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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 656 में से

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पृष्ठ 454

४५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- सतहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुदैत्यका देवताओंको पराजित करना, विष्णुका उसके पराक्रमसे प्रसन्न हो वरदानके रूपमें देवोंसहित उसके नगर गण्डकीपुरमें रहना, विष्णुका देवताओंको आश्वस्त करना, दुष्ट सिन्धुदैत्यद्वारा किये गये अधर्माचरणका वर्णन ब्रह्माजी बोले-देवताओंके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर क्रुद्ध हुआ वह दैत्य सिन्धु आगकी चिनगारी उगलता हुआ उन देवताओंपर वैसे ही टूट पड़ा, जैसे कि सिंह हाथियोंके समूहपर टूट पड़ता है ॥ १ ॥ दैत्य सिन्धुने अपनी मुट्ठीसे बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रपर प्रहार किया, जिस कारण वे पृथ्वीतलपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूतलपर गिर पड़ता है। दैत्यराज सिन्धुने कुबेरके मस्तकपर, वरुणके हनुदेश (टुड्डी)-में और यमकी पीठमें चक्रके आघातसे प्रहार किया ॥ २-३ ॥ अग्निदेवके तालुदेशपर चोट पहुँचायी, कामदेवको लातसे मारा, वायुदेवको पैरसे आघात किया और शनैश्चरको कुचल डाला। उसने चन्द्रमा तथा मंगलको पकड़कर बलपूर्वक घुमाया और भूतलपर पटक दिया। सनक तथा सनन्दनके पृष्ठभागमें चोट पहुँचायी ॥ ४-५ ॥ दोनों अश्विनीकुमार तथा देवर्षि नारद कहीं अन्यत्र ही भाग चले। उस सिन्धुदैत्यका पराक्रम देखकर उस समय सभी देवता भाग गये ॥ ६ ॥ कुछ देवता गिर पड़े तथा कुछ मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने चक्रके द्वारा भगवान् विष्णुकी मुट्ठीमें मारा तो उनका चक्र भूमिपर गिर पड़ा ॥ ७ ॥ तब भगवान् माधवने गदाके द्वारा उस दैत्यके सिरपर आघात किया। उस प्रहारसे बचकर दैत्यने अपनी गदा उनके ऊपर फेंकी ॥ ८ ॥ उसके पराक्रमको देखकर मधुसूदन भगवान् विष्णु उससे बोले-'अरे दैत्य ! जो तुम्हारे मनमें हो, वह वर माँगो। इस प्रकारका पुरुषार्थ अभीतक मैंने किसी भी असुरमें नहीं देखा है।' तब अत्यन्त आनन्दित होकर दैत्याधिपति सिन्धु बोला - ॥ ९-१० ॥ हे देवेश्वर ! यदि आप सन्तुष्ट हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो हे हरे! मेरे गण्डकी नामक नगरमें आप अपने परिवारके साथ हमेशाके लिये निवास करें। हे प्रभो ! मैं इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उत्तम वर नहीं माँगता हूँ। तदनन्तर भगवान् महाविष्णु बोले- 'मैं तुम्हारे नगरमें निवास करूँगा। चूँकि मैंने तुम्हें वर दे दिया है, इसलिये मैं तुम्हारे अधीन हो गया हूँ' ॥ ११-१२१/२ ॥ इसके पश्चात् सिन्धु नामक उस दैत्यने सत्यलोक, कैलास, तथा विष्णुलोकमें अपने दैत्यपतियोंको प्रतिष्ठित किया और स्वयं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हो गया, फिर वहाँ भी उसने दूसरे दैत्याधिपतिको स्थापितकर लक्ष्मीपति विष्णुके साथ विविध प्रकारके वाद्यों तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ अपनी पुरी गण्डकीकी ओर प्रस्थान किया। बन्दीजन उसकी स्तुति करते हुए कह रहे थे कि 'ऐसा पुरुष कहीं भी नहीं हुआ, जो कि बहुतसे देवताओंको जीतकर विष्णुभगवान्‌को अपने घरमें ले आया हो' ॥ १३-१५१/२ ॥ गण्डकीनगरके निवासियोंने वरुण, हरि, कुबेर आदि प्रधान-प्रधान देवताओंको उसके समीपमें स्थित देखा। इसके बाद सभी नगरवासी अपने-अपने घरोंको चले गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने भगवान् विष्णुसे कहा- 'तुम गण्डकीनगरमें देवताओंके साथ सुखोंका उपभोग करो।' तब उन्होंने भी वैसा ही किया। दैत्य सिन्धुने उस गण्डकीनगरके चारों ओर दूर-दूरतक दैत्यों तथा अन्योंको सुरक्षाहैतु नियुक्त कर दिया ॥ १६-१८ ॥ इसके पश्चात् सभी देवता भगवान् विष्णुसे कहने लगे-'हे गरुडध्वज ! आपने यह क्या किया ? आप अपने पराक्रमका परित्यागकर इस प्रकार आनन्दमें निमग्न होकर क्यों रह रहे हैं ? ॥ १९ ॥ हम लोग कैसे इस कारागारमें पड़ गये हैं। कैसे मृत्युलोकमें आ गये हैं? हे जगदीश्वर ! हमारे इस दुःखभोगका अन्त कब होगा?' ॥ २० ॥