श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उस समय नगर अनेक प्रकारकी पताकाओंसे अलंकृत था और सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे। राजाने घर-घरमें शर्करा भिजवायी। सभी लोगोंके चले जानेपर राजा और रानीने स्नेहवश पुकारनेके लिये उसका 'रक्तांग' यह नाम रखा। तदनन्तर दोनों अमात्योंने कहा—'चूँकि यह उग्राका पुत्र है और उग्र मुद्रा धारण करनेवाला है, अतः यह 'उग्रेक्षण' इस नामसे भी प्रसिद्ध होगा' ॥ १३-१५॥ नगरनिवासियोंने उसका 'विप्रप्रसादन' यह नाम रखा और उन सभी पुरवासियोंने राजाको अनेक-अनेक प्रकारकी भेंट प्रदान की। राजाने भी उस समय उन सभीको उपहार प्रदान किये। वह बालक उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्ल पक्षमें दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा वृद्धिको प्राप्त होता है॥ १६-१७॥ जिस प्रकार वायुके वेगसे अग्नि क्षणभरमें ही बढ़ने लगती है, वैसे ही वह बालक अपने तेजके प्रभावसे बढ़ता हुआ आकाशमण्डलका स्पर्श करने लगा ॥ १८ ॥ दिन-प्रतिदिन खेल-खेलमें वह बालक घरके समीपके बहुतसे वृक्षोंको बायें हाथकी हथेलीसे उखाड़कर गिरा देता था। जंगलमें क्रीडा करते हुए उसने पर्वतों तथा वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला। ऐसे ही एक बार उसने चन्द्रमें दिखायी देनेवाले हिरणको उछलकर क्षणभरमें पकड़ लिया ॥ १९-२०॥ एक बार किसी हथिनीके द्वारा जलमें उतरनेके ही मार्गको अवरुद्ध कर दिये जानेपर इस बालकने मुष्टिकाके प्रहारसे उसके गण्डस्थलको भेद डाला, जिससे वह गिर पड़ी। उसके इस प्रकारके अद्भुत कर्मोंको देखकर लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये। उसके अतिमानवीय बल-पराक्रमको देखकर उसके माता और पिता अत्यन्त प्रसन्न थे॥ २१-२२॥ इस प्रकारके कर्मोंको करता हुआ वह सिन्धु नामक महाबली बालक वृद्धिको प्राप्त होने लगा। तदुपरान्त [एक दिन] वह अपने पितासे बोला कि हे राजन् ! मैं तप करनेके लिये जाता हूँ। मैं तपके अनुष्ठानके द्वारा स्वर्गलोक, भूलोक तथा रसातललोकपर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लूँगा। मेरा ऐसा मानना है कि यहाँ घरपर रहकर तो मेरी आयु व्यर्थ ही बीत जायगी ॥ २३-२४॥ उसका ऐसा वचन सुनकर उसके माता-पिता उससे बोले— [हे वत्स!] पिता अपने पुत्रके उत्कर्षके लिये नित्य ही प्रार्थना किया करते हैं और तुम्हारी माता भी व्रत, दान, उपवास-पूजा आदिके द्वारा सभी देवताओंको मनाती ही रहती हैं। इस प्रकारसे उनकी अनुमति प्राप्तकर उन्हें प्रणामकर वह वनकी ओर चल पड़ा ॥ २५-२६ ॥ वहाँ घूमते हुए उसने कमलोंसे समन्वित एक सरोवर देखा। वहाँ जनशून्य स्थान देखकर उसका मन प्रसन्न हो गया और उसने वहीं ठहरनेका निश्चय किया। वह पैरके एक अँगूठेके बलपर भूमिपर खड़े होकर दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए शुक्राचार्यजीद्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रका जप करते हुए पर्वतके समान अडिग हो गया ॥ २७-२८ ॥ वह दाहिने घुटनेपर अपना बायाँ पैर रखकर हृदयदेशमें दोनों हाथोंकी अंजलिको लगाकर उसी स्थितिमें रहकर सतत भगवान् सूर्यका ध्यान करता था ॥ २९ ॥ शीत, वात, घाम एवं जलवृष्टियोंको दृढ़तापूर्वक सहन करते हुए वह केवल वायुका आहार करने लगा। उसका शरीर वल्मीकका ढेर बन गया था ॥ ३० ॥ शरीरके केवल अस्थिमात्र शेष रह जानेपर भी वह उस महामन्त्रके जपमें तल्लीन था। इसी प्रकार साधना करते हुए उसे दो हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ३१ ॥ उस समय उस सिन्धुके शरीरसे प्रकट होनेवाली आभासे सूर्यदेव सन्तप्त हो उठे। इस प्रकारका उग्र तप देखकर भगवान् सूर्य प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥ वे बोले—इस समय मैं तुम्हारे साधनानुष्ठानसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अपने मनमें जो भी कामना हो, उसे माँगो, मैं जीवित रहनेतक वह वरदान तुम्हें दूँगा। भगवान् सूर्यद्वारा स्फुट रूपसे कहे गये उस वचनको सुनकर सिन्धुने शारीरिक चेतनाको प्राप्तकर अपने सामने प्रभु भगवान् सूर्यको प्रत्यक्ष देखा। तब वह उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥