श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७८ ] * बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका संकष्टचतुर्थीव्रत करना * ४५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तदनन्तर श्रीविष्णु उन सबसे बोले—'कालका | कर दिया और उन्हें गहरे जलमें छोड़ दिया। इसीके साथ अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कालके द्वारा ही सब | दैत्य सिन्धुकी मूर्ति बनाकर अत्यन्त आदरभावसे स्थापित कुछ उत्पन्न होता है, वृद्धिको प्राप्त होता है और अन्तमें | किया और उस मूर्तिकी पूजाके लिये राक्षसोंको नियुक्त संहार भी हो जाता है ॥ २१ ॥ | कर दिया। तदनन्तर वे दूत अपने स्वामी सिन्धुके पास अतः आप लोग समयकी प्रतीक्षा करें, काल ही इसे | आये और कहने लगे—हमने विनायक, शिव, विष्णु, सूर्य अपना ग्रास बना लेगा।' इस प्रकारसे महान् बल तथा पराक्रमसे | तथा लक्ष्मी आदिकी प्रतिमाओंको तोड़-फोड़कर शीघ्र ही सम्पन्न उस दैत्य सिन्धुने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके | अगाध जलमें उन सबको फेंक दिया है, उनके स्थानपर बड़ी ही प्रसन्नताके साथ वह सम्पूर्ण वृत्तान्त अपने माता- | आपकी प्रतिमाएँ स्थापित कर दी हैं, साथ ही आपकी पिताको बतलाया। माता-पिताने उसका इस प्रकारका पौरुष | प्रतिमाओंकी पूजाके लिये राक्षसोंको भी नियुक्त कर दिया जानकर उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ २२-२३ ॥ | है। हे स्वामिन्! यह सब करनेके बाद ही हम सब आपके तदनन्तर अत्यन्त दुष्ट दैत्य उस सिन्धुने सम्पूर्ण | पास आये हैं। इस प्रकारसे उस सिन्धु दैत्यके राज्यमें सर्वत्र पृथ्वीपर यह घोषणा करवायी कि 'आजसे देवता, | ही धर्मका लोप होने लगा ॥ २७–३० ॥ ब्राह्मण तथा गौकी पूजा जिस किसीके द्वारा भी की | सभी लोग यज्ञ, दान, पितृपूजन, स्वाहाकार तथा जायगी, वह निश्चित ही वधके योग्य होगा अथवा उसे | वषट्कारसे रहित हो गये। कहीं भी देवताओं, ब्राह्मणों शीघ्र ही मेरे पासमें लाना होगा, जहाँ-जहाँ भी | तथा गुरुजनोंका पूजन नहीं होता था ॥ ३१ ॥ [देवताओंकी] प्रतिमाएँ हैं, उन्हें खण्डित करके जलमें | अनेकों ऋषिगण सुमेरुपर्वतपर चले गये तथा कुछ फेंक दिया जाय। मेरी ही प्रतिमा बनाकर घर-घर लोग | नष्ट हो गये। इस प्रकारसे तीनों लोकोंमें दैत्य और राक्षस उसकी पूजा करें।' सिन्धु दैत्यद्वारा कहे गये इन | अत्यन्त प्रबल हो गये थे। साधु पुरुष तथा देवता या तो वचनोंको दूतोंने जगह-जगहपर लोगोंको पुकार-पुकारकर | कहीं छिप गये या निधनको प्राप्त हो गये। उस दैत्यराज बतलाया ॥ २४–२६ ॥ | सिन्धुसे देवताओंने जिस प्रकारसे मुक्ति प्राप्त की थी, उसे उन्होंने मन्दिरोंको तोड़ डाला, मूर्तियोंको खण्डित | अब आप लोग सुनें ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकृत देवनिग्रहण' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ ❖ अठहत्तरवाँ अध्याय बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको संकष्टचतुर्थीव्रत करना तथा स्तुतिद्वारा विनायकदेवको प्रसन्न करना, संकष्टहरस्तोत्रकी महिमा, प्रसन्न हो विनायकदेवका देवोंको वरदान देना और चारों युगोंमें होनेवाले अपने स्वरूपका परिचय देना ब्रह्माजी बोले—अत्यन्त पराक्रमशाली दैत्य सिन्धुके | जिसका जैसा भी मत हो, उसे आज आप सब बतायें ॥ २ ॥ द्वारा बन्धनमें डाले गये वे सभी देवता बड़े ही उत्सुक | ब्रह्माजी बोले—देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर होकर उस दैत्यके वधके उपायके विषयमें ही हर समय | ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने कहा—'ईश्वर ही सब कुछ सोचा करते थे ॥ १ ॥ | करनेवाला है, वह निश्चित ही कल्याण करेगा ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—सभी जनोंके अभिमतको जानकर ही | वे परमेश्वर जिस उपायसे सन्तुष्ट हों, वैसा प्रयत्न 'क्या करना चाहिये'—इसका निश्चय करना चाहिये। अतः | करना चाहिये। वे निश्चित ही इस दैत्यराज सिन्धुको