श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराजित करके हम सबको अपना-अपना पद अवश्य ही प्रदान करेंगे।' तदनन्तर वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ बृहस्पति बोले—'वे विभु स्वल्पमात्र सेवा-पूजासे भी तत्क्षण ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः असुरोंका विनाश करनेवाले तथा इस चराचर जगत्के गुरुकी शीघ्र ही सभी देवताओंद्वारा प्रार्थना की जानी चाहिये' ॥ ४–५ १/२ ॥ देवता बोले- हे वाचस्पति ! आप यह बतलाइये कि आपकी दृष्टिमें इस समय किस देवकी प्रार्थना की जानी चाहिये, हम सब लोग अपने-अपने पदकी प्राप्तिके लिये उन देवताको निश्चित ही प्रसन्न करेंगे ॥ ६ १/२ ॥ बृहस्पति बोले- त्रिदेवोंके रूपमें स्थित जो परमेश्वर ब्रह्मा बनकर सृष्टि करते हैं, विष्णु बनकर उसका पालन एवं रक्षण करते हैं तथा शिव बनकर उसका विनाश करते हैं। जो निर्बीज हैं अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। जो समस्त सृष्टिके बीजरूप हैं, सभी प्रकारकी वाणियोंसे अगोचर हैं, नित्य हैं, ब्रह्ममय हैं, ज्योतिःस्वरूप हैं और शास्त्रैकगम्य हैं ॥ ७-८ ॥ जो आदि-मध्य तथा अन्तसे रहित हैं, निर्गुण हैं, विकाररहित हैं, बहुत रूपवाले तथा एक रूपवाले हैं। सभी लोग जिनका नाम लेकर सभी कार्योंमें अपने अभीष्टकी सिद्धि प्राप्त करते हैं और जो भक्तिपूर्वक पूजित होनेपर संकटका विनाश करते हैं। वे विनायक देव ही [पूजनीय] हैं ॥ ९-१० ॥ आप सभी उनकी आराधना करें, वे आपके कार्योंको सिद्ध करेंगे। हे देवो ! इस समय यह माघमासका कृष्णपक्ष प्रारम्भ हुआ है। इस माघमासके कृष्णपक्षकी मंगलवारयुक्त चतुर्थी तिथि इन विघ्नविनाशक विनायककी प्रिय तिथि है। वे ही विनायक प्रकट हो करके सिन्धु दैत्यका वधकर आप लोगोंको अपने-अपने पद प्रदान करेंगे। इसमें कोई संदेह करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो-जो भी जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वे उस-उस अभीष्ट पदार्थको प्रदान करते हैं ॥ ११-१३ ॥ देवता बोले- हे गुरो ! हे मुने ! आपने बहुत अच्छी बात कही है, जिसे सुनकर हमें तृप्ति हुई है। आप इस समय हमारे लिये महान् विपत्तिरूपा महानदीसे पार उतारनेके लिये नाविक बने हैं ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर इन्द्र, वरुण, कुबेर, मधुसूदन विष्णु, बृहस्पति, मंगल, चन्द्रमा, सूर्य, यम, अग्नि, वायु तथा ब्रह्मा आदि वे सभी देवता पंचामृत, सुगन्धित द्रव्य, माला, शमी दूर्वा, पंचपल्लव, वनमें उत्पन्न विविध प्रकारके फल तथा विभिन्न [स्थानोंकी] कंकड़-पत्थर आदिसे रहित मिट्टीको लेकर उस गण्डकी नदीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अनेक वृक्षोंको काटकर उनसे एक विशाल मण्डप बनाया ॥ १५-१७ ॥ लताओं तथा केलेके स्तम्भोंसे उस मण्डपको सुशीतल और छायादार बनाया। तदनन्तर स्नानकर सन्ध्यावन्दनादि नित्य क्रियाओंको सम्पन्न करके अत्यन्त सुन्दर मूर्तियोंका निर्माण किया ॥ १८ ॥ विनायककी वे मूर्तियाँ सिंहके ऊपर आरूढ़ थीं, उनकी दस-दस भुजाएँ थीं। उन दस हाथोंमें दस आयुध विद्यमान थे। उन मूर्तियोंका मुख हाथीकी सूँड़से युक्त था। वे नाना प्रकारके वस्त्र एवं आभूषणोंसे सुसज्जित थीं। प्रत्येक मूर्तिके समीप ही सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियाँ शोभित थीं। सभी मूर्तियाँ किरीट तथा कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रही थीं। उन्होंने पीले वस्त्रका परिधान धारण कर रखा था। सर्पोंके आभूषणसे वे विभूषित थीं ॥ १९-२० ॥ उस मण्डपके मध्यमें उन मूर्तियोंकी यथाविधि प्राणप्रतिष्ठापूर्वक स्थापना करके देवताओंने सोलह उपचारोंके द्वारा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया ॥ २१ ॥ उन्होंने पञ्चामृत, शुद्धजल, वस्त्र, सुगन्धित चन्दन, दीपक, विविध प्रकारके नैवेद्य, फलों तथा मंगल आरतीके द्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित भगवान् विनायकका पूजन करके उनके मन्त्रका जप किया और भगवान् सूर्यके अस्ताचल चले जानेपर उन देवोंने सवितादेवकी प्रसन्नताके लिये सन्ध्या-वन्दन किया, तदनन्तर प्रभु विनायककी स्तुति की ॥ २२-२३ ॥ देवता बोले- हे दीनोंके स्वामी! हे दयासागर ! हे योगियोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले ! आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित स्वरूपवाले हैं। आपको