श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७८ ] * बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका संकटचतुर्थीव्रत करना * ४५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नमस्कार है, नमस्कार है ॥ २४ ॥ हे जगत्को प्रकाशित करनेवाले ! हे चित्स्वरूप ! हे ज्ञानके द्वारा जाने जा सकनेवाले ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुनियोंके मानसपटलमें विराजमान रहनेवालेको नमस्कार है। दैत्योंका विनाश करनेवालेको नमस्कार है। हे तीनों लोकोंके स्वामी ! हे तीनों गुणोंसे परे रहनेवाले ! हे सत्त्वादि गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे विभो ! आप तीनों लोकोंका पालन करनेवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २५-२६॥ मायासे अतीत रहनेवाले तथा भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ! आपको नमस्कार है। चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि-ये आपके तीन नेत्र हैं, ऐसे आप त्रिनेत्रको नमस्कार है। आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। अपरिमित शक्तिवाले आपको नमस्कार है, चन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले आप चन्द्रमौलिको नमस्कार है। आप चन्द्रमाके समान गौर वर्णवाले हैं, शुद्ध हैं और विशुद्ध ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है* ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उसी समय उनके समक्ष तेजका एक पुंज प्रकट हुआ। उसे देखते ही सभीकी आँखें चौंधिया गयीं और उस समय वे देवता अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ २९ ॥ फिर उनपर कृपा करनेकी दृष्टिसे वे विनायकदेव सौम्य तेजवाले हो गये। तब उन देवताओैंने देवेश्वर विनायकका दर्शन किया, वे सिंहके आसनपर विराजमान थे। उनके दस हाथ थे, उनमें वे दस प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उन्होंने मस्तकपर दिव्य मुकुट धारण कर रखा था। नाना प्रकारकी वेश-भूषासे वे बड़े ही मनोरम लग रहे थे। वे अपने वक्षपर धारण की हुई मोतियोंकी सुन्दर मालासे सुशोभित हो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ उन्होंने अपने शरीरपर दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपन किया हुआ था। उनके उदरदेशमें करधनीके रूपमें सर्प बँधा हुआ था। उनके पैरोंमें छोटे-छोटे घुँघरू बँधे थे, जिनसे सुन्दर ध्वनि हो रही थी और अपने मस्तकपर कस्तूरीका तिलक धारण करनेसे वे अत्यन्त उज्ज्वल हो रहे थे। इस प्रकारके स्वरूपवाले उन प्रभु विनायकदेवका दर्शन करके देवताओैंने उन्हें प्रणाम किया और वे कहने लगे ॥ ३२ १/२ ॥ हमने गुरुदेव बृहस्पतिजीके कथनानुसार जिस स्वरूपवाले प्रभुका ध्यान किया था, ये वे ही विनायक हैं। आज वाणी तथा मनसे सर्वथा अगोचर उन्हीं देवका हम साक्षात् दर्शन कर रहे हैं। हे देवो ! आज हमारा जन्म लेना धन्य हो गया, हमारी दृष्टि धन्य हो गयी। हमारा तप तथा दान भी आज धन्य हो गया ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर वे विनायकदेव उन देवताओंसे बोले—मैं आज आप लोगोंकी स्तुतिसे अत्यन्त तृप्त हो गया हूँ, आप लोगोंद्वारा की गयी पूजा, भक्ति तथा किये गये संकष्टीव्रतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३५ ॥ यह स्तोत्र 'संकष्टहरस्तोत्र' के नामसे विख्यात होगा। हे देवो ! जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह मेरे लिये सम्माननीय होगा ॥ ३६ ॥ ऐसे उस भक्तके दर्शनसे यक्ष-राक्षस विनष्ट हो जायँगे। वह यहाँ विविध भोगोंका उपभोग करेगा और अन्तमें मुक्तिपदको प्राप्त करेगा ॥ ३७॥ आप लोग मेरे वचनको पुनः सुनें। आप लोग सिन्धु दैत्यद्वारा पीड़ित किये गये हैं। यज्ञ-यागादि तथा वेद आदिसे वंचित हो जानेपर आप मेरी शरणमें आये हैं। आप लोगोंको गण्डकीनगरमें उस दैत्य सिन्धुने बन्दी बनाकर रखा है। आप लोग स्वाहाकार, स्वधाकारसे
- सर्वे ऊचुः दीननाथ दयासिन्धो योगिहृत्पद्मसंस्थित । अनादिमध्यरहितस्वरूपाय नमो नमः ॥ जगद्भास चिदाभास ज्ञानगम्य नमो नमः । मुनिमानसविष्टाय नमो दैत्यविघातिने ॥ त्रिलोकेश गुणातीत गुणक्षोभ नमो नमः । त्रैलोक्यपालन विभो विश्वव्यापिन्प्रभो नमः ॥ मायातीताय भक्तानां कामपूराय ते नमः । सोमसूर्याग्निनेत्राय नमो विश्वम्भराय ते ॥ प्रमेयशक्तये तुभ्यं नमस्ते चन्द्रमौलये । चन्द्रगौरfilterाय शुद्धाय शुद्धज्ञानकृते नमः ॥