भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452

४५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु देवराज इन्द्रके आसनपर आरूढ़ हो गया। उसने देवताओंके सभी पदोंपर उन दैत्योंको नियुक्त कर दिया। तब शुम्भ आदि दैत्य उन- उन पदोंपर निःशंक होकर स्थित हो गये ॥ ३८-३९ ॥ वे सभी दैत्य उस असुराधिपति सिन्धु, जो सर्वाधिक बल-पराक्रमशाली था, उसकी प्रशंसा करने लगे और विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे स्वर्गलोकको निनादित करने लगे ॥ ४० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'देवताओंकी पराजय' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना, देवताओंको आश्वस्तकर भगवान् विष्णुका गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंसहित वहाँ आना, दैत्यसेना तथा देवसेनाका युद्ध

ब्रह्माजी बोले—देवताओंके साथ देवराज इन्द्रने वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए भगवान् विष्णुके समीप आकर उन्हें प्रणाम किया और अपने आगमनका प्रयोजन बतलाया ॥ १ ॥ इन्द्र बोले—हे गोविन्द! सिन्धुदैत्यद्वारा की गयी हमारी इस दुर्दशाको क्या आप नहीं जानते हैं? हमारी अमरावतीपुरीपर दुष्टोंने आक्रमण किया है ॥ २ ॥ यद्यपि देवताओंको साथ लेकर मैंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध किया, किंतु जब उस दैत्य सिन्धुको जीता नहीं जा सका, तभी मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे जगदीश्वर! आपके बिना हमारी कोई गति नहीं है। आप ही सर्वदा हमारी गति हैं। आप इस दैत्य सिन्धुका वध करें और हमें अपने-अपने स्थानोंको प्राप्त करायें ॥ ३-४॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रके वचन सुनकर भगवान् विष्णु चिन्ता तथा आश्चर्यसे समन्वित हो गये और इन्द्रसे बोले—'आप लोगोंको भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं क्षणभरमें ही उस असुर सिन्धुपर विजय प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने वाहन गरुड़पर आरूढ़ हुए। उस समय उस गरुड़की उड़ानसे तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे ॥ ५-६ ॥ पक्षियोंसे समन्वित वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। उस समय भगवान् विष्णु मुकुट तथा कुण्डल धारण किये हुए थे और वनमालासे विभूषित थे ॥ ७ ॥ कौस्तुभमणिकी आभासे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उन्होंने कस्तूरीका उज्ज्वल तिलक लगाया हुआ था। वे अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए थे। इस प्रकारसे सुसज्जित भगवान् विष्णु इन्द्रनगरी अमरावतीमें गये। गरुड़के आसनपर आरूढ़ भगवान् विष्णुसहित सभी देवगणोंको आया हुआ जानकर असुर अपने हाथोंमें विविध प्रकारके शस्त्र धारणकर युद्धके लिये आ पहुँचे ॥ ८-९ ॥ तब महापराक्रमशाली दैत्य सिन्धु भी युद्ध करनेकी इच्छासे हाथमें धनुष, तूणीर तथा चक्र लेकर घोड़ेपर सवार होकर अत्यन्त रोष करता हुआ वहाँ आया ॥ १० ॥ इसके पश्चात् कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, दोनों अश्विनीकुमार तथा कामदेव भी युद्धस्थलमें आये। सिन्धु दैत्यके सामने ही देवताओं तथा दैत्योंमें द्वन्द्वयुद्ध चल पड़ा। उस युद्धमें दैत्य प्रचण्डका वरुणके साथ, यक्षराज कुबेरका कमल दैत्यके साथ, सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्रका वृत्रासुरके साथ, निशुम्भका वायुके साथ और शुम्भ दैत्यका शक्तिसम्पन्न विष्णुके साथ मल्लयुद्ध हुआ ॥ ११-१३ ॥ इसी प्रकार अग्निदेवने चण्डके साथ और चन्द्रमाने मुण्डके साथ भीषण युद्ध किया। मंगलका कदम्बके साथ, शम्बरासुरका कामदेवके साथ एवं दोनों अश्विनीकुमारोंका कालदैत्यके साथ युद्ध हुआ। सभी सैनिकोंने शस्त्रों तथा अस्त्रोंके आघातसे एक-दूसरेके मर्मस्थानोंपर अनेक बार चोट पहुँचायी ॥ १४-१५ ॥ युद्धके मतवाले कुछ योद्धा मल्लयुद्ध कर रहे थे, कुछ दूसरे शस्त्रोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचा रहे थे।