भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 656 में से

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पृष्ठ 450

४४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचहत्तरवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका आख्यान, सिन्धुद्वारा दिग्विजयसे सम्पूर्ण पृथ्वीको विजित करना, अमरावतीपर आधिपत्य और स्वयं इन्द्रासनपर विराजमान होना ब्रह्माजी बोले—अपने पुत्रको बुद्धिसम्पन्न और | गजसेनाके पीछे-पीछे अश्वारोही सैनिक चल रहे भगवान् सूर्यसे प्राप्त वरदानोंके कारण गर्वित जानकर | थे। वे वीर सैनिक अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, उसके पिता राजा चक्रपाणिने उसे देश, कोश, सैन्यबल- | शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले उन सैनिकोंने देहकी रक्षा सहित सम्पूर्ण राज्य प्रदान कर दिया ॥ १ ॥ | करनेवाले कवच धारण कर रखे थे। इनके पीछे रथारूढ़ अपने आत्मकल्याणकी इच्छावाला उसका वह | सेना जा रही थी। जो नानाविध अलंकारोंसे विभूषित थी पिता वन चला गया। पिताके द्वारा अभिषिक्त होनेपर | और असंख्य तरकशों, धनुषों तथा विविध शस्त्रसमूहोंसे सिन्धु राज्यके कार्योंमें संलग्न हो गया ॥ २ ॥ | समन्वित थी ॥ ९-१० ॥ उसने व्यापारीवर्गके प्रधान-प्रधान श्रीमानों, दोनों | वह सिन्धु नामक दैत्य सेनाके मध्य भागमें घोड़े अमात्यों एवं अधिकारियोंको बुलाकर उन्हें वस्त्र- | की पीठपर आरूढ़ होकर विराजमान था। उसका आभूषणों आदिके द्वारा सम्मानित करके अपने-अपने | कण्ठदेश मोतियोंकी मालासे सुशोभित था तथा धनुष पदोंपर पूर्ववत् प्रतिष्ठित किया ॥ ३ ॥ | एवं बाणने उसके हाथकी शोभाको बढ़ा रखा था ॥ ११ ॥ उसने राज्यमें यह डिण्डिमघोष करवाया कि | हाथमें खड्ग तथा ढाल लेकर वह वृक्षों तथा उसकी आज्ञाके भंग होनेपर उसे दण्डनीय अपराध माना | पर्वतोंको विदीर्ण करता हुआ जा रहा था। जिस-जिस जायगा। तदनन्तर उसने शीघ्र ही वीरोंको दिग्विजय | नगरको उद्देश्य करके वह महाबली दैत्य वहाँ जाता था, यात्राके लिये आज्ञा प्रदान की। अत्यन्त भीषण शरीरवाले | उस-उस नगरके राजाको सिन्धुके महावीर सैनिक उस सिन्धुने अपने तेजके द्वारा सूर्यको लज्जित-सा बना | पकड़कर अपने स्वामीके पास ले आते थे। तब वह दैत्य डाला। उसके आगे-आगे वीर सैनिक चल रहे थे, जो | सिन्धु अपना चिह्न तथा मुद्रा देकर किसी अपने विकराल और लाल वर्णके मुखवाले थे ॥ ४-५ ॥ | सेनानायकको वहाँ प्रतिष्ठित कर देता था ॥ १२-१३ ॥ वे हाथोंमें विविध प्रकारके खुले शस्त्रोंको धारण | इसके अतिरिक्त जो राजा उसकी शरणमें आकर किये हुए थे। उन्होंने अपने पैरोंसे उड़नेवाली धूलराशिसे | उसकी दासताको स्वीकार कर लेते थे, उन्हें वह भगवान् सूर्यको आच्छादित कर दिया था। उनके पीछे- | बलपूर्वक कर देनेवाला बनाकर उनकी रक्षा करके उन्हें पीछे हाथी चल रहे थे। जो चार दाँतोंवाले थे, नाना | उनके पदपर स्थापित कर देता था ॥ १४ ॥ प्रकारके रंगोंकी चित्रकारीसे विभूषित थे ॥ ६ ॥ | इस प्रकार उसने सभीको अपने अधीन बना लिया। पैरोंमें बँधी हुई श्रृंखलाओंवाले वे हाथी पृथ्वीको | तदनन्तर शुम्भ, निशुम्भ, वृत्रासुर, प्रचण्ड, काल, कदम्बासुर, कम्पायमान कर रहे थे। उन हाथियोंके ऊपर महावत | शम्बर तथा कमलासुर नामक करोड़ों-करोड़ों दैत्य आरूढ़ थे। वे हाथी चलते हुए पर्वतोंके समान लग रहे | उसके समीपमें आ गये ॥ १५ १/२ ॥ थे। वे विविध वर्णोंवाली ध्वजाओंसे युक्त थे और ऐसा | उस समय कोलासुरने राजा सिन्धुसे कहा— प्रतीत होता था कि वे दिग्गजोंको विदीर्ण करनेकी इच्छा | 'पूर्वकालमें जिस प्रकारसे दैत्यराज त्रिपुरासुरने तीनों रखते हों। वे अपने महान् घण्टाघोषसे दिगन्तरालोंको | लोकोंपर विजय प्राप्त करके हमें अधिकार प्रदान किये, निनादित कर रहे थे ॥ ७-८ ॥ | वैसे ही आप भी अपने तेजके बलपर तीनों लोकोंको