भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 656 में से

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पृष्ठ 444

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४४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिहत्तरवाँ अध्याय गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति, रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे पितः ! भगवान् शिवके घरमें विनायकदेव मयूरेश्वर नामसे कैसे अवतीर्ण हुए? उनके अवतीर्ण होनेका प्रयोजन क्या था और उन्होंने कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? उन विनायकका 'मयूरेश्वर' यह नाम क्यों पड़ा? यह सब आप मुझे बतलाइये। सुननेपर भी मुझे कभी तृप्ति प्राप्त नहीं हो रही है॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले- प्राचीन कालमें त्रेतायुगकी बात है, सिन्धु नामक एक महान् दैत्य उत्पन्न हुआ था। उसे भगवान् शिवके घरमें अवतरित हुए उन बलिष्ठ विनायकने मारा था। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो शौनक मुनि तथा राजा चक्रपाणिके मध्य हुए संवादके रूपमें है॥ ३-४॥ मैथिलदेशके गण्डकी नामक शुभ नगरमें एक राजा हुए थे, जो चक्रपाणि इस नामसे विख्यात थे और साक्षात् दूसरे विष्णुभगवान्‌के समान ही थे॥ ५॥ इनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। उन्होंने अपने तेजके द्वारा भगवान् सूर्यको भी निस्तेज बना दिया था तथा अपने लावण्यके द्वारा कामदेवको भी तुच्छ बना दिया था। अपनी बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिको भी जीत लिया था और अपने बल एवं पराक्रमके द्वारा कार्तिकेयको भी पराजित कर दिया था। इन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षणभरमें अपने अधीन कर लिया था। सभी राजा इनकी सेवामें उपस्थित रहते थे॥ ६-७१/२॥ इस पृथ्वीमें विद्यमान, विजयकी इच्छा रखनेवाले उनके अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों तथा रथारोही सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। उनके भवनमें साक्षात् लक्ष्मी स्थित होकर दर्शन देती थीं ॥ ८-९ ॥ उन नरेशका भद्र (राजसिंहासन) रत्न, सुवर्ण तथा मोतियोंके द्वारा दिशाओंको उद्भासित करनेवाला और लोकका कल्याण करनेवाला था एवं [उस राजसिंहासनसे समन्वित वहाँका सभाभवन] अलकापुरीके समान [शोभामय] था॥ १०॥ उन राजाके दो महाबुद्धिमान् अमात्य थे, एकका नाम था साम्ब तथा दूसरेका नाम था सुबोधन। वे अपने स्वामीकी सेवा किया करते थे और उनके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राणोंको तृणके समान समझते थे। उस राजाकी उग्रा नामवाली एक रानी थी, जो अत्यन्त रमणीय तथा सुन्दर मुसकानवाली थी। उसके मुखचन्द्रकी कान्तिसे दिनमें ही कुमुद खिल उठते थे ॥ ११-१२॥ वह धारण किये हुए अपने अनेक आभूषणोंकी दीप्तिसे समस्त तमोराशिको विनष्ट कर देती थी। उसके पातिव्रत्यके अनुकरणीय गुणोंको देखनेके लिये सभी पतिव्रता स्त्रियाँ उसके समीप आती थीं ॥ १३ ॥ इस प्रकारके अत्यन्त बुद्धिमान् वे राजा चक्रपाणि सबके लिये मान्य तथा सर्वदा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें परायण रहते थे। पुराणोंके कथाश्रवणमें उनका अत्यन्त अनुराग था और वे धर्मशास्त्रपरायण थे ॥ १४ ॥ सन्तानसे रहित होनेके कारण वे रात-दिन अत्यन्त दुखी रहते थे। यद्यपि उन्होंने सन्तानकी प्राप्ति तथा उसके जीवित रहनेके लिये अनेक व्रतोंका पालन किया, विविध दान दिये और बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया, किंतु उनके जो-जो सन्तति होती, वह तत्क्षण ही मृत्युको प्राप्त हो जाती थी ॥ १५१/२॥ तदुपरान्त एक दिनकी बात है, राजा अपनी राज्यसम्पदासे जब अत्यन्त विरक्त हो गये तो उन्होंने अपनी भार्यासहित दोनों साम्ब तथा सुबोधन नामक

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