श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७३ ] * गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान * ४४३
अमात्यों और पुरवासियोंको बुलाया तथा उन सबसे कहा—'इस समय मैं अब अपने दण्ड (सैन्यदल), राजकोश तथा राज्यका परित्याग कर रहा हूँ। पुत्रसे हीन होनेसे स्वर्गसे हीन हुए मेरा अब राज्यसे क्या प्रयोजन ? पुत्रप्राप्तिके लिये मैंने जो-जो भी कर्म किये थे, यदि वे कर्म ईश्वरार्पणबुद्धिसे किये होते, तो हम दोनोंको मोक्ष भी प्राप्त होता और पूर्वजन्मोंमें किये कर्मोंके बन्धन भी विनष्ट हो जाते ॥ १६—१९॥
हे जनो ! मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया। अब मैं इसी समय [राज्यसम्बन्धी] सभी दायित्व मन्त्रियोंको सौंपकर प्रसन्नतापूर्वक वन जाऊँगा। आप लोग भी उन मन्त्रियोंकी आज्ञाका पालन करें ॥ २० ॥
हे सज्जनो ! मैं अपने आत्मकल्याणकी दृष्टिसे तपस्या करनेके लिये वनमें जाऊँगा। यदि मुझे अपने अभीष्टकी प्राप्ति हो जाती है, तो पुनः मैं अपनी नगरीमें चला आऊँगा। हे लोगो ! इस समय अब आप लोग मुझे निश्चित ही आज्ञा प्रदान करें' ॥ २११/२ ॥
राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी दुखी मनवाले हो गये। आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे लोग उन नृपश्रेष्ठसे बोले— ॥ २२१/२ ॥
पुरवासीजन बोले— हे प्रभो ! आप ही हमारी माता हैं और आप ही पिता भी हैं। फिर आज ऐसी निष्ठुरता क्यों दिखा रहे हैं ? बिना अपराधके आप हमारा परित्याग क्यों कर रहे हैं ? आपके बिना हमारा जीवन वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कि माताके बिना शिशुका जन्म व्यर्थ होता है। हे प्रभो ! आप जहाँ जा रहे हैं, हम सब भी वहीं चलेंगे ॥ २३-२४॥
ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे जब नगरनिवासी लोग राजासे वार्तालाप कर ही रहे थे कि उसी समय मुनिश्रेष्ठ शौनकजी वहाँ आ पहुँचे। वे साक्षात् दूसरी अग्निके समान थे ॥ २५ ॥
वे सभी वेदों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगों एवं सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, तीनों लोकोंमें विख्यात, देवराज इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा वन्दनीय तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंके ज्ञाता थे ॥ २६॥
उनको अपने समक्ष देखकर राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने उन्हें प्रणाम किया। राजाने अपने राजसिंहासनपर उन्हें बैठाया और परम प्रसन्नताके साथ उनकी पूजा की ॥ २७ ॥
भोजन ग्रहण कर चुके हुए तथा संवाहन (दबाने) आदिके द्वारा पैरोंकी सेवा हो जानेपर विश्रामको प्राप्त हुए उन मुनिश्रेष्ठ शौनकजीसे राजा चक्रपाणिने कहा— 'मेरा कौन-सा पुण्य फलीभूत हुआ है, जो आज मुझे आपका वह दर्शन प्राप्त हुआ है, जो सभी पापोंका हरण करनेवाला, अत्यन्त मंगलदायक, मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा पापीजनोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ?' ॥ २८-२९ ॥
तदनन्तर मुनि शौनक नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिसे बोले— मैं आपकी परम भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा आत्मसंयमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३० ॥
शौनक बोले— हे राजेन्द्र ! आप कोई चिन्ता न करें और न राज्यका ही परित्याग करें। आपको मेरे वचनके अनुसार निश्चित ही पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने आजतक कभी भी परिहासतकमें मिथ्या वाणी नहीं बोली ॥ ३११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— मुनिका यह वचन सुनकर राजश्रेष्ठ चक्रपाणि अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उन्हें रत्नों तथा सुवर्णसे बने हुए अनेकों आभूषण और अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रोंको समर्पित किया, किंतु मुनि शौनकने कुछ भी ग्रहण नहीं किया ॥ ३२-३३॥
तदनन्तर वे मुनि शौनक राजासे बोले— हम लोग वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाले हैं। सभी प्रकारके सुख-भोगोंमें किसी भी प्रकारकी आसक्ति नहीं रखते। सभी प्राणियोंके कल्याणमें निरत रहते हैं। सृष्टि तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। दयाके सागर हैं। साधुपुरुषोंके दर्शनकी अभिलाषा करते रहते हैं। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं। विद्वानोंके पास लक्ष्मी कभी भी नहीं रहती। इसी कारण मैं आपके द्वारा प्रदत्त इस सुवर्ण तथा सुन्दर वस्त्रको ग्रहण नहीं करूँगा ॥ ३४-३६॥