भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 656 में से

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पृष्ठ 458

४५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

रहित हो गये हैं। अतः उस सिन्धु दैत्यका वध करनेके | मूषक होगा और मेरा नाम 'गजानन' होगा ॥ ४२-४३ ॥ लिये मेरा अब दूसरा अवतार होगा ॥ ३८-३९ ॥ | हे देवो! तदनन्तर कलियुगके आनेपर मेरा वर्ण हे देवो! मैं अब देवी पार्वतीके घरमें अवतरित होऊँगा | श्याम होगा। मेरी मूर्ति पत्थरकी होगी और मैं 'धूम्रकेतु' और 'मयूरेश्वर' इस नामसे मैं ख्याति प्राप्त करूँगा। तब | इस नामसे विख्यात होऊँगा। हे देवो! मैं आपके मेरे द्वारा उस सिन्धु दैत्यका वध किये जानेपर आप लोगोंको | मनोभिलषित कार्यकी शीघ्र ही सिद्धि करूँगा ॥ ४४ १/२ ॥ [अपने-अपने] पदों तथा स्थानोंकी प्राप्ति होगी। इसमें | ब्रह्माजी बोले-उन देवताओंसे इस प्रकार कहकर कोई सन्देह नहीं है। हे देवताओ! सत्ययुगमें जो मेरा | वे विनायकदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। हम लोगोंका अवतार हुआ, वह सिंहपर आरूढ़ था। उसकी दस भुजाएँ | कार्य निश्चित ही सम्पन्न होगा-ऐसा समझकर देवताओंको थीं, उसका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी था और वह 'विनायक' | बड़ा ही आनन्द हुआ। जो इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण इस नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ४०-४१ १/२ ॥ | करता है अथवा अन्य किसीको सुनाता है अथवा [अब इस] त्रेतायुगमें मैं छः भुजाओंवाला तथा | भगवान् विनायकका ध्यान करके परम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक चन्द्रमाके समान वर्णवाला होऊँगा, मेरा वाहन मोर होगा | इसका पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको और मेरा 'मयूरेश्वर' यह नाम होगा। द्वापरयुगमें मेरा विग्रह | प्राप्त कर लेता है और मृत्युके अनन्तर ब्रह्ममें लीन हो रक्तवर्णका होगा। मेरी चार भुजाएँ होंगी। मेरा वाहन | जाता है ॥ ४५-४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'देवताओंको समृद्धिका वर प्रदान करनेका वर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

उन्यासीवाँ अध्याय भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन, भगवान् शिवद्वारा गौरीको गणेशजीके माहात्म्यका प्रतिपादन और उन्हें गणेशाराधनाका उपदेश, देवी पार्वतीका तपस्या करनेके लिये लेखनाद्रिपर्वतपर गमन

ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] दैत्यराज सिन्धुके | हम अगोचर भगवान् शिवका इस दण्डकारण्यमें दर्शन द्वारा देवताओंको जीत लिये जानेका वृत्तान्त जानकर | कर रहे हैं। आज हमारा पाप समाप्त हो गया और महान् भगवान् शम्भु अपने सात करोड़ गणोंसे घिरे हुए होकर | पुण्य फलीभूत हो गया है ॥ ४-५ ॥ अपने स्थानसे त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें आ गये ॥ १ ॥ | भगवान् शिवका दर्शन कर लेनेपर अब हमें वैसे वहाँपर दैत्य सिन्धुके भयसे गौतम आदि महर्षिगण | ही कोई दुःख नहीं होगा, जैसे कि दिवानाथ भगवान् स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा वेद आदिके | सूर्यके उदित हो जानेपर कहीं भी अन्धकार नहीं दिखायी अध्ययनसे रहित होकर निवास कर रहे थे। भगवान् | देता है।' तदनन्तर भगवान् महादेव उन सभी श्रेष्ठ त्र्यम्बकका दर्शनकर वे सभी महर्षिगण चारों ओरसे उन्हें | मुनियोंसे कहने लगे - ॥ ६ १/२ ॥ घेरकर वैसे ही खड़े हो गये, जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थस्थलको | शिवजी बोले- दैत्य सिन्धुने तीनों लोकोंपर तथा बालक अपनी माताको घेर लेते हैं ॥ २-३ ॥ | आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन बना लिया है। महर्षियोंने उन्हें प्रणाम किया। उनकी पूजा की | देवताओंको बन्दी बना लिया है। उसने कुछ मुनियोंको और वे कहने लगे- 'आज हम धन्य-धन्य हो गये। | भी बन्धनमें डाल रखा है। यह सब जानकर मेरा मन हमारे नेत्रोंका होना धन्य हो गया। हमारा जन्म लेना | अत्यन्त खिन्न है, मुझे [किसी भी] स्थानपर शान्ति नहीं धन्य हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि | प्राप्त हो रही है। अतः मैं यहाँ चला आया हूँ ॥ ७-८ ॥

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