भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 656 में से

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पृष्ठ 449

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४७ सिन्धु बोला—हे दीनोंके स्वामी! आपको नमस्कार है। सर्वसाक्षी भगवान् भास्करको नमस्कार है। देवताओंके स्वामीको नमस्कार है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव इस प्रकार त्रिदेवस्वरूप सूर्यको नमस्कार है। समस्त विश्वके लिये वन्दनीयको नमस्कार है। विश्वके कारणस्वरूप आप भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ ३५-३६॥ वृष्टिके कारणरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है। फसलोंकी उत्पत्तिके हेतुभूत आपको नमस्कार है, परब्रह्म स्वरूपको नमस्कार है और सृष्टि, पालन तथा संहारके कारणरूप आपको नमस्कार है॥ ३७॥ आप गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है। गुरुरूप आपको नमस्कार है। सत्त्वादि तीन गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ, ज्ञान प्रदान करनेवाले और सभीके स्वामीरूप आपको नमस्कार है*। हे देव! आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरा वंश धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये और मेरी तपस्या भी धन्य हो गयी, जो कि आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ३८-३९॥ हे दिनेश! यदि आप मुझे वर प्रदान करना चाहते हैं, तो किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो—यह वरदान आप मुझे प्रदान करें। आपकी कृपासे मैं संग्राममें सभी देवताओंपर विजय प्राप्त करूँ। इस समय जो देवता हैं, उनसे मेरी मृत्यु न हो॥ ४०१/२॥ ब्रह्माजी बोले—उस सिन्धुके द्वारा इस प्रकारके माँगे गये वरदानोंको सुनकर सन्तुष्ट हुए भगवान् सूर्य तपस्यानुष्ठानसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाले अपने उस भक्तसे बोले॥ ४१॥ सूर्य बोले—मेरे वचनोंके अनुसार तुम्हें न तो देवयोनियोंसे, न मनुष्योंसे, न तिर्यक् योनिके पशु- पक्षियोंसे, न नागोंसे ही कोई भय होगा। न तो दिन, न रात्रि, न उषाकाल और न सन्ध्याकाल—इस प्रकार किसी भी समय तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। हे राजपुत्र! इस अमृतके पात्रको ग्रहण करो। यह जबतक तुम्हारे कण्ठदेशसे लगा रहेगा, तबतक तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ ४२-४४॥ इस अमृतपात्रको जो कोई भी तुमसे अलग कर लेगा, उसीके हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा कोई देवता, जब अवतार ग्रहण करेगा, जो अपने केशोंके अग्रभागसे स्वर्गको हिला डाले और जिसके अंगुष्ठके नखके अग्रभागमें करोड़ों ब्रह्माण्ड समाये हुए हों, वे ही प्रभु तुम्हें मार सकते हैं। अन्य किसीसे कभी तुम्हें भय करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ४५-४६॥ मेरे वरदानके प्रभावसे सब कोई तुम्हारे लिये तृणके समान हो जायँगे। मैंने तुम्हें तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया है—इसमें कोई सन्देह करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ४७॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार अनेक प्रकारके वरदान देकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। तब वह सिन्धु भी अत्यन्त आनन्दमग्न होकर अपने भवनको चला गया ॥ ४८ ॥ तब माता एवं पिताने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसके मस्तकको सूँघा, और वे दोनों उससे कहने लगे— 'हे पुत्र! तुम्हारे वियोगमें हमने अन्नका परित्याग कर दिया है। चिन्ताके कारण हम दोनों अत्यन्त कृश हो गये हैं। तुम हमारी इस दशाको देखो।' तदनन्तर माता- पिताके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त हर्षित होकर पुत्र सिन्धुने कहा— ॥ ४९-५० ॥ भगवान् सवितादेवने प्रसन्न होकर मुझे तीनों लोकोंका स्वामित्व प्रदान किया है। उनके वरसे मैं तीनों लोकोंको अपने वशीभूत कर लूँगा। अतः आप लोगोंको चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ५१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥

  • सिन्धुरुवाच— नमस्ते दीननाथाय नमस्ते सर्वसाक्षिणे ॥ नमस्ते त्रिदशेशाय ब्रह्मविष्णुशिवात्मने । नमस्ते विश्ववन्द्याय नमस्ते विश्वहेतवे ॥ नमस्ते वृष्टिबीजाय सस्योत्पादनहेतवे । परब्रह्मस्वरूपाय सृष्टिस्थित्यन्तहेतवे ॥ गुणातीताय गुरवे गुणक्षोभविधायिने । सर्वज्ञाय ज्ञानदात्रे सर्वस्य पतये नमः ॥