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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 656 में से

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पृष्ठ 447

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४५ सूर्यका ध्यानकर व्रतमें स्थित हुई हूँ। अतएव निश्चय ही आपके रूपमें आये सूर्यदेवने ही मुझे ऋतुदान दिया है। तब राजा चक्रपाणिने प्रियभाषिणी अपनी रानीसे पुनः कहा॥ ५८-५९॥ राजा बोले-हे प्रिये ! वे भगवान् सूर्य हमारे द्वारा किये गये नमस्कारों, ब्राह्मण-भोजन, गोदान, उपवास तथा जपसे अत्यन्त सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं। लगता है उन्होंने हमें सिद्धि प्रदान की है, अब निश्चित ही तुमको पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ६०१/२॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर दिन-प्रतिदिन रानीका गर्भ वृद्धिको प्राप्त होने लगा और उसका शारीरिक ताप भी बढ़ने लगा। वह बार-बार मूर्च्छित-सी होने लगी। तब वह अपने शरीरमें शीतल चन्दन तथा खस लगाने लगी और समस्त अंगोंमें कपूरका लेपन करने लगी। किंतु इन उपायोंसे उसका वह ताप नष्ट नहीं हुआ ॥ ६१-६२॥ गीले वस्त्रोंद्वारा ठण्डी हवा करनेपर भी उसकी उष्णता कम नहीं हुई। तब उसने अपनी सखियोंके साथ जाकर सिन्धुके तटपर उस महान् गर्भका परित्याग कर दिया। तदुपरान्त वह स्वस्थ होकर अपनी सखियोंके साथ अपने भवनमें चली आयी। उसने अपने पतिको उस गर्भको परित्यक्त करनेकी बात बता दी और वह अपने गृहकार्यमें संलग्न हो गयी ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥ चौहत्तरवाँ अध्याय राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना और उनसे विभिन्न वरोंकी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणिकी रानीके द्वारा समुद्रमें उस गर्भके छोड़ दिये जानेपर उस गर्भसे एक बालक उत्पन्न हुआ, जो महान् बलशाली, तेजसम्पन्न, विकराल मुखवाला, विस्तृत मस्तकवाला एवं तीन नेत्रोंवाला था। वह लाल रंगके बालोंकी जटाओंसे सम्पन्न था। उसने हाथमें चक्र तथा त्रिशूल लिया हुआ था। उस बालकके रुदनसे तीनों लोक काँप उठे ॥ १-२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस बालकके हाथ घुटनोंतक लम्बे थे। उसने तीनों लोकोंपर आक्रमणकर उनपर विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा की। उस बालकके भयसे समुद्री जीव-जन्तुओंसहित समुद्र क्षुब्ध हो उठा, समुद्रमें स्थित उस बालकने समुद्रको सुखा- सा डाला ॥ ३१/२ ॥ समुद्र बोला- यह राजपुत्र सूर्यदेवसे समुत्पन्न है, इसे मैं राजदरबारमें ले जाऊँगा ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वह द्विजरूपधारी समुद्र उस बालकको लेकर राजभवनमें गया और राजा तथा रानीके आगे उसे रखकर वह कहने लगा ॥ ५ ॥ [हे राजन्!] आपकी पत्नीने अपने गर्भके दुस्सह होनेके कारण मेरे अन्दर वह गर्भ छोड़ दिया था। उसी गर्भसे यह अत्यन्त उग्र बालक उत्पन्न हुआ है, जो सम्पूर्ण लोकके लिये महान् भय उत्पन्न करनेवाला है। इसने उत्पन्न होते ही मुखसे जो पहली ध्वनि की, उससे तीनों लोक काँप उठे। इसे मैं अपनी आँखोंसे देखतक नहीं सकता, अतः मैं इसे यहाँ आपके पास ले आया हूँ ॥ ६-७ ॥ ऐसा कहकर बालकको वहाँ छोड़कर वह समुद्र अन्तर्हित हो गया। तब राजभार्याने उसे दोनों हाथोंसे पकड़कर अपनी गोदमें बैठा लिया और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उस बालकको प्रेमपूर्वक स्तनपान कराया। पुत्रके दर्शनसे वे दोनों राजा एवं रानी उसी प्रकार अत्यन्त आनन्दित हुए, जैसे कि चिरकालतक योग-साधनामें निरत रहनेवाला साधक ब्रह्मरूपी अमृतको पाकर आनन्दित होता है ॥ ८-९१/२ ॥ तदनन्तर राजाने ब्राह्मणों तथा अपने मित्रगणोंको आमन्त्रण करके बुलवाया। राजा तथा रानीने उसका यथाविधि जातकर्म-संस्कार करवाया और ज्योतिर्विदोंके साथ परामर्श करके उस बालकका 'सिन्धु' यह मंगलदायक नाम रखा। तदनन्तर हर्षसमन्वित हुए राजाने अनेकों ब्राह्मणोंको अनेकविध दान तथा विविध वस्त्र प्रदान किये ॥ १०-१२॥