभी नगरनिवासी अत्यन्त आनन्दित हो गये। उन्होंने देव विनायकको प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा करके जय- जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर सभी पुरवासी जन अपने-अपने घरोंको चले गये, देव विनायक भी माताके दर्शनकी लालसासे शीघ्र ही रथपर आरूढ़ होकर काशिराजके साथ आगे चल पड़े ॥ ३८१/२ ॥ विनायकने मुँह घुमाकर पीछे नगरनिवासी बालकोंकी ओर देखा, वे रो रहे थे। उनसे विनायकने कहा—'मैं पुनः आऊँगा, तुम लोग जाओ, तुम्हें कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं सत्य बोल रहा हूँ, कभी भी मैं झूठ नहीं बोलता।' इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्हें लौटाकर वे क्षणभरमें ही अपने आश्रममें जा पहुँचे ॥ ३९-४० ॥
[अध्याय समाप्ति पुष्पिका] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आश्रमकी ओर प्रस्थान' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥
बहत्तरवाँ अध्याय विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन, काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन
[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] **ब्रह्माजी बोले—**काशिराजके दूतने विनायककी माता देवी अदितिसे यह पहले ही बता दिया था कि वे विनायक काशिराजके साथ रथमें बैठकर यहाँ आ रहे हैं। तदनन्तर वियोगसे व्यथित हुई वे अदिति शीघ्र ही
[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] दौड़ती हुई आगेको गयीं। उत्सुकतावश शीघ्रतामें दौड़ते हुए वे यह भी नहीं जान पायीं कि उनका उत्तरीय वस्त्र गिर पड़ा है ॥ १-२ ॥ माताको देखकर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक