भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 656 में से

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पृष्ठ 442

४४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और माताके समीप चले आये, माताने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया॥ ३॥ देवी अदितिके आनन्दाश्रु निकल पड़े। बहुत समय बाद आनेके कारण विनायक भी आँसू बहाने लगे। मुहूर्तभरके लिये वे दोनों उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गये, जैसे जलमें जल मिलकर एक हो जाता है॥ ४॥ तदनन्तर स्नेहसे स्वच्छचित्त हुई माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उनके आँसू पोंछकर वे बोलीं—'तुम बहुत दिनोंसे थके हुए हो।' तदनन्तर काशिराजने अदितिको प्रणाम किया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे॥ ५॥ राजा बोले—देव विनायकको [मेरे साथ] यहाँसे गये हुए बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, इसके निमित्त हे मातः! आप मुझपर क्रोध न करें। हे कश्यपप्रिया! मैं इन विनायकका वियोग सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ६-७॥ अमृतसे कभी तृप्ति नहीं होती और खजानेके प्रति कोई उदासीन नहीं होता। ये विनायक हमारे घरमें दिन- प्रतिदिन नित्य नया-नया प्रेम बढ़ाते रहे हैं॥ ८॥ हमारे नगरमें होनेवाले बहुत-से उत्पातोंका इन्होंने निवारण कर दिया है। असंख्य दैत्योंका वध कर डाला है। इससे देवताओंको भी अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई। इन्होंने महान् यश अर्जित किया है और धर्मसेतुकी स्थापना की है। इन्होंने इस प्रकारका पौरुष दिखलाया है, जैसा कि इन्द्र आदि देवता भी नहीं दिखला पाये॥ ९-१०॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार काशिराजने सारा वृत्तान्त उन्हें बतलाया। तदनन्तर माता अदितिने दुष्ट जनोंकी दृष्टि (नजर) लगनेसे होनेवाले उत्पातकी शान्तिके लिये बालक विनायकके सिरके ऊपर दही और अन्न (सरसों आदि)-को घुमाकर घरके बाहर फेंका। तदनन्तर वे बालक विनायकको काशिराजसहित अपने आश्रममण्डलमें ले गयीं॥ ११-१२॥ अपने पुत्र विनायकको काशिराजके साथ आया देखकर मुनि कश्यप बाहर चले आये, उन दोनोंने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक मुनिको प्रणाम किया॥ १३॥ तदनन्तर मुनि कश्यपने उन दोनोंका आलिंगन किया

और पुत्र विनायकके सिरको सूँघकर तथा उसे गोदमें बैठाकर रुँधे हुए कण्ठसे वे कहने लगे—हे काशिराज! आपने बालकको ले जाकर वापस लानेमें विलम्ब किया, यह ठीक नहीं किया। आप 'शीघ्र ही वापस ले आऊँगा' कहकर, इसे क्यों ले गये थे? हे राजन्! इसके वियोगमें संतप्त मेरे अंगोंको बड़े ही पुण्यसे अभी इसका दर्शनकर शीतलता प्राप्त हो रही है॥ १४-१६॥ ब्रह्माजी बोले—तब काशिराजने मुनि कश्यपके वचनामृतका पान करके तथा उनकी आज्ञा प्राप्तकर सुन्दर आसनपर बैठकर कहना प्रारम्भ किया॥ १७॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! इन विनायककी ही माया अर्थात् सामर्थ्यके कारण मुझे [स्व-स्वरूपकी] सत्यताका बोध हुआ। इन देवदेवने मेरे घरको निश्चित रूपसे अपना घर बना लिया। हे मुने! ये विनायकदेव सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं और ये अपनी इच्छाओंके वशीभूत हैं अर्थात् नित्य स्वतन्त्र हैं। मेरे पुत्रका विवाह सम्पादित कराकर ये यहाँ आये हैं॥ १८-१९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने उन विनायकद्वारा किये गये दैत्योंके वध आदि समस्त कर्मोंको उन्हें बतलाया। यह सुनकर वे मुनि कश्यप तथा उनकी पत्नी देवी अदिति अपने पुत्र विनायकका पराक्रम तथा उनके बहुतसे गुणोंके विषयमें जानकर बहुत प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् उन सभीने बड़े ही आदरपूर्वक छः रसोंसे सम्पन्न व्यंजनोंका भोजन किया॥ २०-२१॥ इसके बाद मुनि कश्यपने उन काशिराजको आशीर्वाद प्रदानकर उन्हें विदा किया। राजाने भी उन सभीको प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करते हुए उनकी अनुमति प्राप्तकर दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए बड़े दुखी मनसे उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ २२१/२॥ उन विनायकके गुणगणोंका स्मरण करते हुए स्नेहसे परिपूर्ण काशिराजने वाद्योंकी ध्वनिके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया। विनायकदेवको देखनेकी इच्छावाले नगरके सभी लोग तथा बालक वहाँ आये, किंतु उन्होंने वहाँ उन्हें नहीं देखा, तो वे अत्यन्त दुखी मनवाले हो गये। वे उन काशिराजको अकेला देखकर अपने-अपने