श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७२ ]
* विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन *
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[बायाँ स्तम्भ]
घरोंको चले गये ॥ २३-२५ ॥ दूसरे दिन सभी नागरिकोंने राजासे अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पूछा—'हे राजन्! उन विनायकदेवने 'पुनः आऊँगा'— ऐसा कहा था, तो फिर वे क्यों नहीं आये? आप भी बड़े ही निष्ठुर बनकर उन्हें छोड़कर यहाँ कैसे चले आये' ॥ २६१/२ ॥ राजा बोले—मेरे द्वारा बार-बार प्रार्थना किये जानेपर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक मुझसे कहने लगे—'आप सभी लोग मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक स्थापना करके उसकी सेवा-पूजा करें। सबके हृदयमें स्थित रहनेवाले मुझे अन्तर्यामीका आप लोगोंसे वियोग किसी प्रकार भी नहीं हो सकता' ॥ २७-२८ ॥ तदनन्तर नगरवासियोंने विनायककी धातुनिर्मित अत्यन्त शुभ मूर्तिका निर्माण करवाया। वह प्रतिमा चार भुजावाली थी। उसके तीन नेत्र थे। वह सभी प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित थी। उसके कान शूर्पके समान थे। मुख हाथीके समान था। उसके शरीरके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे। पुरवासियोंने उसका 'ढुण्डिराज' यह नाम रखा और बड़े ही आदरभावसे ऋत्विजों, ब्राह्मणों तथा अन्य वेदशास्त्रमें पारंगत विद्वानोंद्वारा उसकी स्थापना करवायी ॥ २९-३०१/२ ॥ उन्होंने एक उत्तम मन्दिर बनवाया और उसमें उन विनायककी प्रतिदिन वे पूजा करने लगे ॥ ३१ ॥ जिस-जिसके द्वारा भी जिस-जिस कामनासे विनायककी पूजा की जाती, भक्तिपूर्वक पूजित हुए वे प्रभु विनायक उस-उस व्यक्तिकी उन-उन कामनाओंको उन्हें प्रदान करते ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विविध स्वरूपोंको धारण करनेवाले वे विनायक वहाँ सुशोभित हुए। जब सभी देवताओंके साथ भगवान् विश्वनाथ अपनी नगरी काशीपुरीमें चले आये और काशिराज दिवोदास अविमुक्तक्षेत्रमें सुखपूर्वक निवास करने लगे, तब वे विनायक अपने पिता मुनि कश्यप तथा माता अदितिसे कहने लगे ॥ ३३-३४ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
प्राचीन कालमें तपस्याके द्वारा आराधित होनेपर मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ था। मैंने पृथ्वीके भारको भलीभाँति दूर कर दिया है तथा तीनों लोकोंको पीड़ित करनेवाले महाबली दुष्ट दैत्यों देवान्तक तथा नरान्तकका वध कर डाला है। मैंने देवताओं तथा साधु- सन्तोंकी रक्षा की है और देवताओंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया है, अब इस समय मैं अपने शाश्वत लोकको जाऊँगा ॥ ३५-३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—विनायकके ऐसे वचनोंको सुनकर अदिति तथा कश्यपको बड़ा दुःख हुआ। वे गद्गद कण्ठसे उनसे कहने लगे—'हे देव! हम दोनोंको पुनः आपका दर्शन कब प्राप्त होगा?' तब वे माता अदितिसे बोले—'हे मातः! भवानीके मन्दिरमें शीघ्र ही मेरा दर्शन आपको होगा। यह मेरा सत्य एवं प्रिय वचन है' ॥ ३७-३८१/२ ॥ विनायककी यह बात सुनकर जबतक वे कुछ बोलतीं, उससे पहले ही वे अन्तर्धान हो गये। तब वे दोनों खिन्न मनवाले हो गये। भक्तिपरायण उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिर बनवाया और एक मूर्ति बनवायी। उस मूर्तिका 'विनायक' यह नाम रखा। उस मूर्तिका ध्यान करनेमात्रसे वे सर्वव्यापक एवं विविध रूपधारी विनायक प्रभु नित्य ही साक्षात् दर्शन देते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥ इस प्रकारसे मैंने भगवान् विनायकका अत्यन्त मंगलकारी चरित्र आपको बतलाया। यह आख्यान सुननेमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। कृतार्थ करनेवाला है। यश प्रदान करनेवाला है। आयुष्य प्रदान करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाला है। यह सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके संचित पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ४२-४३१/२ ॥ अब मैं आपको सिन्धु दैत्यके वधके लिये शिवके घरमें मयूरेश्वर नामसे अवतरित हुए देव विनायकके विषयमें बतलाऊँगा। जिन्होंने कि बाल्यकालसे ही अत्यन्त अद्भुत नाना कर्मोंको किया था ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके चरित्रोंका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥