श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७६ ] * सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना * ४५१ कुछ वीर मृत्युको प्राप्त हो गये, कुछ मरणासन्न अवस्थावाले हो गये और कुछ शरीरके अंगोंके कट जानेपर भी इधर- उधर गति कर रहे थे। कभी वे दूसरेको पराजित कर देते तो कभी स्वयं पराजित हो जाते थे॥ १६-१७॥ तदनन्तर वृत्रासुरने अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे इन्द्रके ऊपर आघात किया। तदनन्तर वे दोनों बड़े वेगसे अपने- अपने मस्तकसे दूसरेके मस्तकपर चोट पहुँचाने लगे॥ १८॥ इसी प्रकार हाथसे हाथको, पैरसे पैरको मारने और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलपर टक्कर मारने लगे। तदनन्तर इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरपर प्रहार किया॥ १९॥ वज्रके आघातसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसे जोरकी मूर्च्छा आ गयी। थोड़ी ही देरमें चेतना प्राप्तकर वृत्रासुरने वज्रके समान कठोर मुष्टिके आघातसे इन्द्रपर प्रहार किया, उस चोटसे वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे रक्तकी धारा बह चली, वे जबतक भागते, उससे पहले ही सभी दिशाओंसे युद्धकी इच्छा करनेवाले दैत्य वहाँ आ पहुँचे। तब उनका वैसा बल- पराक्रम देखकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये॥ २०-२२॥ इस प्रकार जो-जो भी देवता असुरोंसे द्वन्द्वयुद्ध कर रहे थे, उन सभीका अभिमान चूर-चूर हो गया और वे युद्धस्थलसे पलायन कर गये॥ २३॥ इस प्रकार सभी देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णुने अपने वाहन गरुडको प्रेरित किया। वे अपने सुदर्शनचक्रकी दीप्तिसे तथा अपनी दीप्तिसे सभी दिशा-विदिशाओंको प्रभासित करते हुए वहाँ आये और उन्होंने अपने चक्रकी धारसे अनेकों दैत्यसमूहोंपर प्रहार किया। उस प्रहारसे कुछ दैत्योंके मुख कट गये, किसीकी गर्दन धड़से अलग हो गयी॥ २४-२५॥ कुछ दैत्योंके सौ भागोंमें टुकड़े हो गये और कोई घुटना, जंघा तथा बाहुसे रहित हो गये। कुछ उनकी शरणमें चले गये, उन्हें भगवान् विष्णुने नहीं मारा॥ २६॥ भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये वे सभी महाबली दैत्य मुक्तिको प्राप्त हुए। वहाँ शीघ्र ही रणांगणमें मेद तथा मांस बहानेवाली नदियाँ प्रवाहित होने लगीं॥ २७॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने शंख बजाया, जिसकी तीव्र ध्वनिने सम्पूर्ण जगत्को निनादित कर दिया। इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा सबके ऊपर विजय प्राप्त कर लेनेपर वे शुम्भ आदि सभी दैत्य उस द्वन्द्व-युद्धको करना छोड़कर उनके साथ युद्ध करनेके लिये आ गये॥ २८१/२॥ तब भगवान् श्रीहरिने विराट्रूप धारण किया और चण्ड, मुण्ड, निशुम्भ तथा शुम्भ नामक उन चारों दैत्योंको पकड़कर और घुमाकर उसी प्रकार दूरस्थित श्रेष्ठ नदीके मध्यमें फेंक दिया, जैसे कोई मनुष्य भिन्दिपालके द्वारा पत्थर (-के गोल टुकड़े)-को फेंक देता है। वे कुछ देरके लिये मूर्च्छित हुए, किंतु फिर सचेत होकर अपनी दैत्यसेनामें आ गये॥ २९-३१॥ तदनन्तर श्रीहरिने बिना घबड़ाये दैत्य प्रचण्डके हृदयमें, वृत्रासुरकी पीठमें, काल, कमल एवं भौमासुरके सिरमें मुष्टिसे प्रहार किया। कदम्बासुरपर चक्रसे आघात किया। उन माधवने कोलासुरके हृदयमें गदासे प्रहार किया॥ ३२-३३॥ तदनन्तर वह सिन्धु नामक दैत्य भयंकर कोलाहल ध्वनिद्वारा दिशाओं एवं विदिशाओंको निनादित करते हुए शीघ्र ही दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा और बोला- 'हे विष्णो! मैंने तुम्हारा बलपौरुष देख लिया॥ ३४॥ अब तुम मेरा भी पौरुष देखो, अब तुम यहाँसे जा नहीं सकते हो। मेरी नजरोंके सामनेसे आजतक कभी भी कोई शत्रु जीवित रहकर नहीं गया है॥ ३५॥ तुम तो भूत, भविष्य तथा वर्तमानकालकी सब बातोंको जाननेवाले हो, तुमने पूर्वमें इस विषयमें विचार क्यों नहीं किया? जिसके शब्दमात्रसे तीनों लोक अत्यन्त प्रकम्पित हो उठते हैं, उसकी नगरीमें तुम सूर्यके आगे जुगनूके समान क्यों चले आये हो?'॥ ३६१/२॥ इस प्रकारका मिथ्या प्रलाप करते हुए उस दैत्याधिपति सिन्धुसे देवता बोले-'जो वीर होते हैं, वे डींग नहीं हाँकते, बल्कि पौरुष दिखलाते हैं। हमें भगवान् विष्णुकी आज्ञा प्राप्त नहीं है, नहीं .तो अबतक तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े हो गये होते'॥ ३७-३८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विष्णुका रणभूमिमें युद्धार्थ आगमन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥