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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 656 में से

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पृष्ठ 451

क्री०ख०-अ०७५ ] * दैत्यराज सिन्धुका आख्यान * ४४९ जीतकर हमें अधिकार प्रदान करें' ॥ १६-१७ ॥ उस त्रिपुरासुरको भगवान् शिवके द्वारा मार दिये जानेपर अब आप ही एकमात्र महान् बलवान् असुर दिखायी देते हैं। आपके पराक्रमकी तुलनाको साक्षात् यमराज भी कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं ॥ १८ ॥ हे महान् बलसम्पन्न सिन्धु ! हम लोग आपकी आज्ञाका पालन करना चाहते हैं, हम आपकी सेवामें उपस्थित हैं। कोलासुरकी इस बातको सुनकर दैत्यराज सिन्धुको अति प्रसन्नता हुई। तब उसने उन असुरोंको अश्व, गज, वस्त्र तथा आभूषण प्रदान किये ॥ १९१/२ ॥ सिन्धु बोला—मैं महान् बलशाली तो तब होऊँगा, जब मैं देवराज इन्द्रकी अमरावती नगरी, शिवके कैलास, विष्णुके वैकुण्ठ, ब्रह्माके सत्यलोक तथा सातों पातालोंपर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ २०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब सभीके द्वारा 'बहुत ठीक- बहुत ठीक' इस प्रकार कहे जानेपर सभी दैत्याधिपति जोरकी गर्जना करने लगे और वे अत्यन्त हर्षित हो उठे। वे ब्रह्माण्डको कँपाने लगे। वे कहने लगे—'हमारी खुजली तो राजाओंसे युद्ध करनेपर शान्त नहीं हुई। अब लगता है कि देवताओंसे युद्ध करनेपर ही वह शान्त होगी।' अतः वे लोग शीघ्र ही निकल पड़े और स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। उन्होंने इन्द्रकी पुरी अमरावतीको चारों ओरसे वैसे ही घेर लिया, जैसे ब्राह्मण धन देनेवाले दानी व्यक्तिको घेर लेते हैं ॥ २१–२३॥ कुछ दैत्य वहाँकी रत्नराशिको लूटते हुए नगरीके मध्यमें प्रविष्ट हो गये। वहाँ गर्जन करते हुए दैत्योंका महान् कोलाहल होने लगा ॥ २४ ॥ तदनन्तर सभाके मध्यमें विराजमान देवराज इन्द्रने दूतके मुखसे दैत्यराज सिन्धुके आगमन तथा दैत्योंके द्वारा अपनी पुरीको घेरे जानेका समाचार सुना। तब हाथमें वज्र धारण किये हुए देवराज इन्द्र सभी देवताओंको साथ लेकर, ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होकर उस दैत्य सिन्धुके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ आये ॥ २५-२६॥ उस समय कुछ देवता कहने लगे—'हे इन्द्र ! इसके साथ युद्ध करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके अतिरिक्त कोई भी ऐसा कहीं नहीं दिखायी देता, जो इसके साथ युद्ध कर सके' ॥ २७ ॥ वे देवता इस प्रकार कह ही रहे थे कि उसी समय उस महाबली दैत्य सिन्धुने देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रको बाणोंकी वृष्टिसे बींध डाला ॥ २८ ॥ तभी कुछ देवता भागते हुए वहाँसे पलायन कर गये। तदनन्तर वे इन्द्र गर्जना करते हुए अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धके लिये दौड़ पड़े ॥ २९ ॥ हाथमें वज्र उठाये हुए उन शत्रुहन्ता इन्द्रने सभी दैत्यगणोंको ग्रास बनाते हुए उस दैत्यराज सिन्धुके मस्तकपर वज्रसे भीषण प्रहार किया ॥ ३० ॥ वज्रके प्रहारसे उसे महान् मूर्च्छा आ गयी, किंतु मुहूर्तभरमें ही वह पुनः उठ खड़ा हुआ और इन्द्रसे बोला— 'यहाँसे अपने घर चले जाओ, अपनी मृत्यु न होने दो। मेरी मुष्टिकाके प्रहारसे साक्षात् काल भी मृत्युको प्राप्त हो जायगा। फिर तुम्हारी क्या गणना है!' किंतु इन्द्रने उसकी कही बातको अनसुना कर दिया ॥ ३१–३२ ॥ तब अत्यन्त रोषमें भरकर महादैत्य सिन्धुने अपनी मुष्टिकाके आघातसे इन्द्रके हाथी ऐरावतके मस्तकको विदीर्ण कर डाला, जिससे रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी। फिर दैत्यने उछलकर उस हाथी ऐरावतके चारों दाँतोंको कसकर पकड़कर उस गजराजको जमीनपर गिरा दिया। यह देखकर इन्द्र अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३३-३४॥ तदनन्तर जब वह दैत्य इन्द्रको अपने पैरसे कुचलने ही जा रहा था कि इन्द्र सूक्ष्म शरीर बनाकर उसके हाथोंकी पकड़से बाहर निकल आये और दूर चले गये तथा मन- ही-मन उसकी प्रशंसा करने लगे कि इस प्रकारका पराक्रम मैंने पहले कभी नहीं देखा। यदि मैं वहींपर ठहरा रह गया होता तो निश्चित ही मृत्युको प्राप्त होता ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर इन्द्रने अपना ऐरावत हाथी वहीं छोड़ दिया और वे रूप बदलकर देवताओंके साथ उन भगवान् विष्णुकी शरणमें गये ॥ ३७ ॥ तत्पश्चात् देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओंके वहाँसे पलायन कर जानेपर सभी दैत्योंद्वारा चारों ओरसे