श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 656 में से
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४४४ [थ्रीगणेशपुराण- [५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५ तीर्थयात्राके प्रसंगमें मैं आपके पास आया था। आपके दर्शन किये हुए मेरे बहुत दिन व्यतीत हो गये थे ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर पुनः उन दम्पती-राजा तथा रानीने भलीभाँति उन मुनि शौनकको प्रणाम किया और सन्तानकी प्राप्तिके विषयमें समर्थ उपाय पूछा ॥ ३८॥ तब शौनकमुनिने सभी प्रकारके व्रत, तप, यज्ञ तथा दानोंको वृथा जानकर उनसे उस सौर व्रतको करनेके लिये कहा, जो मनुष्योंको सब प्रकारके पदार्थोंको प्रदान करनेवाला, अनेकों जन्मोंके संचित पापोंका शमन करनेवाला तथा पुत्र एवं पौत्रको देनेवाला है ॥ ३९१/२॥ शौनकमुनि बोले-सूर्यसप्तमीसे आरम्भ करके एक मासतक यह व्रत करना चाहिये। [उसमें सर्वप्रथम] मातृकापूजन करके आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। गणेशजीका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ सुवर्णकलशके ऊपर सुवर्णका सूर्यमण्डल बनाकर स्थापित करे और भक्तिभावसे समन्वित होकर षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन करे ॥ ४२ ॥ लाल चन्दनमिश्रित तण्डुलों, लाल रंगके फूलों, विविध प्रकारके रक्त वर्णके रत्नों तथा अनेक प्रकारके फलों, बारह अर्घों, नमस्कारों तथा प्रदक्षिणाओं, स्तुतियों एवं प्रार्थनाओंके द्वारा परमेश्वर सूर्यनारायणकी प्रार्थना करे॥ ४३-४४॥ तदनन्तर भगवान् सूर्यको स्वयं एक लाख बार प्रणाम करे अथवा [ब्राह्मणोंद्वारा] करवाये। परम प्रसन्नताके साथ प्रतिदिन एक लाखकी संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वेदज्ञ कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रतिदिन एक गौका दान करे। हे नृपश्रेष्ठ ! व्रतके समापनपर्यन्त सपत्नीक ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥ ४५-४६॥ दयाभावसे युक्त होकर दीनों, अन्धों तथा निर्धनोंको अन्न प्रदान करे। मासके अन्तमें सभी सामग्रियोंको ब्राह्मणको निवेदित कर दे॥ ४७ ॥ हे राजन् ! इस प्रकार सौरव्रतका अनुष्ठान करनेसे मेरी कृपासे आपको पुत्रकी प्राप्ति होगी, वह महान् यशस्वी, सूर्यकी भक्तिसे समन्वित तथा पुण्यात्मा होगा ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सौर व्रतके विधि- विधानका उपदेश देकर मुनि शौनक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने उस व्रतको उसी प्रकार किया, जिस प्रकारका कि उन्हें उपदेश प्राप्त हुआ था ॥ ४९ ॥ अपनी पत्नीके साथ विनीतात्मा राजाने सूर्यभक्तिपरायण होकर वह व्रत किया और प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार भोजन कराया ॥ ५० ॥ इस प्रकार पत्नीके साथ उपवास करते हुए राजाको एक मासका समय व्यतीत हो गया। राजाने प्रतिदिन गोदान किया और भगवान् सूर्यको एक लाख नमस्कार किया तथा ब्राह्मणोंसे भी करवाया ॥ ५१ ॥ वे प्रतिदिन भगवान् सूर्यके मन्त्रका जप करते थे और सदा ही उनके नामका जप किया करते थे। तदनन्तर एक दिनकी बात है, उनकी रानीने रात्रिमें स्वप्नमें भगवान् सूर्यको अपने पतिके सुन्दर रूपमें देखा। कामदेवके समान उनका मनोरम रूप देखकर रानीने उनके साथ रमणकी अभिलाषा की ॥ ५२-५३॥ संतप्त अंगोंवाली वे उनसे बोलीं- 'इस समय काम मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है, मैं शरीरमें विद्यमान ऋतुकालीन अग्निसे दग्ध हो रही हूँ ॥ ५४ ॥ हे स्वामिन् ! अतः मुझे सहवास प्रदान करें, अन्यथा मेरी मृत्यु निश्चित है।' तब उसके पति राजा चक्रपाणिको सन्तानोत्पादनकी शक्तिसे विहीन और रानीको सकाम जानकर उसके पतिके स्वरूपको धारण किये हुए भगवान् सवितादेवने उसे ऋतुदान किया। इसके अनन्तर जब रानी निद्रासे जागी तो उसने अपने पतिको जगाया और उनसे बोली - ॥ ५५-५६ ॥ 'हे स्वामिन् ! आपने ब्रह्मचर्य नियम-पालनमें स्थित रहते हुए भी मेरे साथ सहवास क्यों किया ?' तब राजा उनसे बोले- 'हे शुभे ! मेरा मन तो व्रतके नियमोंमें लगा हुआ है, मैं निरन्तर उपवासमें रहनेके कारण क्षीण शक्तिवाला हो गया हूँ और मैं भगवान् सूर्यकी भक्तिमें परायण हूँ। मैंने तुम्हारे साथ रमण नहीं किया' ॥ ५७१/२ ॥ तदनन्तर पतिव्रता रानी पुनः उनसे बोली- मैं तो आपके अतिरिक्त और किसी पुरुषको किसी प्रकार भी नहीं जानती हूँ। मैं आपके ही स्वरूपमें भगवान्